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शार्गिदों की उस्तादी

आधुनिक युग में हम भले ही ग्लोब के ऊपर बैठे हों, लेकिन प्राथमिक पाठशाला के गुरु हमेशा याद रहते हैं। मेरे गुरु तो घंटाल भी थे। सवाल-जवाब उनका सबसे बड़ा शौक था। वे खुद सवाल करते। मेरे कान उमेठते और जवाब रटवा देते। आज के जमाने वाली मेरी जनरल नॉलेज भले ही फुस्स हो, लेकिन पिछली वाली अब भी पंचतंत्र और हितोपदेश जैसी ऐतिहासिक है। जैसे- समुद्र में क्या नहीं समा सकता? यश। नारी क्या नहीं बन सकती? नर। चिंता से मुक्त कौन? बच्चा। जो कभी झूठ न बोले वो? सच्च। सबसे उपयोगी फूल कौन सा? कपास का। कवियों को लगने वाल रोग? छपास का। सबसे प्यारी चीज क्या? नींद। सबसे बड़ा आनंद? परनिन्दा। सबसे ज्यादा काला क्या? काजल। काजल से भी काला क्या? कलंक। सबसे सुंदर कौन? पराई स्त्री। सबसे अधिक सच्च क्या? दुख। दुख का कारण? सुख। सबसे बड़ा दान क्या? क्षमादान। सबसे बड़ा दोमुंहा कौन? पाकिस्तान। सबसे ज्यादा असंतोष किससे? अपने धन से। गम किसे नहीं होता? बेगम को।
अब हजूर इस तरह के सवालों का ये किस्सा तो अलिफ लैलाई लम्बाई का है। कुल मिलाकर यह अयोध्यावाले फैसले के सारे जजों के सारे पन्नों से भी ज्यादा। पर दवाई के कैप्सूल तो बन सकते हैं मगर लंतरानियों और बतकाईयों के नहीं। बात बंदूक से निकली है तो किसी की छाती तलक तो जाएगी ही। आखिरी बात कह के इजाजत लेता हूं हजूर कि एक बार मैंने भी झकास कंटाप दे मारा था। गुरु जी ने पूछ लिया- सबसे अक्लमंद कौन? मैंने कहा- जो बराबर जवाब देता रहे। उन्होंने फिर कोहनी मारी- सबसे बड़ा मूर्ख कौन? मैंने कहा- जो अहमक फिर भी सवाल पूछता रहे।

 

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