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उर्दू मीडिया : जुबान संभाल के

पिछले चार महीने के निरंतर बंद और कर्फ्यू के कारण जम्मू-कश्मीर हर लिहाज से चरमराया हुआ है। इन महीनों में गुलजार रहने वाली घाटी के होटल और शिकारे हंगामे के कारण सन्नाटे में डूबे रहे। बेहतर कारोबार की संभावनाओं के चलते जिन्हें नौकरी दी गई थी, वे फिर से सड़क पर आ गए हैं।

जम्मू से प्रकाशित ‘आफताब’ के मुताबिक, माहौल के थोड़ा शांत होने पर यहां के लाखों लोगों के सामने कई मुसीबतें एक साथ मुंह बाए खड़ी हो गई हैं। बलवा के चलते महीनों से अपने घरों में दुबके टैक्सी चालक सड़कों पर आ तो गए हैं, पर पर्यटकों के अभाव में रोजगार पर छाई मंदी निकट भविष्य में टलती नहीं दिख रही। कारोबार ठप रहने से ट्रांसपोर्टरों की भी हालत पतली है। शिक्षण संस्थान अब तक सुचारू पढ़ाई के लिए तैयार नहीं हुए हैं।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला परेशान-हाल कश्मीर और उसके अवाम की मुसीबत हल्का क्या करते, उन्होंने एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। उमर द्वारा कश्मीर मसले पर पाक की भूमिका की पैरवी करने से उर्दू मीडिया, देश का बुद्धिजीवी वर्ग बेहद खफा है। मुल्क के नामचीन इस्लामी अदारा दारूल उलूम ने उनकी इस हरकत की कड़ी आलोचना की है। देवबंद में कश्मीर मसले पर आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में उलेमाओं ने दो टूक कह दिया- कश्मीर की आजादी की मांग कुबूल नहीं की जा सकती। यह भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा।

‘सफाहत’ कहता है- यह पहला मौका है, जब दारूल उलूम ने कश्मीर मसले पर खुलकर अपनी राय जाहिर की है। कॉन्फ्रेंस में पारित 11 प्रस्तावों में कश्मीर में सेना को दिए विशेषाधिकारों में कटौती करने, घनी आबादी वाले इलाकों से अर्ध सैनिक बलों को हटाने, दंगा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार लोगों को बिना शर्त रिहा करने, फर्जी मुठभेड़ों की जांच कराने की मांग शामिल हैं। इन प्रस्तावों में उमर अब्दुल्ला को भी संयम बरतने की ताकीद की गई है।

आलिमों की राय में सियासी लड़ाई में बेकसूर कश्मीरी निशाना बनाए जा रहे हैं। इस युवा मुख्यमंत्री ने राज्य विधानसभा में कश्मीर को दो मुल्कों का विवाद बताया था। उमर का कहना है कि वर्ष 1947 में भारत में कश्मीर का पूरी तरह से नहीं बल्कि आंशिक विलय हुआ था। यह प्रदेश दो मुल्कों के बीच पिस रहा है।

उमर की इस दलील पर ‘हमारा मकसद’ उनकी खिंचाई करते हुए कहता है- वह अपने दादा शेख अब्दुल्ला और पिता फारुख अब्दुल्ला के नक्शे-कदम पर चल रहे हैं। इन दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों ने हमेशा अपनी नाजायज मांगें मनवाने के लिए केंद्र को ब्लैकमेल किया है। एक अन्य अखबार की नजर में- नेशनल कॉन्फ्रेंस पाक के पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की भाषा बोलने लगी है।

‘ऐतमाद’ कहता है- उमर का बयान जज्बाती उबाल पैदा करने वाला है। चिंताजनक बात यह है कि चार महीने के हंगामे के बाद राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के बजाय उसे नए विवाद में धकेलने की कोशिश हो रही है। ऐसे में केंद्र का सूबे को विशेष सहूलियत देने का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

‘सियासत’ अपने संपादकीय ‘कश्मीर, मरकज की आठ निकाती अपील’ में कहता है- केंद्र द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष सहूलियतें देने पर भी घाटी के तमाम मसले दूर नहीं हो सकेंगे। इसके बावजूद इसे अच्छी पहल कही जा सकती है। इसके जरिये लोगों का विश्वास जीता जा सकता है।

‘कश्मीर को बदनाम न किया जाए’ में हैदराबाद का एक अखबार लिखता है- कश्मीरी अवाम के बीच नया विवाद छेड़ने से उनकी मुसीबत बढ़ेगी। एक अन्य अखबार ने अपने संपादकीय में लिखा है कि उमर के बयानों से उन्हें फिर आग उगलने का मौका मिलेगा, जो अनुच्छेद-370 हटाने की मांग लेकर दशकों से आंदोलन करते आ रहे हैं।

इस अखबार को यह कहने से भी गुरेज नहीं कि इस अनुच्छेद को हटाने की मांग करने वालों ने कभी कश्मीरी अवाम को हिन्दुस्तान के करीब लाने की कोशिश ही नहीं की। इस वजह से उनमें बेगानगी का भाव घर कर गया है। एक अखबार ने कश्मीर नीति को लेकर केंद्र की खिंचाई की है। अखबार लिखता है- शांति का नोबेल पुरस्कार पाने के लिए कश्मीर को तश्तरी में सजाकर अमेरिका की मौजूदगी में पाकिस्तान को सुपुर्द करने की तैयारी चल रही है। उमर इसलिए निरंकुश हैं, क्योंकि केंद्र के पास कश्मीर को लेकर कोई ठोस नीति नहीं है।

इन खबरों के बीच घाटी से एक और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। एक अखबार ने जम्मू-कश्मीर के खजाना मंत्री अब्दुल रहीम राथर के बारे में लिखा है कि उन्होंने आर्थिक रूप से पिछड़े इस सूबे के तकरीबन एक करोड़ रुपये जम्मू और श्रीनगर के अपने सरकारी मकानों को सजाने-संवारने पर खर्च कर डाले हैं।

लेखक हिन्दुस्तान से जुड़े हैं

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