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कर्नाटक: सरकार बची पर साख गई

येदीयुरप्पा सरकार ने हालांकि विधानसभा में दूसरी बार भी विश्वास मत किसी तरह जीत लिया लेकिन इस प्रक्रिया में सरकार की साख को बट्टा लगा है। मुख्यमंत्री ने पहली बार जब विधानसभा में विश्वास मत का प्रस्ताव पेश किया तो जिस तरह का हंगामा हुआ, वह अन्य विधानसभाओं में होता रहा है पर कर्नाटक में पहली बार हुआ है। उसके बाद वर्दीधारी
पुलिस विधानसभा में घुसी, जो देश में पहली बार हुआ है। यह पहली बार हुआ कि विधानसभा में विश्वास मत को ध्वनिमत से स्वीकार कर लिया गया। यह भी पहली बार हुआ है निर्दलीय विधायकों को निलंबित किया गया।
तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए ऐसा हो सकता है कि आने वाले समय में भाजपा को कुछ अप्रत्याशित समस्याओं का सामना करना पड़े। जो भी हो पर राजनीतिक मशीन का चक्का पूरी तरह घूम गया है और विधानसभा के भीतर सत्ता और विपक्ष की ताकत आजमाए जाने का मुद्दा सतह पर आ गया है। यहां यह याद दिलाए जाने की जरूरत है कि 1989 में एसआर बोम्मई की सरकार की बर्खास्तगी के बाद ही इस मुद्दे पर न्यायिक समीक्षा का सवाल उठा था। जनता दल सरकार बर्खास्तगी का मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले गई, जिसने 1994 में अपना फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि राज्य सरकार महज जायज परिस्थितियों में बर्खास्त की जा सकती है और उसके लिए दिशानिर्देश तय किए। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में साफ तौर पर कहा है कि शक्ति परीक्षण के लिए सदन ही उपयुक्त स्थान है। हालांकि राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के नियमों का अक्सर उल्लंघन करते हैं लेकिन बोम्मई मुकदमे के फैसले का बहुत अच्छा असर रहा। इसके बाद राज्य सरकारों को बर्खास्त करना और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना थोड़ा मुश्किल हो गया। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बोम्मई मामले में फैसला आने के बाद वैधानिक स्थिति यह थी कि अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल की न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती। केंद्र और राज्य संबंधों के बारे में गठित सरकारिया आयोग ने अनुच्छेद 356 के इतर कारणों से प्रयोग किए जाने की निंदा की थी।
विश्वासमत में येदीयुरप्पा के जीतने से बड़ी बात यह है कि अब राज्य राजनीतिक अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर चुका है। राज्यपाल एच आर भारद्वाज एक बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश केंद्र को कर ही चुके हैं अब क्या वे दोबारा ऐसा करेंगे? संप्रग सरकार के पास न तो राज्यसभा और न ही लोकसभा में बहुमत के लिए पर्याप्त संख्या है। कांग्रेस के लिए इस मामले पर वामपंथी दलों को विश्वास में ले पाना लगभग असंभव होगा। उसके कुछ प्रमुख घटक दल भी राष्ट्रपति शासन के फैसले का समर्थन नहीं करेंगे। अगर कांग्रेस इस बाधा को पार भी कर लेती है तो आगे क्या होगा? क्या राज्य में कांग्रेस और जनता दल(एस) की संयुक्त सरकार बनेगी? यह सही है कि बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं से नाराजगी और राज्य में भाजपा शासन के अंत की इच्छा के अलावा उनके बीच और किसी मुद्दे पर मतैक्य नहीं है। वास्तव में दोनों पार्टियों के बीच राज्य स्तर पर कोई तालमेल नहीं है, न ही नेताओं में कोई व्यक्तिगत समझदारी है। कांग्रेस साफ तौर पर चाहेगी कि सिद्धरमैया मुख्यमंत्री बनें पर उन्हें देवगौड़ा का परिवार स्वीकार नहीं करेगा।
असमंजस की मौजूदा स्थिति में मध्यावधि चुनाव ही एकमात्र समाधान दिखाई पड़ता है। अगर राज्य में ऐसा होता है तो येदीयुरप्पा के हाथ से राज्य राजनीतिक रुझान को मोड़ने का अवसर चला जाएगा। वे राज्य के असरदार लिंगायत समुदाय के एक और ऐसे मुख्यमंत्री होंगे जो अपना कार्यकाल नहीं पूरा कर सकेंगे। इन बातों के अलावा हैरानी इस बात की है कि भाजपा ने दक्षिण में अपनी पहली सरकार को आदर्श सरकार बनाने का जो संकल्प किया था उसका क्या हुआ? सत्तारूढ़ पार्टी में साल भर से संकट खदबदा रहा है। इसके बावजूद पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अपनी आंतरिक समस्या को हल करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। कर्नाटक राज्य के प्रभारी और हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार पिछले कई महीनों से राज्य में देखे नहीं गए हैं। न ही वे उन असंतुष्टों से मिले हैं जो काफी समय से अपना असंतोष व्यक्त करते रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने संगठन के स्तर पर राज्य को जिस तरह उपेक्षित छोड़ दिया, उसके नुकसान उसे उठाने पड़ेंगे। चुनाव जब भी हों, पर सहानुभूति के आधार पर भाजपा के अगला चुनाव जीतने की उम्मीद नहीं है। आम आदमी में भाजपा के लिए कोई सहानुभूति नहीं बची है, क्योंकि वे इस शासन न कर पाने वाली सरकार से ऊब चुके हैं।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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