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ताल और सुर से नाद की वर्षा

ताल और सुर से नाद की वर्षा

कामनवेल्थ खेलों के महाकुंभ में विदेशी पर्यटकों और खेल जगत के लोगों के लिए परंपरागत भारतीय संगीत की प्रस्तुति का एक बड़ा आयोजन कमानी सभागार में दिल्ली सरकार ने किया। नौ दिन के इस समारोह में देश के मशहूर गायक-वादक-पंडित राजन, साजन मिश्र, पंडित शिव कुमार शर्मा, सुधा रघुनाथ, पंडित देबू चौधरी, उमाकांत-रमाकांत गडेंचा, पंडित रामनरायण, भजन सोपोरी, छन्नू लाल मिश्र, सुजात खां, बडाली बंधु, राशिद मुस्तफा, अरुणा साई राम, अजय चक्रवती, हरि प्रसाद चौरसिया, विश्व मोहन भट्ट और एस. अरुण ने कार्यक्रम प्रस्तुत किए।

हालांकि इस उत्सव में विदेशी लोगों की हाजरी नहीं के बराबर थी पर भारतीय संगीत रसिकों का सैलाब जरूर हर रोज उमड़ा। इस कार्यक्रम में हर कलाकार ने अपने गायन-वादन की छाप छोड़ी। संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी ने अकरम खां की तबला संगत पर राग गावती की मोहक छटा बिखेरी। इस राग को राग भीम के नाम से भी पुकारते हैं। सुनने में यह रागेश्री जैसा भी लगता है।

संतूर वादन में भजन जी की अपनी अलग शैली और अंदाज है। उनके बजाने में ध्रुपद अंग की भी छाया दिखती है। आलाप-जोड़झाला से लेकर तालबद्ध गत को पेश करने में उन्होंने अपने कलात्मक वादन के रंग दिखाए। गमक, ताने, बोल बांट, तिहाई और लयकारी के विविध और खूबसूरत चलन उन्होंने पेश किए। द्रुत तीनताल में झाला भी हमेश की तरह असरदार था।
    
कार्यक्रम का समापन भजन सोपोरी ने कश्मीर के सुफियाना रचना को पेश करने में घाटी की सुगंध महकाई। देवीमां दुर्गा की स्तुति को राग हंसध्वनि में तन्मयता और भक्तिभाव में उन्होंने प्रस्तुत किया। उसके बाद ठेठ बनारसी अंदाज में उन्होंने पूरब गायिकी का रस बरसाया। राग खमाज में ठुमरी- ‘अब न बजाओ बंसुरिया’ के सुरीली गायन में श्रंगारिक नायिका के भाव की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति थी।

बनारस की लोक संस्कृति में रची-बसी चैती के रस का भरपूर आस्वादन छन्नू लाल के गाने में था। सावन में विरही नायिका के मनोभावो को उकेरती कजरी की भावपूर्ण प्रस्तुति में छन्नूलाल का गायन मन को छूने वाला था। उनके साथ तबला पर लग्गी और लयकारी को पेश करने में रामकुमार ने श्रोताओं को रोमांचित किया। 

उस्ताद विलायत खां की अनूठी वादन शैली की एक गहरी झलक बेटे सुजात खां में है। उनके वादन में तंत्रकारी और गायिकी अंग का वालिद की तरह भरपूर रसास्वादन है। उसकी एक रसमय झलक उनके द्वारा राग यमन और पहाड़ी की प्रस्तुति में दिखी। मीडं के स्वरों को निकालने में उनकी उंगलियों का स्पर्श बहुत कर्णाप्रिय था।

सुरीले वादक सुजात खां के बजाने में गजब की तैयारी है। वे गायक और कई पुकार की तानों को सुंदर लय में बांधकर अपना अनोखा अन्दाज दिखा रहे थे। तबला के दिग्गज वादक उस्ताद अहमद जान धिरकवा के भतीजे और उनके अनुयायी राशिद मुस्तफा धिरकवा ने भी वादन में धिरकती उंगलियों का जलवा दिखया। कायदा, पैशकार टुकड़े-गत, परनल लयकारी आदि के तिलस्मी रंग उनके वादन में थे। सर्वाधिक लोकप्रिय बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया के बजाने में फूंक की गूंज और स्वराभिव्यजंना में जो तासीर है उसका प्रभाव उनके द्वारा राग राग मारू विहाग, हंस ध्वनि, दुर्गा और पहाड़ी की प्रस्तुति में था। 
  
समारोह का समापन विश्वमोहन भट्ट के मोहक वीणा वादन और कर्नाटक संगीत में और अरुण के गायन से हुआ। बाब अलाउद्दीन के मैहर घराने की शैली में गुड़े विश्व मोहन भट्ट के बजाने की तकनीक में काफी बारीकियां दिखी। राग श्याम कल्याण को आलाप जोड़-झाला और गत को पेश करने में उनका एक खूबसूरत और रसपूर्णा अंदाज था

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