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किसका डोमेन तेरा या मेरा

इंटरनेट पर अपनी विशिष्ट पहचान के लिए डोमेन नेम का पंजीकरण उतनी सरल क्रिया नहीं है जितनी नजर आती है। दुनिया भर में डोमेन नेम संबंधी विवाद कई बार इतने गहराए कि बड़े-बड़े संस्थानों को भी दल-बल सहित अदालतों के चक्कर काटने पड़े। आज जानिए डोमेन नेम से जुड़े कई अनजाने पहलुओं को

इधर देश के दो प्रमुख राजनीतिक दल एक इंटरनेट डोमेन नेम के मालिकाने के विवाद में उलझ पड़े थे। मसला bjp.com नामक एक डोमेन नेम का है जिस पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अपना अधिकार मान रही है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि वह भारत जर्नल एंड पब्लिशर्स (बीजेपी) नामक संस्था की संपत्ति है। दरअसल, इंटरनेट की दुनिया में इस किस्म के विवाद आम हैं। bjp.org नामक आधिकारिक डोमेन नेम पर अपनी वेबसाइट का संचालन करने वाली भाजपा ने कांग्रेस पर अपनी डिजिटल ‘पहचान चुराने’ का आरोप लगाया है। इसे कांग्रेस ‘बचकाना’ करार दे रही है। हालांकि पहली नजर में यही लगता है कि bjp.com स्वाभाविक रूप से भारतीय जनता पार्टी के लिए सुरक्षित होना चाहिए, लेकिन इस बारे में सही-सही राय बनाने से पहले इंटरनेट पर डोमेन नेम के मायाजाल को समझना जरूरी है। जब आप वेब पर किसी भी संस्था, पार्टी, व्यक्ति आदि की वेबसाइट पर जाना चाहते हैं तो इंटरनेट एक्स्प्लोरर (या अपने किसी अन्य पसंदीदा ब्राउजर) पर एक वेब पता टाइप करते हैं जो आपको इंटरनेट पर मौजूद करोड़ों सर्वरों में से किसी एक पर मौजूद संबंधित वेबसाइट तक ले जाता है। यही पता डोमेन नेम है जिसे होस्टनेम भी कहते हैं।
कहने को तो हर व्यक्ति, संगठन अपने नाम से जुड़ा डोमेन नेम हासिल करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन व्यवहार में यह इतना आसान नहीं। हालांकि डोमेन नेम प्रणाली तकनीकी रूप से तो बेहद कारगर है, लेकिन उसके कारोबारी संचालन में गंभीर खामियां हैं, जो आपको लाभ और नुकसान दोनों पहुंचा सकती हैं। दूसरे, किसी डोमेन नेम पर वास्तव में किसका दूसरों से ज्यादा अधिकार है, यह विवाद का विषय होता है। लगभग पौने सात अरब की आबादी वाली दुनिया में एक ही नाम वाले संगठनों, व्यक्तियों, संस्थाओं, दलों, कंपनियों आदि की संख्या की कोई सीमा नहीं है, लेकिन उनके मुकाबले में डोमेन नाम गिने-चुने ही हैं। मौजूदा डोमेन नेम व्यवस्था में आमूल बदलावों की जरूरत पर अरसे से बहस हो रही है। इस दिशा में काफी गति आई है और संभवत: भविष्य में ऐसी व्यवस्था विकसित कर ली जाए जिसमें विवादों की गुंजाइश न के बराबर हो।

पहले आओ, पहले पाओ
मौजूदा स्थिति में डोमेन नेम पंजीकरण प्रणाली का संचालन करने वालों के लिए इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि इन नामों को ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर जारी किया जाता। यदि पंजीकरण करने वाली कंपनियां सही दावेदार का फैसला करने में जुट जाएं तो शायद उन्हें एक-एक नाम के बारे में निर्णय करने में ही कुछ हफ्ते लग जाएं। फिर भी इसकी गारंटी नहीं होगी कि कब कोई व्यक्ति, जो पहले इस क्रिया से अनभिज्ञ था, दावा पेश कर दे।
डोमेन नेम का पंजीकरण काफी हद तक संयोग, फैसले की तेजी आदि पर निर्भर करता है। हां, अगर कोई बहुचलित ब्रांड या सिद्ध संगठन चाहे तो अपने नाम से पंजीकृत कराए गए डोमेन नेम को कानूनी चुनौती दे सकता है और ऐसे कई मामलों में उन्हें दूसरों से अधिक मजबूत हकदार मानते हुए डोमेन नेम को उनके मौजूदा नियंत्रकों से खाली भी कराया जाता रहा है। लेकिन यह एक सच्चाई है कि डोमेन नेम पंजीकरण व्यवस्था आमतौर पर नियंत्रणों से मुक्त है और कोई भी व्यक्ति किसी भी डोमेन नाम का (यदि वह उपलब्ध है) पंजीकरण करवाने के लिए स्वतंत्र है। मजबूरी से उपजी इसी ढिलाई के चलते यह कुछ लोगों के लिए आकर्षक व्यवसाय भी बन चुका है। कई लोग सिद्ध लोगों, कंपनियों, संगठनों, ब्रांडों आदि के नाम से डोमेन नेम पंजीकृत करवा लेते हैं और बाद में उन्हें सौंपने के लिए मुंहमांगी रकम वसूलते हैं। ऐसे लोगों को ‘साइबरस्क्वेटर‘ (इंटरनेट अतिक्रमणकारी) कहा जाता है।
आज अंग्रेजी डिक्शनरी का शायद ही कोई शब्द होगा जिसके नाम पर डोमेन नेम पंजीकृत न हो। इसी तरह तीन या चार अक्षरों के एब्रीविएशन (ABC, NTPC, BBC आदि संक्षिप्ताक्षर) का शायद ही कोई संयोजन खाली पड़ा हो। अगर आपको किसी पूर्व-पंजीकृत डोमेन नेम की जरूरत है तो संबंधित व्यक्ति को समझा-बुझाकर या मांगी गई कीमत अदा कर उसे हासिल कीजिए। अगर आप उस पर अपना अधिकार समझते हैं, तो कानूनी विकल्प भी उपलब्ध है।

किस नाम पर किसका हक
तो bjp.com डोमेन नेम पर किसका हक बनेगा? हालांकि डोमेन नेम आपका ट्रेडमार्क नहीं है, लेकिन फिर भी कुछ हद तक इसके फैसलों का निपटारा ट्रेडमार्क की तर्ज पर ही होता है। अलबत्ता, जहां ट्रेडमार्क में फैसले का आधार सिर्फ नाम ही होता है, वहीं डोमेन नेम का दायरा अधिक व्यापक है क्योंकि ये नाम कई श्रेणियों के होते हैं जिन्हें अलग-अलग एक्सटेंशन (.काम, .नेट आदि) के साथ दिखाया जाता है। ऐसे में, संभव है कि एक श्रेणी के डोमेन नेम पर इस संगठन का और दूसरी श्रेणी के डोमेन नेम पर दूसरे संगठन का दावा ज्यादा बल एवं स्वाभाविक माना जाए।
1980 के दशक में जब डोमेन नेम प्रणाली तैयार की गई थी तो उसमें दो तरह के टॉप लेवल डोमेन (टीएलडी) शामिल किए गए थे- जेनेरिक टीएलजी और कंट्री कोड टीएलडी। पहली श्रेणी में तीन अंग्रेजी अक्षरों के संयोजन से बने सात डोमेन एक्सटेंशन थे- .कॉम, .नेट, .ऑर्ग, .एडु, .मिल, .गव और .इन्ट। इनमें से .कॉम कंपनियों के लिए, .ऑर्ग चैरिटी या अन्य गैर-लाभकारी संगठनों के लिए, .नेट नेटवर्किंग कंपनियों के लिए, .एडु शिक्षण संस्थाओं के लिए, .मिल सैन्य संगठनों के लिए, .गव सरकारी संस्थानों के लिए और .इन्ट अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए। हालांकि डोमेन नामों से जुड़े मुद्दों का संचालन करने वाली शीर्ष संस्था इंटरनेट कॉर्पोरेशन फॉर एसाइन्ड नेम्स एंड नंबर्स ((ICANN) ने और उसकी पूर्ववर्ती संस्था इंटरनिक ने इन ढीले-ढाले नियमों को लागू करने में कभी सख्ती नहीं दिखाई। इसलिए पहली तीन श्रेणियों में डोमेन नेम पंजीकृत करवाने पर लगभग किसी भी किस्म की सीमा नहीं है। अलबत्ता, डोमेन नेम संबंधी विवाद उठने पर जरूर संबंधित एक्सटेंशन के उद्देश्यों का हवाला दिया जाता है। कंट्री कोड टीएलडी दूसरी श्रेणी के डोमेन नेम हैं जिन्हें दुनिया के लगभग हर देश के लिए सुरक्षित किया गया है। ये दो अक्षरों में लिखे जाते हैं, जैसे भारत के लिए .इन, पाकिस्तान के लिए पीके, इंग्लैंड के लिए य़ूके आदि। इन्हें आगे विस्तार देते हुए सैकंड लेवल डोमेन नेम भी विकसित किए गए हैं जो इस तरह लिखे जाते हैं- .को.इन या .ओर्ग.इन। आज जेनेरिक डोमेन नामों की संख्या भी बढ़ते-बढ़ते 21 हो चुकी है। बहुत से संगठन क़ॉम, ऩेट, ऑर्ग, .इन आदि कई एक्सटेंशन में डोमेन बुक करवा लेते हैं ताकि उनकी ‘पहचान’ पर संकट न आए। लेकिन ‘पहचान’ का मुद्दा इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे किस रूप में लेते हैं। अगर आप इसे लेकर बहुत ही ज्यादा संवेदनशील हैं तो फिर क़ॉम ही क्यों, .नेट सहित कुल मिलाकर 21 जेनेरिक टॉप लेवल डोमेन और 250 से अधिक कंट्री लेवल डोमेन पंजीकृत करवाने के बाद ही आप चैन की सांस ले सकेंगे। या शायद फिर भी नहीं।

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