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आह और वाह के बीच जिम्मेदारी का अहसास

आखिरकार कॉमनवेल्थ खेल हो ही गए। खूब वाहवाही भी हो गई, लेकिन एक सवाल लगातार परेशान करता रहा कि अपना मीडिया इन खेलों को लेकर सहज क्यों नहीं हो पाया। एक दौर आह और कराह का था। दूसरा दौर वाह-वाह का था। मीडिया के तौर पर हमने पहले उन्हें उखाड़ने में कोई कसर नहीं रखी। अगर उस दौर की मीडिया रिपोर्ट पर जाएं, तो आपके जेहन में एक ही सवाल उठता कि क्या ये खेल हो भी पाएंगे? शर्म ही शर्म यानी भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, बदइंतजामी, नकारापन, धांधली..। कॉमनवेल्थ की तैयारी को लेकर मीडिया इसी के आसपास का मर्सिया गा रहा था। हम चौंके, जब बाकी दुनिया के लोग हमारी मीडिया में आई रिपोर्ट का हवाला दे-देकर बायकॉट करने की बात करने लगे।
 
उस आह-कराह के दौर में हमारा मीडिया चीन का उदाहरण दिए बिना नहीं माना। क्या ओलंपिक कराए थे चीन ने? लेकिन हमारा मीडिया भूल गया कि अपना देश लोकतांत्रिक है। वह चीन हो ही नहीं सकता। क्या चीन में कोई इतनी बातें लिख सकता था? वहां की कोई सड़क छह महीने के लिए बंद कर दी गई और चूं-चपड़ तक नहीं हुई। पूरी बस्ती उजाड़ कर सैकड़ों मील दूर फेंक दी गई, कोई सवाल नहीं उठा। क्या यह अपने यहां हो सकता था? लोकतंत्र में एक खुलापन होता है। और शायद उसी खुलेपन में मीडिया ने अपने तमाम संदेह लोगों के सामने खड़े कर दिए।
 
अपना मीडिया आह और वाह की अति पर रहता है। दुनिया आह और वाह के अलावा भी होती है। और मीडिया का काम इन दोनों के बीच संतुलन की तलाश होता है। खेलों के शुरू होने तक आह ही आह थी और उसके बाद वाह ही वाह। अपना मीडिया बहुत जल्द बह जाता है। आह और वाह की दुनिया बहाव की दुनिया होती है। उसमें ठहराव कहां होता है? हमारा मीडिया उसी बहाव की वजह से अक्सर गैर-जिम्मेदार हो जाता है। किसी भी जिम्मेदारी को निभाने के लिए ठहराव की जरूरत होती है और वह ठहराव अपना मीडिया नहीं दिखाता।
 
दरअसल, खेल शुरू होने से पहले हमें अपने लोगों को थोड़ी राहत देनी चाहिए थी। आखिर यह खेल नहीं होते तो किसी खास शख्स का कुछ नहीं बिगड़ता। उससे यह देश शर्मसार होता। फिर हम शायद लंबे समय तक कोई बड़ा खेल कराने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। अब कम से कम 2020 के आगे के ओलंपिक की दावेदारी तो कर ही सकते हैं, लेकिन हमारे मीडिया ने खेलों से पहले क्या नहीं लिखा। शर्म से जुड़े जितने शब्द वे ढूंढ़ सकते थे, ढूंढ़ लाए थे। उनका वश चलता तो शर्म के शीर्षक से ही तमाम रिपोर्ट प्रकाशित करते।   
 
खेल खत्म हो गया है, लेकिन मुद्दे वहीं के वहीं हैं। पैसा फेंक तमाशा हुआ। अफरा-तफरी में सब कुछ हुआ। भागमभाग में सारी तैयारियां हुईं। दस रुपए की चीज 100 रुपए में ली गई। शहर को सुधारने के मामले में गड़बड़ी ही गड़बड़ी हुई। दिखाने भर को विश्वस्तरीय महानगर हो गया दिल्ली। लेकिन..। अब अगर सब कुछ शांति से गुजर गया, तो उससे सवाल तो खत्म नहीं हो जाते। तमाम गड़बड़ियों के लिए कोई तो जिम्मेदार रहा होगा? दस दिन पहले का कोई विलेन अचानक हीरो तो नहीं हो जाता। वह भी तब जब मुद्दे और आरोप वहीं के वहीं हो।

उन आरोपों और मुद्दों में कोई गड़बड़ नहीं थी। बस उन्हें शायद गलत वक्त पर उठा दिया गया था और उसके पीछे मंशा ठीक नहीं थी। आखिर हम यही चाहते थे न कि खेल ठीक-ठाक हो जाएं। लेकिन हम बर्ताव ऐसे कर रहे थे कि पूरे आयोजन को ही उखाड़ फेंकना है। हमारी रिपोर्ट से देश की छवि का क्या हो रहा है? उस पर हमने ध्यान नहीं दिया। यही बात अपने मीडिया को सबसे ज्यादा ध्यान में रखनी थी।
 
और अब जब खेल खत्म हो गए हैं, तो मीडिया उन मुद्दों को भूल नहीं सकता। उद्घाटन समारोह और समापन समारोह की चमक-दमक में हमें अपने तमाम मुद्दे फीके नहीं लगने चाहिए। कॉमनवेल्थ खेलों में जरूरत से कई गुणा ज्यादा पैसा लगा। यह पैसा आम आदमी का ही तो था। हमें क्यों जवाब नहीं चाहिए कि उसके पैसे का अनाप-शनाप इस्तेमाल क्यों हुआ? कोई तो उसके लिए जिम्मेदार होगा? उस जिम्मेदार को तो सामने लाना मीडिया का कर्तव्य है। मामूली से मामूली चीज को हम बड़ी बना कर पेश कर रहे थे। अब कहीं बड़ी चीजें भी मामूली न लगने लगें। प्रधानमंत्री ने जांच कराने के आदेश दे दिए हैं, लेकिन मीडिया को उतने भर से खुश नहीं हो जाना चाहिए। वह जांच एक तय मुकाम तक पहुंचे यह भी मीडिया की ही जिम्मेदारी है।

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