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सर, ठीक तो है न

वह एक लंबी मीटिंग से लौटे थे। उनकी टीम का एक साथी काफी देर से इंतजार कर रहा था। उन्होंने उसकी रिपोर्ट देखी और अपने काम में लग गए। वह खड़ा रहा। फिर बोला, ‘सर, ठीक तो है न।’ 
 
डॉ. मिच प्रिंस्टीन का मानना है कि अपने बारे में बहुत ज्यादा सवाल नहीं करने चाहिए। ये सवाल कर हम आश्वस्त होना चाहते हैं। हमें दूसरे का सर्टिफिकेट चाहिए। यह निगेटिव सोच है। वह कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में क्लीनिकल साइकोलॉजी के डायरेक्टर हैं।
 
हम खुद को लेकर भरोसे में नहीं हैं। इसीलिए बार-बार अपने बारे में सवाल कर दूसरों को परेशान कर रहे हैं। दरअसल, हम हर दूसरे से सवाल कर जानना चाहते हैं कि सब ठीक तो कर रहे हैं। उससे पता चलता है कि हमारा आत्मविश्वास कहीं गड़बड़ है। अगर हमें अपने पर भरोसा होगा, तो कम से कम खुद के बारे में तो किसी से पूछेंगे नहीं। अगर हमारा काम दुरुस्त है, तो हमें किसी से उसके बारे में जानने की जरूरत नहीं रहती। 

बार-बार पूछ कर हम खुद को आश्वस्त करना चाहते हैं। यह आश्वस्ति का संकट हमारे निगेटिव फ्रेम को दिखाता है। हमें तो अपने काम से आश्वस्त होना चाहिए। उसमें किसी दूसरे की मुहर जरूरी नहीं है। इसीलिए सबसे पहले हमें अपने पर भरोसा होना चाहिए। उस भरोसे के लिए हमें मेहनत की जरूरत होती है।

हमारा जो भी काम है, अगर उसमें हम मेहनत करते हैं, तो भरोसा खुद-ब-खुद आ ही जाता है। हमें उसी भरोसे के लिए कोशिशें करनी चाहिए। वह कोशिश ही हमें बहुत दूर तक ले जाती है। तो अपने बारे में दूसरों के भरोसे मत रहिए। अपने कम भरोसे से दूसरे को परेशान मत कीजिए। हो सके तो अपने भरोसे को बुलंद कीजिए। वही हमें आगे ले जाएगा।

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