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ध्वनि की रफ्तार

ध्वनि की रफ्तार ऊंचाई, तापमान और उसके प्रवाह के माध्यम पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए समुद्र में औसत तापमान 59 डिग्री फारेनहाइट (15 डिग्री सेल्सियस) में ध्वनि 761 मील प्रतिघंटा की रफ्तार से प्रवाहित होती है। इसके विपरीत, 32 डिग्री फारेनहाइट तापमान पहुंचने पर ध्वनि की रफ्तार 742 मील प्रतिघंटा पर चलती है। समुद्र स्तर से ऊपर के इलाकों में ध्वनि की रफ्तार वहां के हालात पर निर्भर करती है।

इसका कारण यह है कि ध्वनि की तरंगें वातावरण में मौजूद मॉलीक्यूल्स के सहारे प्रवाहित होती हैं। जब कोई ध्वनि तरंग किसी मॉलीक्यूल से टकराती है तो वह तरंगित होता है और नतीजतन अपने साथी मॉलीक्यूल्स को भी हिलाता है, और वह मॉलीक्यूल्स यह कंपन आगे प्रवाहित करते हैं। यदि मॉलीक्यूल्स बेहद सघन हैं तो ध्वनि तरंग तेज बहती है। जब मॉलीक्यूल सघन नहीं होते तो ध्वनि की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।

वातावरण में यह सघनता तापमान बदलने और ऊंचाई के कारण होता है। ध्वनि हवा की अपेक्षा पानी में ज्यादा तेज प्रवाहित होती है क्योंकि वह ज्यादा सघन होता है। इसी तरह स्टील में यह तेज प्रवाहित होती है, लकड़ी में भी। इसीलिए आप कई पुरानी फिल्मों में किसी पात्र को रेल की पटरी पर कान लगाकर आती हुई गाड़ी का पता लगाते हुए देखते हैं।

जब कोई जेट ध्वनि की रफ्तार से ज्यादा तेज चलता है तो ऐसे में उस जेट के गिर्द शॉकवेव अस्तित्व में आ जाती है। यह दरअसल एक सफेद अदृश्य बादल होता है जो फास्ट-स्पीड फोटोग्राफी की मदद से देखा जा सकता है। देखने में ऐसा लगता है कि जहाज एक सफेद बादल से बाहर निकल रहा हो।

मैक 1 ने सर्वप्रथम ध्वनि की रफ्तार को पीछे छोड़ा था। फौज के जेट अक्सर सुपरसॉनिक रफ्तार से उड़ते हैं। जब ऐसे जेट ध्वनि से दोगुनी रफ्तार से उड़ते हैं तो उसे मैक 2 श्रेणी कहा जाता है। तीन गुना रफ्तार को मैक 3 और आगे की रफ्तारों को इसी तरह अगले नंबर दिए जाते हैं। कई रॉकेट पृथ्वी के वायुमंडल में आते-जाते हुए भी ध्वनि की रफ्तार से कई गुना तेज चलते हैं।

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