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रंगारंग कार्यक्रमों के बीच राष्ट्रमंडल खेलों को विदाई

रंगारंग कार्यक्रमों के बीच राष्ट्रमंडल खेलों को विदाई

भारतीय संस्कृति की झलक के साथ शुरू हुए 2010 राष्ट्रमंडल खेलों का गुरुवार को भव्य जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में सार्वभौमिक प्रेम और एकता के संदेश के साथ समापन हो गया।

जगमगाती रौशनी से दुल्हन की तरह सजे स्टेडियम में सूफी गानों से लेकर बैगपाइपर की धुन से सारी फिजा गूंज गई। तीन अक्टूबर को हुए उद्घाटन समारोह की तरह ही समापन समारोह ने भी दर्शकों को मोहित कर लिया। समारोह में 2014 राष्ट्रमंडल खेलों के लिए स्काटलैंड के ग्लासगो में फिर मिलने का संदेश दिया गया।

ढाई घंटे तक चले समापन समारोह की शुरुआत राष्ट्रगान से हुई जिसके बाद देवनागरी में 10 से शून्य अंक तक की उलटी गिनती शुरू हुई। सबसे पहले भारतीय खेलों की भावना को दर्शाते आठ मिनट के अग्नि द ग्लोरी आफ स्पोटर्स कार्यक्रम में पंजाब, मणिपुर, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात के कलाकारों ने देश की विभिन्न मार्शल आर्ट का प्रदर्शन कर दर्शकों का मंत्रमुग्ध कर लिया।

मार्शल आर्ट के इस बेहतरीन प्रदर्शन में अखाड़ों से लेकर तलवारबाजी तक के हुनर शामिल थे। 3000 वर्ष पुरानी इस कला के प्रदर्शन की शुरुआत अग्नि श्लोक से हुई और नृर्तकों ने अपनी प्रस्तुति दी। सैन्य बलों की बटालियनों ने 14 मिनट तक चले बैगपाइपर संगीत पर अपनी प्रस्तुति दी जिसमें उनके 14 सैन्य बैंड, 17 पाइप और ड्रम शामिल थे। देश की तीनों सैन्य बलों के 650 कलाकारों ने समापन समारोह में चार चांद लगा दिए।

ट्रिब्यूट टू आर मदरलैंड वंदे मातरम में 2010 स्कूली बच्चों ने सफेद रंग के कपड़ों में वंदे मातरम की धुन पर जननी जन्मभूमि को नमन किया। बच्चों ने एकजुट होकर राष्ट्रमंडल के प्रतीक का रूप दिया और इसके बाद रंगों को बिखरा कर तिरंगे का रूप उकेरा जिसके बीचों बीच अशोक चक्र नजर आ रहा था। बच्चों ने स्प्रे कर भारत के झंडे के रंग बिखेरे जो देश के रंग बिरंगे त्योहार होली को दर्शाता नजर आया। बच्चों ने रंगोली का खूबसूरत नमूना पेश किया जो दर्शकों के दिलों दिमाग में अपनी मिट्टी का अहसास घोल गया। बच्चों ने रंगोली के विभिन्न तरह के पैटर्न बनाए जिसने सबसे ज्यादा तालियां बटोरीं।

उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, संप्रग प्रमुख सोनिया गांधी, राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के अध्यक्ष माइक फेनेल, भूटान के राजकुमार जिगमे केसर नामग्याल वांगचुक, अर्ल आफ वेसेल्स के प्रिंस एडवर्ड, श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे और आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी इस अवसर पर उपस्थित थे।

इस रंगारंग कार्यक्रम के बाद रेलगाड़ी रेलगाड़ी छुकछुक छुकछुक गाने के साथ वालंटियरों और मार्शलों ने स्टेडियम में प्रवेश किया जिन्हें 11 दिन तक चले राष्ट्रमंडल खेलों में उनके योगदान और प्रयासों के लिए धन्यवाद दिया गया। इन वालंटियरों और मार्शलों ने स्टेडियम में प्रवेश कर घुमावदार नदी का रूप दिया जो राष्ट्रमंडल खेलों के प्रतीक चिन्ह की तरह प्रतीत हो रहा था। उन्होंने रंग बिरंगे स्कार्फ लहराए जिससे मार्शल और एथलीटों का जीवन चक्र (प्रतीक चिन्ह) बन गया जो दिल्ली 2010 राष्ट्रमंडल खेलों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आधे घंटे तक एथलीटों की परेड हुई जिसमें सभी देशों के खिलाड़ियों ने मिलकर एक बड़े दल के रूप में स्टेडियम में प्रवेश किया जो मित्रता और एकता का संदेश दिया। भारतीय ध्वज स्टार निशानेबाज गगन नारंग के हाथ में था।

भारत और स्काटलैंड की अगुवाई में राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले सभी देशों के खिलाडियों ने अपने अपने झंडों के साथ अंग्रेजी वर्णमाला के शब्दों के हिसाब से स्टेडियम में प्रवेश किया और वालंटियरों द्वारा बनाई गई पंक्ति से गुजरे।

दो मिनट के लिए दिल्ली खेलों के स्वर्णिम क्षणों को दिखाया गया और इसके साथ ही खेलों के शुभंकर शेरा को गुडबाय कहा गया। भारतीय गायक शान शेरा को लेकर सजे धजे आटो रिक्शा में स्टेडियम पहुंचे जिन्होंने भारत के नागरिकों और एथलीटों की तरफ से शेरा को गुडबाय शेरा बड़ा याद आएगा तू शेरा गाना गाकर उसे विदा किया। शान और शेरा ने वीवीआईपी बाक्स के सामने प्रस्तुति दी और इसी आटो रिक्शा में बैठकर हाथ हिलाकर बाय करते हुए स्टेडियम से बाहर निकल गए।

समारोह को आयोजन समिति के अध्यक्ष कलमाड़ी ने संबोधित किया और उन्होंने इन खेलों को सफल बनाने के लिए वालंटियरों और दर्शकों समेत सभी का धन्यवाद किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का उन्होंने विशेष शुक्रिया अदा किया जिस पर दर्शकों ने काफी उत्साह से तालियां बजायीं।

राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के झंडे को उतारा गया और 2014 राष्ट्रमंडल खेलों के मेजबान शहर ग्लासगो के प्रतिनिधियों को सौंप दिया गया। शीला दीक्षित और ग्लासगो के लार्ड प्रोवोस्ट रोबर्ट विंटर ने झंडे का आदान प्रदान किया। ग्लासगो ने मंच पर 10 मिनट के लिए अपने देश की सांस्कृतिक प्रस्तुति का वीडियो दिखाया और स्टेडियम की स्क्रीन पर स्काटलैंड के लोगों और उनकी संस्कृति की झलकियां दिखायी दीं।

स्काटलैंड के एक बैगपाइपर ने अपना पाइप बजाना शुरू किया और वह वीवीआईपी बाक्स के करीब पहुंच गया। फिर 352 कलाकारों ने बैगपाइपर की ओर बढ़ना शुरू किया जो पूरे स्काटलैंड की संस्कृति को दर्शाता है। ग्लासगो के इस हिस्से में विभिन्न तरह की रंगारंग आकतियां भी बनाई गई।

इसके बाद सीजीएफ अध्यक्ष फेनेल ने दर्शकों को संबोधित कर सीजीएफ के उप संरक्षक प्रिंस एडवर्ड को आमंत्रित किया और 2010 राष्ट्रमंडल खेलों का अधिकारिक तौर पर समापन किया। उन्होंने कहा कि मैं 2010 दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों को अधिकारिक रूप से समाप्त करने की घोषणा करता हूं।
 
फेनेल ने डेविड डिक्सन पुरस्कार के लिए जमैका की महिला एथलीट ट्रेसिया स्मिथ के नाम की घोषणा की और उन्हें पुरस्कार प्रदान किया। सात मिनट तक चले लेजर शो ने दर्शकों को उत्साहित कर समां बांध दिया। भारत के मशहूर संगीतकारों और गायकों ने आधे घंटे तक एथलीटों और दर्शकों को अपने गानों से मंत्रमुग्ध कर दिया जिसमें डीजे नशा, सन्नी सरीद, डीजे सुकेतु और मिडवियल पुंडिज, तौफिक कुरैशी, कमल साबरी, निलाद्री कुमार, बिक्रम घोष, शिवमणि, रघु सच्चर, कैलाश खेर, जिला खान, सुखविंदर, इला अरुण, ऊषा उथुप, शान, श्यामक डावर, शंकर महादेवन, शुभा मुदगल, सुनिधि चौहान और श्रीराम शामिल थे।

रंग बिरंगी आतिशबाजियों से स्टेडियम गूंज उठा और सुखविंदर ने चक दे इंडिया गाकर सभी को रोमांचित कर दिया तो कैलाश खेर ने अल्लाह के बंदे तथा शुभा मुदगल ने अब के सावन, ऐसे बरसे से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर दिया।

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