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एक बौद्धिक फिल्मकार

एक बौद्धिक फिल्मकार

कई वर्षों के बाद अडूर गोपालाकृष्णन से फुर्सत से मुलाकात हुई। वैसे तो जब भी अडूर दिल्ली आते हैं तो वे फोन ज़रूर कर लेते हैं और थोड़ा-बहुत समय भी साथ गुज़ार लेते हैं, लेकिन थोड़ा-बहुत ही। दिल्ली में भी उनके बहुत सारे प्रशंसक और चहेते हैं, लेकिन अडूर दिल्ली को बिलकुल नहीं चाहते। काम खत्म होते ही यहाँ से फौरन भाग खड़े होते हैं। इस बार वे तीसरे हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का उद्घाटन करने के लिये यमुनानगर जा रहे थे और दिल्ली से यमुनानगर मुझे चार घंटे उनसे बतियाने का अवसर मिला।

अडूर से मेरी पहली मुलाकात सन् 1978 में हुई थी। उनकी फिल्म ‘कुडियट्टम’ (ऐसेंट) बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में शामिल थी और भारत से एक फिल्म प्रतिनिधिमंडल वहाँ गया था। इस मंडल में बुद्धदेब दासगुप्ता और अडूर गोपालाकृष्णन शामिल थे और सरकारी बाबू होने के नाते मैं उसका लीडर था!

फरवरी के महीने की सर्दी में मैंने अडूर के साथ बर्लिन में काफी समय बिताया था। वे एक अंतर्मुखी, मित्तभाषी और साफगो व्यक्ति हैं, ठीक अपनी फिल्मों की तरह। बर्लिन में बाकी सब युवा फिल्मकार अपनी फिल्म का विज्ञापन करने में लगे हुए थे, जबकि अडूर कुछ खास-खास लोगों से ही मिले। ‘कुडियट्टम’ केरल के स्थानीय रंग में ऐसी रंगी हुई थी कि बर्लिन के लोगों के लिये उसका आस्वादन आसान नहीं था। बर्लिन से लौटने के बाद मुझे पता लगा कि वहाँ के कुछ फिल्मविद्यों ने ‘कुडियट्टम’ की काफी तारीफ की थी और अडूर के बारे में लिखा था कि इस निर्देशक में बड़ी सम्भावनाऐं हैं।

‘कुडियट्टम’ को कोई खास अंतरराष्ट्रीय ख्याति नहीं मिली, लेकिन इसके लिये अडूर गोपालाकृष्णन को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘सर्वश्रेष्ठ मलयालम फिल्म’ का पुरस्कार और फिल्म के नायक गोपी को ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ का पुरस्कार अवश्य मिला। उनकी पहली फिल्म ‘स्वयंवरम्’ जो 1972 में बनी थी, पहले ही सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार जीत चुकी थी। इसलिये ‘कुडियट्टम’ की कुछ कम सफलता के बावजूद भी अडूर ने अपना रास्ता नहीं बदला। चार साल बाद अडूर ने ‘ऐलिपथायम’ (रैट-ट्रैप) बनाई। इसी फिल्म से अडूर को अतरराष्ट्रीय ख़्याति मिली, क्योंकि लंदन फिल्म समारोह में इसे सदरलैंड ट्रॉफी से नवाज़ा गया था।

प्राय: अडूर की फिल्में एक स्थिति या एक चरित्र पर केंद्रित होती हैं। कहानी का अंश उनमें न के बराबर होता है। जैसे ‘ऐलिपथायम’ केरल के एक सामंती परिवार के संध्याकाल का चित्रण है। इस परिवार का मुखिया उन्नी बदलते सामाजिक परिवेश के साथ अपने आप को बदल नहीं पा रहा और इस कारण वह धीरे-धीरे अपने ही घर में बंद हो जाता है, कुछ उसी तरह जैसे एक चूहा चूहेदानी में बंद हो जाता है। अंग्रेजी में इस फिल्म का नाम ‘रैट ट्रैप’ यानी चूहेदानी ही है।

यह रूपक शायद कुछ गलत है, क्योंकि उन्नी तो अपनी मर्ज़ी से अपने ही बनाये हुए पिंजरे में कैद है, जबकि चूहा तो चूहेदानी में अपनी मर्ज़ी के खिलाफ और लालच के कारण कैद होता है। हाँ कैद दोनों हैं। उन्नी ने अपने साथ अपनी दो छोटी बहनों को भी कैद कर रखा है। एक छोटी बहन स्कूल में पढ़ती है और घर की घुटन से किसी तरह भागना चाहती है। दूसरी बहन पत्नी की तरह घर सम्भालती है और उन्नी उस पर पूरी तरह आश्रित है। इसी कारण शायद उन्नी नहीं चाहता कि उसकी बहन की कहीं शादी हो और वह एक नई जिंदगी शुरू कर सके।

जब मैंने यह फिल्म, फिल्म एप्रिशिएशन कोर्स के दौरान यमुनानगर फिल्मोत्सव में दिखाई तो विद्यार्थी एकदम परेशान हो उठे, क्योंकि ऐसी फिल्म उन्होंने कभी देखी ही नहीं थी। कुछ चरित्र हैं, एक माहौल है और बहुत सारी चुप्पी। फिल्म के बाद कुछ लोगों ने शिकायत की कि ऐसी फिल्म से फिल्म रसास्वादन कोर्स की शुरूआत क्यों की गई। मेरा कहना था कि कई दफ़ा जल्दी से तैराकी सिखाने का एक ही तरीका होता है कि सीखने वाले को बहते दरिया या गहरे पानी में डाल दिया जाये। दो चार गोते खाने के बाद वह खुद-ब-खुद सीख जायेगा।

ख़ैर, फिल्म पर जो बहस हुई, उससे कॉलेज के छात्रों को यह तो समझ में आया कि बम्बईया फिल्म की गीतोंभरी कहानी के अलावा फिल्म के और रूप भी हो सकते हैं। दूसरी बात, फिल्म एक अलग संस्कृति को जानने का अच्छा माध्यम भी हो सकता है जैसे हरियाणा के छात्रों को केरल समाज के बारे में लगभग कुछ भी मालूम नहीं था और इस फिल्म के द्वारा वे मलयालम संस्कृति के बारे में कुछ जान पाये। तीसरी बात, कि फिल्म की फोटोग्राफी और ध्वनि-संयोजन, जिसके अडूर गोपालाकृष्णन सही रूप में मास्टर हैं, फिल्म को सजाने के लिये नहीं होती, बल्कि फिल्म की भाषा का अहम् अंग हैं जिनका फिल्म के विषय से गहरा रिश्ता है।

अडूर गोपालाकृष्णन का जन्म सन् 1941 में केरल के अडूर ग्राम में हुआ था। फिल्म जगत में वे वर्ष 1965 से सक्रिय हैं। इस दौरान उन्होंने लगभग 30 डॉक्यूमैंट्री फिल्में और केवल 11 फीचर फिल्में बनाई हैं। इनके लिये उन्हें ढेर सारे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। 

सन् 2004 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी मिला था और इस तरह वे यह पुरस्कार पाने वाले सबसे युवा फिल्म निर्देशक हैं। मेरे विचार में उनकी सबसे महत्वपूर्ण फिल्म ‘मुखा-मुखम’ (फेस टु फेस) है, जो 1984 में बनी थी। यह फिल्म श्रीधरन के चरित्र के ज़रिये केरल में कम्युनिस्ट पार्टी का पूरा इतिहास दर्शाती है। इस फिल्म के लिये अडूर को केरल में काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था, हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें इसी फिल्म के लिये सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला था।

मेरी जानकारी में भारत में और कोई ऐसा फिल्म निर्माता नहीं है जो एक फिल्म बनाने से पहले वर्षो मनन करता है और इस मायने में वे सही रूप में एक फिल्म बुद्धिजीवी हैं। ‘स्वयंवरम’ (1972) और ‘कुडियट्टम’ (1977) के बीच पांच साल का अंतराल था, ‘कथापुरुषन’ (द मैन ऑफ द स्टोरी, 1995) और ‘निझालक्कुथू’ (शैडो किल, 2002) के बीच सात साल का। उन्होंने अपनी आखरी फिल्म ‘ओरु पेन्नम रंदानम’ (ए क्लाइमेट फॉर क्राइम) वर्ष 2008 में बनाई थी। 

जब मैंने उनसे पूछा कि आप अपनी नई फिल्म कब शुरू कर रहे हैं तो उनका उत्तर था कि अभी मैं फिल्म के एक विषय पर सोच रहा हूँ। उसके बाद स्क्रिप्ट यानी पटकथा लिखी जाएगी और तब कहीं शूटिंग की नौबत आएगी। मुझे लगता है कि वर्ष 2011 या 2012 से पहले हम अडूर की कोई नई फिल्म देख नहीं पाऐंगे।

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