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सुरक्षा परिषद से गढ़ें हम नई दुनिया

भारत सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य कोई पहली बार नहीं बना है लेकिन इस बार बनने का जो महत्व है, वह पहले कभी नहीं रहा। सबसे पहली बात तो यह है कि इस बार उसे जितना प्रचंड बहुमत मिला, उतना उसे पिछली छह विजयों में कभी नहीं मिला। उसे 191 में से 187 वोट मिले। इतने वोट किसी अन्य राष्ट्र को भी नहीं मिले। सुरक्षा परिषद के कुल 15 सदस्यों में से 10 अस्थायी होते हैं। ये दस सदस्य केवल दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के कम से कम 128 सदस्यों के वोटों के बिना कोई भी सदस्य-राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नहीं चुना जा सकता है। इस बार जर्मनी भी चुना गया है लेकिन उसे सिर्फ एक वोट ज्यादा मिला है जबकि भारत के विरुद्ध सिर्फ एक वोट पड़ा है। यह गौर करने लायक है कि पाकिस्तान और चीन ने भी भारत के पक्ष में वोट दिया है। यह ठीक है कि एशिया से सिर्फ भारत लड़ रहा था। उसका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। कजाकिस्तान ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी लेकिन इस स्थिति में भी पाक और चीन चाहते तो विपक्ष में वोट कर सकते थे या मतदान से अलग रह सकते थे। भारत की जगह आज अमेरिका होता तो शायद उसे भी इतने वोट नहीं मिलते।
इसका अर्थ क्या निकला? यही कि आज भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के शिखर पर है। याद करें, 1996 को। इसी पद के लिए भारत का मुकाबला जापान से हुआ था। तब भारत को सिर्फ 42 वोट मिले थे। बहुत कटुता और निराशा फैली थी। पिछली बार भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य 19 साल पहले बना था। इन दो दशकों में भारत कहां से कहां पहुंच गया है। अमेरिका और चीन ने भारत की विजय का स्वागत किया है। न्यूयार्क के हमारे संयुक्त राष्ट्र मिशन के राजनयिकों और विदेश मंत्रलय के परिश्रम ने भारत का सिर ऊंचा किया है लेकिन भारत को मिली इस अपूर्व सफलता के पीछे तीन तत्वों का योगदान अप्रतिम है।
एक तो भारत का परमाणु-शक्ति बनना। हमारे पास 20 साल पहले परमाणु बम नहीं था। वाजपेयी-सरकार ने हिम्मत की। उसका फायदा अब मिल रहा है। दूसरा तत्व है, भारत की आर्थिक प्रगति, जिसका श्रेय नरसिंह राव-मनमोहन सिंह की जोड़ी को जाता है। आज भारत सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों से भी बेहतर आर्थिक-प्रबंधन का प्रमाण उपस्थित कर रहा है। तीसरा तत्व है, भारत का लोकतंत्र और राजनीतिक स्थिरता। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक और स्थिर राष्ट्र के तौर पर भारत अद्वितीय है। इसीलिए सुरक्षा परिषद में उसकी यह सातवीं विजय भी अद्वितीय है।
यह अद्वितीय तो है, लेकिन अस्थायी है। सिर्फ दो साल के लिए है और फिर अस्थायी होने के कारण भारत के पास वीटो भी नहीं है। जिन पांच स्थायी सदस्यों- अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, चीन - के पास वीटो है, वे शेष दस अस्थायी सदस्यों के किसी भी प्रस्ताव को रद्दी को टोकरी में फिकवा सकते हैं। अकेला एक स्थायी सदस्य चाहे तो पूरी सुरक्षा परिषद को ठप्प कर सकता है। शीतयुद्ध के दौरान अकेला सोवियत संघ पूरे संयुक्त राष्ट्र को उंगली पर उठाए रखता था। ऐसे में भी हम खुश हैं तो क्यों?
इसका मुख्य कारण है विश्व राजनीति का बदला हुआ स्वरूप। अब राजनीति दो-ध्रुवीय नहीं रह गई। रूस और अमेरिका की जगह अब नए-नए राष्ट्र और उनके समूह उभर आए हैं। इसमें संदेह नहीं कि अमेरिका आज विश्व की एक मात्र महत्तम शक्ति बन गया है, लेकिन उसका आर्थिक और सामरिक रुतबा घटता जा रहा है। आर्थिक मंदी और इराक व अफगानिस्तान ने उसकी कमर झुका दी है। वह बूढ़ा और थका हुआ मालूम पड़ने लगा है। इसीलिए अब इस मांग ने जोर पकड़ लिया है कि संयुक्त राष्ट्र  के ढांचे और कार्य-प्रणाली में सुधार किया जाए। 2010 में विश्व राजनीति वह नहीं रह गई, जो वह 1945 में हुआ करती थी। द्वितीय महायुद्घ के विजेता राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र को अपनी मर्जी के मुताबिक गढ़ लिया था, लेकिन अब समसामयिक यथार्थ को ठीक से प्रतिबिंबित करने के लिए आमूल-चूल सुधारों की जरूरत है। भारत का सुरक्षा परिषद में पहुंचना इस जरूरत को सशक्त वाणी प्रदान करेगा। सिर्फ भारत ही नहीं, जापान, जर्मनी, ब्राजील, द़ अफ्रीका जैसे राष्ट्रों को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता देने की मांग अब जोरों से उठेगी। कैसा अद्भुत संयोग है कि इस बार सुरक्षा परिषद में भारत, जर्मनी, ब्राजील और द़ अफ्रीका- ये चारों राष्ट्र सदस्य के रूप में एक साथ बैठेंगे। इसके अलावा ब्रिक-समूह के चार राष्ट्र-ब्राजील, रूस, चीन और भारत- भी इस बार वहां होंगे। ये सभी राष्ट्र अगर एकमत होकर आगे बढ़ेंगे, तो अकेला अमेरिका सबका कोपभाजन क्यों बनेगा?
अमेरिका यह जरूर चाहेगा कि सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के तौर पर भारत का आचरण उसके सर्वथा अनुकूल रहे यानी वह अगले दो वर्षों के काल को भारत का ‘प्रोबेशन पीरियड’ मानकर चलेगा। वह संतुष्ट रहा तो भारत के लिए सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनना कठिन नहीं होगा। लेकिन क्या भारत ‘कठपुतली राष्ट्र’ की भूमिका निभा सकेगा? क्या वह ब्रिटेन की-सी भूमिका अदा कर पाएगा? यदि वह कर पाए तो भी उसे नहीं करना चाहिए। आप महाभारत के योद्धा घोषित होने के लालच में क्या बृहन्नला की तरह नाचने को तैयार होंगे? अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा अभिकरण में दो बार ईरान के विरुद्ध वोट देकर हम अपनी छवि विकृत कर चुके हैं। अब मामला इराक का हो, अफगानिस्तान का हो, ईरान का हो, फलस्तीन का हो, कोरिया का हो या परमाणु-प्रसार का हो- भारत को निष्पक्ष और निडर होकर अपनी राय रखनी होगी। इस कारण यदि उसे अपनी स्थायी सीट खोनी भी पड़े तो कोई बात नहीं। उसके बिना भी संसार में उसका रुतबा नैतिक महत्तम शक्ति का बन जाएगा, जो काफी हद तक अब भी है। यह सवाल विदेश नीति से  भी ज्यादा स्वदेश नीति का है। हमें पहले यह तय करना होगा कि हम कैसी महाशक्ति बनना चाहते हैं? भयंकर महाशक्ति या प्रियंकर महाशक्ति? भयंकर महाशक्ति बनने के दिन लदने जा रहे हैं। चीन जैसा आक्रामक राष्ट्र अब नए सबक सीख रहा है, तो हम 19 वीं और 20 वीं सदी की शक्ति-प्रतिस्पर्धा की राजनीति में उलझने की भूल क्यों करें? अपनी नई हैसियत के साथ-साथ हम नई दुनिया भी गढे़।
लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं

 

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