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यहां प्रोफेसर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट करते हैं रामलीला मंचन

यहां प्रोफेसर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट करते हैं रामलीला मंचन

यह रामलीला थोड़ी अलग है.. इसमें सहायक प्रोफेसर-राम, मेडिकल छात्र-सीता, चार्टर्ड एकाउटेंट-लक्ष्मण, शिक्षक-हुनमान और इंजीनियर इसके मेकअपमैन हैं। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में पिछले छह दशकों से इस अनोखी रामलीला का मंचन बगैर किसी प्रशिक्षित कलाकार और तकनीशियन के स्थानीय नौकरीपेशा लोगों द्वारा ही होता आ रहा है।

बरेली शहर के सुभाषनगर मुहल्ले में होने वाली इस अनूठी रामलीला को डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकर, शिक्षक, दूसरे सरकारी व निजी विभागों के कार्यरत स्थानीय नौकरीपेशा लोग आपस में ही मिलकर करते आ रहे हैं। इनमें से किसी ने न तो अभिनय सीखा और न कभी किसी थिएटर में काम किया है।

पिछले सात वषरे से भगवान राम का किरदार निभाने वाले बरेली के एक मैनेजमेंट कॉलेज में सहायक प्रोफेसर अजय शर्मा ने आईएएनएस से कहा, ''हमारी इस परंपरागत रामलीला में आज तक किसी प्रशक्षिति कलाकार को शामिल नहीं किया गया। विभिन्न विभागों से जुड़े नौकरीपेशा लोग ही इस रामलीला का मंचन करते हैं। इसक कारण यह रामलीला बहुत की खास और अनोखी होती है।''

शर्मा कहते हैं, ''हमें इस बात का गर्व है कि हमारे पूर्वजांे द्वारा शुरू की गई रामलीला को हम जिंदा किए हुए हैं..यह सब स्थानीय लोगों के आपसी सहयोग से ही संभव हुआ, जो किसी तरह अपना कीमती समय निकालकर उत्साह से इस रामलीला के मंचन में शिरकत करते हैं।''

स्थानीय लोगों का कहना है कि सुभाषनगर मुहल्ले में करीब 68 साल पहले इस अनूठी रामलीला की शुरुआत हुई थी। कपड़ा व्यवसायी बृजेंद्र तिवारी कहते हैं कि स्थानीय व्यवसायी गौरीशंकर अग्रवाल ने इस रामलीला की बुनियाद रखी थी। असल में उस जमाने में यहां से करीब पचास किलोमीटर दूर ही रामलीला का मंचन होता था और वह परिवार लेकर उतनी दूर जाना पसंद नहीं करते थे।

उन्होंने स्थानीय लोगों के समक्ष सुभाषनगर में रामलीला की शुरू करने का प्रस्ताव रखा तो फैसला हुआ कि रामलीला का खर्च वह स्वयं वहन करेंगे और स्थानीय लोग उसमें अदाकारी करेंगे।

तब से स्थानीय लोगों का इस रामलीला में अभिनय करने का सिलसिला चला रहा है और इसके लिए जो धन की आवश्यकता होती है वह अब स्थानीय लोगों के चंदे से पूरी हो जाती है।

रामलीला में हनुमान का रोल करने वाले संपूर्णानंद डिग्री कॉलेज में इतिहास के शिक्षक अनिल मिश्रा कहते हैं कि शुरुआत में इसका मंचन स्थानीय (सुभाषनगर) पार्क में कच्चे चबूतरे पर होता था, लेकिन बाद में व्यवसायियों और स्थानीय लोगों द्वारा दिये गये चंदे के धन से वहीं पर बकायदा एक पक्का स्टेज का निर्माण करवा दिया गया।

दिलचस्प बात यह है कि इस रामलीला में अदाकारी करने वाले सभी नौकरीपेशा लोग रामलीला शुरू होने के कुछ दिन पूर्व रिहर्सल के लिए बकायदा अपने विभागों से छुट्टी ले लेते हैं।

बरेली से सटे रामपुर के दूरदशर्न केंद्र में इंजीनियर एंव रामलीला के मेकअप मैन विकास खन्ना कहते हैं कि हम लोग रामलीला शुरू होने से पहले रिहर्सल के लिए छुट्टी ले लेते हैं। इससे साफ होता है कि हम अपनी परंपरागत रामलीला को लेकर कितने गंभीर हैं।

यह रामलीला बरेली ही नहीं, बल्कि आस-पास के शाहजहांपुर, रामपुर, बदायूं जिलों में बहुत लोकप्रिय है।

बीमा कर्मचारी एवं रामलीला के निर्देशक जितेंद्र वर्मा कहते हैं कि करीब 15 दिन रामलीला का मंचन होता है। दूर-दूर से लोग इसे देखते आते हैं। किसी से शुल्क नहीं लिया जाता है।

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