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धन्य-धन्य हिंदी साहित्य तेरा धन्य शताब्दीनामा

हिंदी लेखकों की शताब्दी मनाते-मनाते मैं खुद ‘शताब्दी’ हो चला हूं। लोग मुझे ‘सादर शताब्दी’ कहने लगे हैं। मेरा काम शताब्दी है। मेरा नाम शताब्दी है। मेरा ब्रांड शताब्दी है। मेरी बनियान शताब्दी है, मेरी चड्डी शताब्दी है। शताब्दी की डिमांड इतनी बढ़ गई है कि हर ओर से शतक बरस रहे हैं। हिंदी शताब्दी एक्सप्रेस फर्राटा भर रही है-
‘रेल गाड़ी
छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक
बीच वाले टेशन बोले
रुक रुक रुक रुक रुक रुक रुक रुक
यहां से वहां, वहां से यहां
धड़क-धड़क, लोहे की सड़क..’

इनकी शताब्दी। उनकी शताब्दी। दो रोज बाद उनकी पड़ रही है। ग्यारह दिन बाद किनकी पड़ रही है। हर दिन शताब्दी का हो रहा है।
रे मन तू क्यों रो रहा है?
तू भी तो ‘हो रहा’ है।
जब से अपनी शताब्दी एक्सप्रेस चली है, इतना बिजी हूं कि शतकों को गिनने की फुरसत नहीं होती। इधर से इतना। उधर से उतना। सरकार से इतना। प्रकाशक से इतना। अकादमी से इतना। 

इस कृतघ्न हिंदी में साहित्यानुरागी जनता अब तक बची हुई है। यह देखकर विह्वल हो रहा हूं। मुझे मालूम है कि वह दिल्ली में कम और दिल्ली की खराब नकल करते शहरों में ज्यादा साहित्यमय रहती है। उसमें साहित्य के प्रति कृतज्ञता का गहरा भाव है। जब साहित्य उसके पास से गुजरता है, तो वह सहज विनय में शिर-नत-पुलकित-रोमांचित हो उठती है। कहती है- धन्य-धन्य हिंदी साहित्य, थैंक्यू साहित्य थैंक्यू-थैंक्यू ‘जो तू बालम आया हमरे गेह रे।’ ओह आह अहो अहो अहो..की ध्वनि होने लगती है। भूमंडलीकरण समेत कई ‘करण’ से बने विराट उजाड़ में ऐसे सहृदयजन शताब्दी करके न केवल अपने को कृत-कृत्य समझते हैं, बल्कि इस जगत को भी कृतार्थ करते हैं।

आह! इस शताब्दी सुषमा का कहां तक बखान करूं। वह जगह-जगह बिखरी है। जिस स्टेशन पर शताब्दी रुकती है, वही शताब्दीमय हो उठता है। ‘चाए ग्रेम डॉट कॉम’ छाप ‘चाए ग्रेम’ की काव्यात्मक पुकार लगाने वाला छोकरा देखते ही हुलस प्रणाम कर कहता है- शताब्दी करने जा रहे हैं सरजी! शताब्दी के इस दौर में मालिक ने चाय-दारू सब फ्री कर दी है। इस स्टेशन का नाम ‘ग्लोबलिया’ हो गया है। पिछला स्टेशन ‘कोल्डवारी’ था। ‘कोल्डवारी कहानी’, ‘कोल्डवारी कविता’, ‘कोल्डवारी आलोचना’ के खोमचे लगते थे। अब कोल्डवार की जगह ‘कोकाकोला वार’ है। उससे अगला ‘ई-कविता’ का है, उससे अगला ‘ब्लॉग कविता’ का है।

एक बार की बात है कि कोल्डवार काव्य और आइडियोलॉजिकल इंजन (इति ‘काव्येंजन’) का संधिकाल था। एक बार तो इसी स्टेशन पर काव्येंजन ‘अंधेरे में’ ठहर ‘असाध्यवीणा’ बजाने लगा। बोले, मेरी अस्मिता भाभी की चाबी खो गई है! उस दिन उन शताब्दीजी ने यह रोमांचक संस्मरण सुनाया।

चाय वाला ‘शतबदिया’ गया था। बोलता गया- ए शताब्दी महाराज! एमए हिंदी कर रहा हूं। ‘अद्भुतवाद’ से बाहर निकलिए हुजूर और इस लाइन का जरा अर्थ उखाड़िए- ‘एक नीला आईना बेठोस..’। आईना है तो बेठोस क्यों हैं? बेठोस है, तो आईना क्यों? ‘आईना’ में ‘सभंग’ श्लेष लग रहा है। ‘आई ना’ पढ़ते ही प्रश्न उठता है, वो कौन थी जो ‘आई-ना’? ‘सभंग’ में खुद सुपर श्लेष चल रहा है। बताइए यहां ‘सभंग’ का मतलब ‘भंग सहित’ है, तो कौन-सी भंग? चांदनी चौक की धतूरे वाली या जमुना अखाड़े की तांबे को घिसकर घोटी भंग भवानी?

कोई सौ साल पहले हो गया, तो उसे तो होना ही था। पता नहीं कितने करोड़ सौ साल पहले हुए होंगे। सब की शताब्दी चल रही है। सबने कुछ न कुछ किया ही होगा। हां, इस लपेटे में अपनी शताब्दी चलवाना चाहते हो, तो आदरणीय जी पहले मरना पड़ेगा! मर जाइए! अभी इसी वक्त! पत्थर लगवा दूंगा कि यहां एक साहित्यकार शताब्दी मनाते-मनाते खुद ‘शताब्दी’ हो गया!

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