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अच्छे खेल के बाद

राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन और प्रदर्शन में भारत ने आशंकाओं के अंधेरे को चीर कर उम्मीदों की मशाल जला दी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत की आर्थिक तरक्की की जमीन बड़ी मजबूत है और वह वैश्विक आर्थिक मंदी के बावजूद कायम रही है। भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि वह तमाशे को सजा ही नहीं सकता, उसे अच्छी तरह कर भी सकता है। निश्चित तौर पर यह हमारे लिए गर्व करने और जश्न मनाने का मौका है। हमें वह करना चाहिए और इस बार की दिवाली राष्ट्रमंडल की कामयाबी के नाम कर देनी चाहिए। उसी के साथ हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि तीरगी के भीतर से यह मशाल इस तरह लेकर चलें कि उसकी रोशनी बची रहे और दूसरी जगहों पर भी फैले। अगर 19वें राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के पास मेलबॉर्न का रिकार्ड तोड़ने और स्त्री शक्ति के उदय की चमक है तो उसके नीचे भूख, भ्रष्टाचार और पुरुष सत्ता का अंधेरा भी है। इस खेल ने कई मिथक तोड़े हैं, तो कई अंतर्विरोधों को उजागर किया है। इस खेल का सबब यह है कि उन्हें समझा जाए और उसके आधार पर लंबी छलांग लगाने वाले एक बेहतर समाज और ऊंची छलांग लगाने वाले राष्ट्र का निर्माण किया जाए। यह संयोग नहीं है कि जिस समय भारत राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदकों को छीन-छीन कर इंग्लैंड को तीसरे नंबर पर बार-बार ठेल रहा था, उसी समय उसका शेयर बाजार भी बीस हजारी के ऊपर कुलाचें भर रहा था। दूसरी तरफ इसी दौरान जारी हुई इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की रपट में यह भी बताया गया कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स के मामले में भारत, चीन ही नहीं, पाकिस्तान और नेपाल से भी काफी नीचे है। बल्कि राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रहे दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी भारत से काफी ऊपर हैं। इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि अगर आपके देश में भूख की समस्या नहीं है तो आप खेल में स्वत: बहुत बड़ी ताकत बन जाएंगे।
इस सच्चई को तो स्वीकार करना पड़ेगा कि कोई भी भूखा रहने वाला देश खेल में बड़ी ताकत नहीं बन सकता। न ही अपने लोगों को भूखा रख कर खेलों पर भारी खर्च का औचित्य सिद्ध कर सकता है। इसलिए इस खेल को ही इंजन बनाकर और इसकी उपलब्धियों की मशाल की रोशनी में भूख का अंधेरा मिटाना चाहिए। इस खेल ने सबसे बड़ा विरोधाभास महिलाओं के प्रदर्शन के बारे में प्रस्तुत किया है। जिन इलाकों में पुरुष-स्त्री अनुपात कम होने और स्त्रियों पर ज्यादा अत्याचार होने की घटनाएं सुनाई पड़ती थीं, उन्हीं इलाकों की महिलाओं ने भारत के कई रिकार्ड तोड़ते हुए तिरंगे को आसमान में फहरा दिया। इससे क्या यह मान लिया जाए कि उस समाज की हकीकत को ठीक से समझा नहीं गया है या यह कि वहां आर्थिक तरक्की की जो स्थिति है उसमें लंबे समय तक महिलाओं को रोक पाना संभव नहीं है। यह सही है कि कृष्णा पूनिया, हरवंत कौर, सीमा अंटिल, साइना नेहवाल, मंदीप कौर, मंजीत कौर एक खास इलाके और बिरादरी से संबंधित हैं। उनके आदर्शों को प्रस्तुत कर उस समाज में स्त्रियों के लिए पूर्वाग्रहों को मिटाया जा सकता है, लेकिन उससे भी बड़ी बात आस्ट्रेलिया जैसे देशों और हरियाणा जैसे राज्यों की खेल नीति को समझने की और उन्हें देश में बाकी जगहों पर लागू करने की है।

 

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