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राजनीति और राम

अपने पल्ले अब पड़ा है। एक जनता के राम हैं। जन-जन के आराध्य, मर्यादा पुरुषोत्तम, रावणहन्ता, पिता के आज्ञाकारी, भाइयों के आदर्श, सिया के दुलारे राम। वह तुलसी के ही नहीं, सामान्य जनता के भी प्रेरणा-पुरुष हैं। तभी तो कोई राम अपने नाम के आगे लगाता है, कोई पीछे, मसलन दुलारे राम और रामदुलारे। यह दीगर है कि राम के असर से ज्यादातर ऐसे नामधारी अछूते हैं। उसका भी कारण है।

वर्तमान नेताओं ने साबित कर दिया है कि राम, बुद्ध, महावीर, गाँधी के सिद्धांन्तों के अनुकरण से, कामयाबी तो दूर पेट पालना मुश्किल है। आज नौकरी तक सुयोग्य को दान-दक्षिणा से मिलती है। सत्ता के भिखमंगे, भूखे भिखारियों की तरह हाथ पसारे बैठे हैं कि रकम दो, नौकरी लो। प्रजातंत्र के चुनावों में तंत्र है, मंत्र है, जात है, घात है, बस जनसेवा नहीं है। तथाकथित गांधी के अनुयाइयों ने उन्ही की लाठी से उन उसूलों की लंगोटी तक लूट ली है। आलम यह है कि कोई पूछे कि गाँधी कौन थे तो कहेंगे- ‘स्वर्गीय गाँधी भारत के प्रधानमंत्री थे। उनके पुत्र देश की भावी आशा हैं।’

इन हालात में देश के होनहार शुरू से जुगाड़, दंद-फंद, झूठ-फरेब का राजपथ चुनते हैं। उसूलों की तंग घुमावदार गलियों से क्यों कोई गुजरे? उनके पूजनीय वह महापुरुष हैं, जो दसियों अपहरण-हत्याओं के बावजूद सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हैं। ऐसों को केस की क्या परवाह?

केस हैं तो अपील है, अपील है तो वकील है, वकील है तो दलील है, दलील है तो पेशी में ढील है। वह क्यों चिन्ता करें? राम-गाँधी का उपयोग जीवन में नहीं बस राजनीति में है। कुछ नेता हिन्दुओं के वोट को राम मंदिर का मुखौटा दिखा कर पटा रहे हैं, दूसरे अल्पसंख्यकों को हाई कोर्ट के निर्णय की धज्जियाँ उड़ाकर!         

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