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देश की प्रगति में आरक्षण एक महाअभिशाप

आजादी के 63 वर्ष बाद भी हमारा देश पूरी तरह खुशहाल एवं स्वतंत्र नहीं बन पाया है। भ्रष्ट राजनीति जैसे अभिशाप की मार से सोने की चिड़िया आज खिलौने के समान रह गयी है। देश को भ्रष्ट नेताओं और राजनीति ने खोखला कर दिया है। आज देश में आरक्षण का मुद्दा शीर्ष पर है। आये दिन अनेक संगठन या समुदाय आरक्षण को लेकर प्रदर्शन करते है। वास्तविक तौर पर देखा जाय तो इन सबके पीछे हमारी सरकार और लचर कानून व्यवस्था का हाथ है। भ्रष्ट राजनीति ने देश को विकलांग बना दिया है। आरक्षण देश की प्रगति में घातक सिद्ध हो रहा है। कारण पात्रों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। देखा जाय तो सामान्य वर्ग के अधिकांश परिवार ऐसे भी हैं जिनके पास दो वक्त की रोटी और सिर छुपाने के लिए छत भी नहीं है लेकिन सरकार फिर भी इस और कोई ध्यान नहीं दे रही है। सरकार सामान्य वर्ग के लोगों से सौतेला व्यवहार कर रही है। यदि देश को प्रगतिशील एवं समृद्ध बनाना है तो इसे आरक्षण जैसी दीमक से मुक्त कराना ही होगा।
कमल मिश्र, हरिद्वार

ताकि आत्महत्या न करें किसान
इस साल बदरा ऐसे बरसे कि 124 साल का रिकॉर्ड टूट गया। पहाड़ों में ऐसी तबाही हुई कि सुनकर रूह कांप जाती है। इस दैवीय आपदा पर राहत एवं बचाव कार्य भी हुआ और राजनीतिक रोटियां भी सेंकी गयीं। माननीय मुख्यमंत्री के दिल्ली दौरे, मंत्रियों और देश के सर्वे-सर्वाओं के हवाई दौरे भी खूब हुए। केन्द्र सरकार ने राज्य को 500 करोड़ की मदद देकर यह जताने की कोशिश भी की कि उनका हाथ गरीब के साथ है। मुख्यमंत्री ने भी इस राशि को प्रभावित लोगों तक पहुंचाने का संकल्प ले रखा है। तभी तो अब तक महज कुछ करोड़ ही खर्च कर पाये हैं। अगर सरकार से सवाल किया जाये कि इस वर्षा से कौन प्रभावित नहीं? तो शायद ही इसका जवाब उनके पास हो। अगर किसानों की बात की जाए तो उनके खेतों में कुछ भी नहीं बचा, उनके लिए दो वक्त का भोजन जुटाना मुश्किल हो रहा है। सैकड़ों एकड़ धान की खेती बर्बाद हो चुकी है और खेतों में हताशा और निराशा के अलावा कुछ भी नहीं बचा। इसलिए सरकार का दायित्व बनता है कि किसानों के हित में कोई ऐसी नीति बनाये जिससे किसान आत्महत्या करने को मजबूर न हों।
दिनेश उनियाल, काशीपुर

लोकतंत्र के लिए घातक है वंशवाद
भारतीय इतिहास में वंशवाद का वर्चस्व रहा है। भारत भले ही विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का दंभ भरता हो, किन्तु भारतीय मानसिकता आजादी के बावजूद भी कहीं न कहीं आग्रह से ग्रस्त है। वंशवाद न सिर्फ एक रुढ़ितंत्र है, बल्कि सामान्य-जन से उठकर पनपने वाली प्रतिभाशाली नेतृत्व की क्षमता वाली नई पीढ़ी के अवसरों को छीनने की दारुण व्यथा भी है। मुट्ठीभर लोग पूरे देश का भविष्य तय करते हैं, जनता उनको ऐसा करने के लिए भेजना चाहती है। तब पीढ़ियों से चले आ रहे अनुभव की दुहाइयां देकर अतंतोगत्वा उसे ही सौंप दी जाती है। वंशवाद के कारण नई विचारधारा पैदा नहीं हो पाती। वंशवाद के कारण राजनीति में आपराधिक प्रवृत्ति के लोग आ गये हैं।
कालिका प्रसाद सेमवाल, रुद्रप्रयाग

कन्याओं के बिना उन्नति संभव नहीं
अष्टमी का पर्व मात्र एक उत्सव तक सीमित नहीं है, अपितु सब लोगों के लिए आत्मचिन्तन व आत्ममंथन का अवसर है। कंजकों के रूप में कन्याओं का महत्व सर्वविदित है। कृत्रिम रूप से प्रकृति के अनमोल उपहार कन्याओं की संख्या को अल्प करने का प्रयास हम लोगों के लिए आत्मघाती है। जिस तरह कोई पक्षी मात्र एक पंख के सहारे उड़ नहीं सकता, उसी तरह बिना लड़कियों के समाज उन्नति पथ की यात्रा नहीं कर सकता। जिस घर में कोई स्त्री न हो उस घर के स्वरूप का अहसास ही भयानक होता है। कन्याओं का अस्तित्व न केवल देश के सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के लिए आवश्यक है, अपितु पुरुष की सम्पूर्णता के लिये भी।
प्रो. अनूप कुमार गक्खड़, हरिद्वार

भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद हों युवा
पूरे देश में नवरात्र और विजयदशमी की धूम है। इन दिनों देश के हर गली-मोहल्ले में रामलीलाओं का आयोजन किया जा रहा है। मयार्दा पुरुषोत्तम राम के जीवन दर्शन पर कई विद्वानों ने तमाम ग्रन्थाें की रचना की है। राम का जीवन एक धर्मनिष्ठ कर्तव्यपरायण और संयमी मनुष्य की तरह दर्शाया गया है। जो हजारों वर्षो से लोगों को अच्छे कार्यो के लिए प्रेरित कर रहा है, लेकिन आज का युवा वर्ग भौतिकतावादी संस्कृत में इतना उलझ गया है कि उसे राम के जीवन में छिपे शिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद जैसी समस्याओं से निपटने के अचूक हुनर को सीखने का वक्त नहीं है, जबकि भ्रष्टाचार की जडें़ देश को खोखला बना रही हैं। अगर हम सच्चाे अर्थो में विजयदशमी के त्योहार को मनाना चाहते हैं तो पहले हमें देश में फैली भ्रष्टाचार की जड़ों को उखाड़ फेंकना होगा।
राम अनुज, देहरादून

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