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अधर में लटका है येदियुरप्पा सरकार का भविष्य

अधर में लटका है येदियुरप्पा सरकार का भविष्य

राज्यपाल द्वारा कर्नाटक सरकार को दोबारा विश्वास मत हासिल करने के लिए कहे जाने और मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा द्वारा इसके लिए तैयार हो जाने के बाद अब इस संकट में नया पेंच आ घुसा है। येदियुरप्पा सरकार यदि बहुमत साबित भी कर देती है तो उसका भविष्य उच्च न्यायालय के फैसले पर निर्भर करेगा।

एक तरफ कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने विश्वास मत के बहिष्कार की धमकी दी है, वहीं उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि सरकार के विश्वास मत का असली फैसला अयोग्य ठहराए गए पांच निर्दलीय विधायकों की याचिका पर उसके फैसले पर निर्भर करेगा।

यानी यदि अदालत ने पांचों निर्दलीय विधायकों की अयोग्यता के खिलाफ फैसला दे दिया तो गुरुवार को विश्वास मत जीतने के बाद भी सरकार का भविष्य अधर मे होगा। निर्दलीय विधायकों की याचिका पर 18 अक्टूबर को सुनवाई होनी है।

भारद्वाज ने बुधवार को मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को दूसरा मौका देते हुए 14 अक्टूबर तक विधानसभा में फिर से बहुमत साबित करने के लिए कहा था। राज्यपाल की इस सलाह को भाजपा ने स्वीकार कर लिया। भाजपा का कहना है कि एक जिम्मेदार राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी होने के नाते संवैधानिक टकराव से बचने के लिए उसने इस चुनौती को स्वीकार किया।

लेकिन इस बीच कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि राज्य विधानसभा में गुरुवार के विश्वास मत का परिणाम विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य ठहराए गए पांच निर्दलीय विधायकों की याचिका पर अदालती फैसले पर निर्भर करेगा।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के.एस. खेहर और न्यायमूर्ति एन.कुमार की खण्डपीठ ने कहा, ''गुरुवार को आयोजित होने वाला शक्ति परीक्षण विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य ठहराए गए पांच निर्दलीय विधायकों की संशोधित रिट याचिका पर इस पीठ के फैसले के अधीन होगा।''

उधर, कांग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धारमैया ने बेंगलुरू में संवाददाताओं को बताया, ''हम विश्वास मत के लिए आयोजित होने वाले सत्र का बहिष्कार करने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि यह न केवल अभूतपूर्व है, बल्कि राज्यपाल द्वारा दोबारा विश्वास मत के लिए कहना असंवैधानिक भी है। अयोग्य ठहराए गए 16 विधायकों का मामला अभी उच्च न्यायालय में लम्बित है।''

कांग्रेस के पास 225 सदस्यीय विधानसभा में 73 विधायक हैं। कांग्रेस ने गुरुवार के लिए रणनीति तय करने हेतु बुधवार को अपने विधायक दल की बैठक बुलाई है।

सिद्धारमैया ने कहा, ''पार्टी में यह राय है कि राज्यपाल को तब तक के लिए विश्वास मत सत्र स्थगित कर देना चाहिए, जब तक कि अयोग्य ठहराए गए विधायकों की संयुक्त रिट याचिका पर फैसला नहीं आ जाता।''

उन्होंने कहा, ''यदि राज्यपाल सत्र स्थगित नहीं करते हैं तो हमारे पास इस तरह की असंवैधानिक कार्यवाही से दूर रहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं होगा।''

इस मामले में कांग्रेस की नाराजगी में खुद को शामिल करते हुए जेडी (एस) की राज्य इकाई के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी.कुमारस्वामी ने कहा कि उनकी पार्टी के विधायक भी विश्वास मत में हिस्सा नहीं लेंगे।

कुमारस्वामी ने संवाददाताओं को बताया, ''राज्यपाल पहले ही सोमवार को ध्वनि मत से हासिल किए गए विश्वास मत को मजाक बता चुके हैं और राज्य में संवैधानिक संकट का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर चुके हैं, क्योंकि विश्वास मत की कार्यवाही भारी हंगामे और भ्रम के बीच नियमों के खिलाफ आयोजित की गई।''

नाराज कुमारस्वामी ने सवाल किया, ''राज्यपाल भला मुख्यमंत्री से दोबारा शक्ति परीक्षण के लिए कैसे कह सकते हैं?''

इस बीच सत्ताधारी भाजपा ने विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने के लिए अपने 105 विधायकों को तीन पंक्तियों का व्हिप जारी किया है। यही नहीं भाजपा ने खरीद-फरोख्त से बचने के लिए अपने सभी विधायकों को शहर के बाहरी हिस्से में स्थित गोल्डन पाम रेसोर्ट में बंद कर रखा है।

16 विद्रोही विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के बाद 225 सदस्यीय विधानसभा में सदस्यों की संख्या घट कर 208 हो गई है। ऐसे में बहुमत के लिए जरूरी विधायकों की संख्या 105 पर आ गई है।

चूंकि उच्च न्यायालय ने विद्रोही विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने पर स्थगन आदेश देने से इंकार कर दिया है, लिहाजा विपक्ष की कुल ताकत 102 सदस्यों की है। इसमें 73 कांग्रेस के, 28 जेडी (एस) के और एक निर्दलीय विधायक शामिल हैं।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति के.एस.खेहर और न्यायमूर्ति एन.कुमार की एक पीठ ने मंगलवार को 11 भाजपा विधायकों के मामले में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था और निर्दलीय विधायकों के मामले की सुनवाई के लिए 18 अक्टूबर की तारीख तय कर दी थी।

इधर, नई दिल्ली में भाजपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की और कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को वापस बुलाने की मांग की। पार्टी ने भारद्वाज पर राजनीतिक षडयंत्र करने का आरोप लगाया।

मनमोहन सिंह से मुलाकात के बाद राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने संवाददाताओं को बताया कि भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया गया है कि भारद्वाज को जल्द से जल्द वापस बुला लिया जाए, क्योंकि वह अपने पद पर बने रहने का अधिकार खो चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भारद्वाज ने राजभवन को राजनीतिक षड़यंत्र का केंद्र बना दिया है। पार्टी बीते कुछ दिनों से भारद्वाज पर लगातार हमले बोल रही है।

इस प्रतिनिधिमंडल में जेटली के अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और वेंकैया नायडू शामिल थे। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी प्रधानमंत्री से मिलने वाले इस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा नहीं बन सके क्योंकि वह बिहार में विधानसभा चुनाव के प्रचार में व्यस्त हैं।

जेटली ने कहा, ''फिर से बहुमत साबित करने की बात हमने स्वीकार की है, क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि संवैधानिक संस्थाओं के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो।'' 

गौरतलब है कि सोमवार को विधानसभा अध्यक्ष के. जी. बोपैया ने विश्वास प्रस्ताव पर मतदान से पहले 16 बागी विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य करार दिया था और इसके बाद येदियुरप्पा सरकार ने ध्वनिमत से विश्वासमत हासिल कर लिया था।

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