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गुरु ज्ञान कर्म ही प्रगति है

जो कर्म से भयभीत है, वह तो पृथ्वी का बोझ मात्र हैं। वेद में बहुत बड़े विद्वान पण्डित रोहित का उल्लेख है जो शास्त्रचर्चा करते-करते बिल्कुल निश्कर्म हो गये थे। चलना फिरना भी बन्द कर दिया था। इस प्रकार के निश्क्रिय व्यक्तियों द्वारा समाज का कोई अच्छा कार्य नहीं हो सकता। ये समाज के भार स्वरूप हैं।

रोहित के पिता इतने बड़े पण्डित तो नहीं थे, किन्तु बुद्धिमान थे, उन्होंने राहित को परामर्श दिया : ‘दुनिया में सब कुछ कर्म के द्वारा ही निश्पन्न होता है।’ कर्म क्या है? वस्तु के स्थान परिवर्तन का नाम ही कर्म है। इस पृथ्वी में जो कुछ भी हो रहा है, वस्तुगत स्थान परिवर्तन के द्वारा ही हो रहा है। पृथ्वी का जितना भी सौन्दर्य है, आकर्षण है, सबके पीछे है - वस्तु का स्थान परिवर्तन।

मनुष्य जिस दिन इस पृथ्वी से लगाव त्याग करके चला जाता है, तब भी यही एक तत्व काम करता है। कारण यह है कि मनुष्य एक ही अवस्था में दीर्घ दिन तक रह नहीं सकता। जो बूढ़ा हो गया, वह सोचता है— ‘ठीक है मैं बूढ़ा हो गया। अब मेरा इस पृथ्वी से चले जाना ही उचित है।’ बाद में फिर इस पृथ्वी का थोड़ा आकर्षण अनुभव करके कहता है, ‘अच्छा ठीक है, चलो थोड़े दिन और रह जाऊं।’

यह जो पार्थिव आकर्षण है, इस आकर्षण का अनुभव मनुष्य कर्म के माध्यम से ही करता है। इसके पीछे भी एक ही कर्मविज्ञान क्रियाशील है। इसलिए जो कर्म से डरता है, कर्म से दूर रहना चाहता है, वह जड़ है, एक निष्क्रिय सत्ता है। इस प्रकार के लोगों का इस पृथ्वी में रहना या न रहना दोनों समान हैं।

इसलिए रोहित के पिता ने उनसे कहा- ‘देखो रोहित! जो व्यक्ति सुन्दर रूप से काम कर रहा है, सिर का पसीना बहाकर परिश्रम कर रहा है। सुन्दर कर्म के बाद उसकी सारी देह से जो अविरल पसीना झर रहा है, और फलस्वरुप उसके सर्वाग से एक सौन्दर्य-छटा निकल रही है, पृथ्वी में इसकी कोई तुलना नहीं है। स्वयं देवराज इन्द्र भी इस प्रकार के मनुष्य का बन्धुत्व और साहचर्य की कामना करते हैं।’

जो मनुष्य इस चलने के धर्म को खो देते हैं, वे तो मृत हैं। जीवित मनुष्य का धर्म ही है चलना- रुके रहना तो मृत का लक्षण है। जिसने चलने का यह छन्द खो दिया है, आगे बढ़ने के छन्द को खो बैठा है, वह मनुष्यत्व के स्तर से नीचे की ओर उतरता जाता है, और अन्त तक चरम पापग्रस्त हो पशुत्व में परिणत हो जाता है। इसलिए ‘हे रोहित, तुम अपना पाण्डित्य लेकर जड़ की भाँति अचल होकर बैठे न रहना। चलते रहो। आगे बढ़ते जाना ही तुम्हारे जीवन का व्रत हो। तुम काम करते रहो! काम करते-करते मरो और मरते-मरते काम करो।’

जो मनुष्य लेटा रहता हैं, सोया रहता है, उसका भाग्य भी सोया रहता है। यहाँ सोए रहने का अर्थ है, अंधकार में डूबे रहना। अर्थात् शरीर तो मनुष्य का है, किन्तु उसका कार्य-कर्म बिल्कुल मनुष्योचित नहीं है। यहाँ तक कि मानस चिन्तन भी मनष्योचित नहीं है और जो निद्रा से जाग कर उठ बैठा है, उसका भाग्य भी उठकर खड़ा हो गया है। जो लक्ष्य की ओर चलना शुरू कर देता है, उसका भाग्य भी उठकर चलना शुरू कर देता है। इसलिए ‘हे रोहित, तुम मूर्ख की भाँति काम न करो- आगे बढ़े चलो। ‘चरैवेति.. चरैवति.. आगे बढ़ते चलो.. आगे बढ़ते चलो। यह आगे बढ़ना ही तुम्हारे जीवन का मूलमन्त्र हो।   

प्रस्तुति: आचार्य दिव्यचेतनानन्द
(21 अक्टूबर को श्री श्री आनन्दमूर्तिजी का 20वां महाप्रयाण दिवस है)

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