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अयोध्यावासी बनाम अयोध्यावादी

अयोध्या में रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद का विवाद महज जमीन का ही नहीं विचारधारा का भी है। जमीन वाले तो हल कर लेंगे लेकिन विचारधारा वाले उसे हल नहीं होने देंगे। वहां दो तरह के अयोध्यावाद टकरा रहे हैं। एक भव्य राममंदिर का निर्माण कर देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है तो दूसरा वहां सेक्युलरवाद का कड़ा इम्तिहान पास कर नास्तिकता और वैज्ञानिक सोच के आधार पर आधुनिक भारत बनाना चाहता है।

इसी में से एक खेमा कह रहा है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रथयात्रा और अयोध्या आंदोलन को सही साबित कर दिया है। दूसरा खेमा कह रहा है फैसला तर्क, साक्ष्य और कानून के आधार पर नहीं आस्था के आधार पर दिया गया है।

आइडियोलॉजी के इन दोनों खेमों से अलग एक तीसरा तबका उन अयोध्यावासियों और देशवासियों का है जो बार-बार के कर्फ्यू और दंगे से दुखी है। वह सोचता है कि लड़ाई झगड़ों के बावजूद इस देश में हजारों साल से हिंदू-मुसलमान एक साथ रहे हैं और उन्हें हजारों साल एक साथ रहना है। उसके लिए न्याय से बड़ा मूल्य भाईचारे का है और अगर वह रहेगा तो न्याय भी चलता रहेगा। इसलिए क्या कम क्या ज्यादा, क्या हार क्या जीत, बस इस मसले का हल निकलना चाहिए।

उसकी किसी विचारधारा और भगवान से बड़ी आस्था इंसान और समाज में लगती है यानी एक ओरआइडियोलॉजी और पॉवर के लिए एक दूसरे से टकरा रहे अयोध्यावादी हैं तो दूसरी ओर अमन और भाईचारे के लिए एकजुट हो रहे अयोध्यावासी और देशवासी हैं। 

लगता है अयोध्यावादियों और अयोध्यावासियों के इसी झगड़े को ध्यान में रखकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और विशेषकर न्यायमूर्ति एसयू खान ने किसी एक पक्षकार और राष्ट्रीय राजनीति नहीं, अयोध्यावासियों और उनके साथ खड़े बाकी देशवासियों के हक में फैसला दिया है। हालांकि धर्मनिरपेक्षता की यूरोपीय अवधारणा से अलग सांप्रदायिक सद्भाव को ध्यान में रखकर दिए गए इस फैसले को पहली तरह के अधोध्यावादी अपनी जीत और दूसरी तरह के अयोध्यावादी अपनी हार मान रहे हैं।

एक पक्षकार के स्तर से ऊपर उठकर सभी अयोध्यावासियों की इसी भावना को ध्यान में रखकर सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से मुकदमा लड़ने वाले मोहम्मद हाशिम अंसारी अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष संत ज्ञानदास के माध्यम से सुलह करने की पहल करते हैं। वे चाहते हैं कि यह मामला उनके जीते जी सुलझ जाए और सुप्रीम कोर्ट न जाए।

अयोध्या और फैजाबाद के लोग बहुत समय से यह दावा कर रहे हैं कि इस मामले से बाहर की ताकतें हट जाएं तो स्थानीय लोग विवाद को निपटा लेंगे। हालांकि अयोध्या के लोग इस विवाद को तब नहीं निपटा पाए जब इसमें विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी ने हाथ नहीं डाला था तो आज क्या निपटाएंगे, जब यह बात बहुत दूर चली गई है। पर वे एक यूटोपिया में जीते हैं और वही हमारी सभ्यता की आत्मा है।

इस यूटोपिया पर संदेह है और इसकी ठोस वजहें हैं लेकिन लोग सोचते हैं कि अयोध्या, अवध और बाकी देश ने इतना झेला है कि शायद यही विवेक काम आ जाए। यह तभी काम कर सकता है जब अयोध्या और फैजाबाद के लोग अपनी पहल को तेज कर उसके ठोस परिणाम निकालें और बाकी बड़ी मछलियां देश के दबाव में किनारे हो जाएं।

आखिर 50,000 की आबादी वाला छोटा-सा शहर कब तक लाखों लोगों के हमलों को भावनाओं का प्रकटीकरण मानता रहेगा और सुरक्षा बलों का फ्लैग मार्च देखता रहेगा? कुछ अच्छे और कुछ बुरे साधुओं और गृहस्थों का यह शहर सुबह सरयू में नहाकर यह सोचकर रामधुन गाता रहता है कि शायद इसी से उसके कष्ट कट जाएंगे। 

उसने रामराज्य नहीं देखा है और उसकी उम्मीद भी नहीं करता। वह हिंदुत्ववादियों और सेक्युलरवादियों से पूछ रहा है कि वह विचारधारा का भारी भरकम बोझ अपने छोटे कंधों पर क्यों, कब तक और कितना उठाए? वह एक सामान्य शहर होकर जीना चाहता है। भाईचारे के चलते ही हाशिम अंसारी जन्मस्थान से महज एक किलोमीटर दूरी पर और निर्मोही अखाड़े के बाबा भास्कर दास 20 किलोमीटर दूर फैजाबाद में रहते हैं। 

जन्मस्थान के उसी रामकोट के पास कुबेर टीले पर 1857 की बगावत में हिस्सा लेने के अपराध में हनुमान गढ़ी के बाबा रामचरण दास, बेगमपुरा के अच्छन खां और हसनपुरा के अमीर अली को 18 मार्च 1858 को इमली के पेड़ पर एक साथ फांसी दी गई थी। जब वह इमली का पेड़ देशभक्तों के लिए आराध्य बनने लगा तो अंग्रेजों ने 1935 में उसे कटवा दिया। यह साङी शहादत का नमूना है।

सवाल यह है कि हाई कोर्ट के फैसले से टूटते सेक्युलरवाद को कैसे बचाया जाए और मजबूत होते हिंदुत्ववाद को कैसे कमजोर किया जाए। क्या उसके लिए करुणानिधि के उस नजरिए को मान लिया जाए कि आर्य संस्कृति अंधविश्वास फैलाती है, इसलिए उसे द्रविड़ संस्कृति की तरफ मोड़ा जाए। पिछड़े-दलित आंदोलन में इस तरह की कुछ दृष्टियां पाई जाती हैं। उससे अयोध्या आंदोलन दबाया और कमजोर तो किया जा सका है, पर अयोध्या के विवाद को हल करने की चाभी वहां भी नहीं मिलती।

हिंदू देवी-देवताओं के साथ राम की कड़ी आलोचना करने वाले अंबेडकर भी हिंदुओं और उनके धार्मिक स्थलों पर मुगल शासकों के हमलों का बढ़-चढ़कर जिक्र करते हैं। जबकि राम के आदर्शो का महिमामंडन करने वाले राम मनोहर लोहिया भी मंदिरों के तोड़े जाने को स्वीकार ही करते हैं। वे बाबर, औरंगजेब तो छोड़िए अकबर, शाहजहां और जहांगीर को भी स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखते। बल्कि वे पानीपत के बजाय हल्दीघाटी की भावना जगाने का आह्वान करते हैं।

ये सारे चिंतक राजनेता धर्मनिरपेक्ष ही हैं, लेकिन आज के झगड़े का कोई सीधा वैचारिक हल नहीं देते। उससे तो अच्छा हल भगवान दास कमेटी की उस रपट में मिलता है जो 1931 के कानपुर दंगे में गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या के बाद बनाई गई थी। वह रपट साफ कहती है मुगल शासकों की क्रूरता को उलेमाओं और अंग्रेजों ने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था, जबकि वे वैसे थे नहीं।

धर्मनिरपेक्षता के इन टेढ़े-मेढ़े रास्तों को देखकर यही कहा जा सकता है कि उसका कोई एक फार्मूला है नहीं, बल्कि वह एक सतत खोज है। उसे त्यागना भी खतरनाक है तो उसे कट्टर बनाना भी। धर्मनिरपेक्षता को रोजाना प्रमाण पत्र बांटने वाले मठाधीशों  से भी भयभीत नहीं होना चाहिए। उसे गांधी की उस ताबीज को पहन कर चलना चाहिए जिसमें कतार के आखिरी आदमी का चेहरा हमेशा दिखाई पड़ता है। अयोध्या विवाद का हल वैचारिक जकड़न से मुक्त होने और साझे विरासत व भाईचारे के इसी रास्ते पर चलकर निकलेगा।

लेखक हिंदुस्तान में एसोशिएट एडीटर हैं। 
atripathi@livehindustan.com

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