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आंगन से निकलीं, मार लिया मैदान

लड़कियों ने मेडल जीते तो कहीं न कहीं घर की महिलाओं ने ही उनका साथ दिया। किसी की राह में समाज आया तो किसी को गरीबी ने रोकने की कोशिश की। लेकिन कुछ कर दिखाने का जज्बा इन्हें रोक नहीं पाया। 


दिल्ली में कॉमनवेल्थ खेलों का प्रतीक शेरा था, लेकिन ये खेल भारत की उन शेरनियों के लिए याद किए जाएंगे जिन्होंने मेडल पर मेडल जीते। नासिक के एक छोटे से आदिवासी गांव की कविता हो या हैदराबाद के बेरोजगार कुक की बेटी पुशूषा मलाईकल, रांची के ऑटो चालक की लाडली दीपिका हो या आठ साल के बेटे से दूर रहकर अभ्यास करने वाली कृष्णा पूनिया, सभी ने दिखा दिया कि वे किसी से कम नहीं। छोटे से राज्य हरियाणा की महिलाओं ने ही अकेले आठ पदक जीते। पंजाब की लड़कियों के हाथ भी चार मेडल लगे। ये दोनों राज्य कन्या भ्रूण हत्या और ऑनर किलिंग के लिए बदनाम है, पर मैदान के अंदर और बाहर दोनों ही जगह इनकी कहानियां हैरान कर देती हैं।
कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान महिलाओं की दस हजार मीटर रेस शुरू होने वाली थी। सबकी नजरें केन्या की एथलीटों पर थीं। सब मान रहे थे कि सोना, चांदी और कांस्य सभी वही जीतने वाली हैं। इसी रेस में भारतीय जर्सी पहने एक बेहद दुबली-पतली लड़की पर पूरे स्टेडियम का कोई ध्यान नहीं था। रेस शुरू हुई तो 5000 मीटर के बाद केन्या की दो दौड़ाक बेहद आराम से दौड़ती दिखीं। उनके ठीक पीछे एक भारतीय जर्सी भी दिखी। 7000 मीटर बाद भी वही नजारा था। कविता.., कविता.., कविता.. पूरे स्टेडियम से एक ही आवाज आने लगी। केन्या की एक धाविका ने तो बाकायदा पीछे मुड़कर भी देखा कि आखिर यह हो क्या रहा है। कविता ने तीसरा स्थान पा लिया था। कविता के कंधों पर तिरंगा था। यह भारत के नजरिए से कॉमनवेल्थ खेलों का सबसे महान क्षण था। रेस के बाद कविता ने बताया कि 1200 मीटर में उसका दम फूलने लगा था, लेकिन उसे लगा कि अपने ही लोगों के बीच दौड़ते हुए हर हाल में जीतना ही था और मैंने पूरा दम लगा दिया। नासिक के पास एक गांव की आदिवासी लड़की कविता के पास जूते नहीं थे और वह दौड़ना चाहती थी, लिहाजा उसने दस हजार मीटर की दौड़ चुनी क्योंकि उसमें बिना जूतों के भी दौड़ा जा सकता था।
ऐसी ही 16 साल की दीपिका की कहानी भी है। तीरंदाजी का रिकर्व टीम इवेंट चल रहा था। आखिरी तीर चलना था। भारत दो अंकों से पिछड़ रहा था। डोला बनर्जी जैसी अनुभवी तीरंदाज सिर्फ आठ अंक ही बटोर सकी थी। तय था कि भारत को पूरे दस अंक दीपिका के तीर पर नहीं मिले तो सोना हाथ से गया। दीपिका ने प्रत्यंचा खींची। तीर ठीक निशाने पर लगा और सोना हमारा था। सिंगल इवेंट में भी दीपिका ने अपने से कहीं अनुभवी इंग्लैंड की तीरंदाज को अपने तीरों से परास्त कर दिया। तीन तीर चलाए, तीनों निशाने पर लगे। एक और सोना दीपिका के गले की शोभा बढ़ा रहा था। दीपिका भी आदिवासी है, पिता ऑटो चलाते हैं, पैसे नहीं थे तो बांस के तीर-कमान से अभ्यास करती थी। पिता को यह पसंद नहीं था, उसे घर में बंद कर दिया करते थे, लेकिन प्राइमरी हेल्थ सेंटर में नर्स मां गीता ने दीपिका का साथ दिया। दीपिका अब मिलने वाले पैसों से अपने खपरैल के घर को पक्का करना चाहती है। वह चाहती है कि पिता आटो चलाना छोड़ दें।
एक और कमाल हुआ महिलाओं की चार गुना चार सौ मीटर रिले में। रिले की सचिन तेंदुलकर कही जाने वाली मंजीत पहला लैप दौड़ी। लगा ही नहीं कि मंजीत दो साल से पीठ दर्द से जूझ रही है। एक जिद थी, 2006 में मेलबर्न खेलों में जीते रजत को सोने में बदलने की। बैटन सिनी जोस को थमाया। भारत सोने की होड़ से निकल रहा था। सिनी का लैप खत्म हुआ और तीसरा लैप दौड़ रही थी रिले टीम की सबसे छोटी सदस्या अश्विनी। उसे न केवल कवर करना था, बल्कि लीड भी लेनी थी। गजब का फर्राटा भरा और नाइजीरिया की खिलाड़ी को पीछे छोड़ते हुए चौथे और अंतिम लैप के लिए मंदीप को बैटन थमाया तो भारत सोने की होड़ में वापस आ चुका था। छह महीनों से नस खिंचने से परेशान मंदीप ने आखिरकार सोना जीत ही लिया। मंदीप और मंजीत का कहना था कि वे दो साल से घर नहीं गए, कोई छुट्टी नहीं ली। मन में यही था कि जीतना है। मेडल लेना है, 52 सालों का सूखा (1958 में मिल्खा सिंह का स्वर्ण पदक) दूर करना है।
ऐसा ही सूखा दूर किया डिस्कस थ्रो में कृष्णा पूनिया, हरवंत कौर और सीमा अंतिल ने। कृष्णा ने पिछले कई साल से बेटे को देखा नहीं था। राजस्थान के पिछड़े हुए चूरू जिले के गागड़वास गांव में ब्याही हिसार की कृष्णा अपने ससुराल में नेकर पहन कर अभ्यास तक नहीं कर पाती थी। बच्चा होने के बाद तो खेल छोड़ ही दिया था, लेकिन कोच और पति वीरेन्द्र ने हौंसला बढ़ाया। वहीं सास ने कहा कि बच्चा मैं संभाल लूंगी, तू जा देश का नाम रोशन कर। डिस्कस में रजत जीतने वाली पंजाब की हरवंत कौर को पंजाब पुलिस ने एएसआई से हैड कांस्टेबल बना दिया था, वह बहुत रोई, लेकिन मैदान नहीं छोड़ा।
एक कहानी है भिवानी की तीन पहलवान बहनों की। गीता, बबीता और अनिता। दो सोना, एक रजत। पिता महाबीर ने घर में ही अखाड़ा बना दिया। मौसी की दो बेटियों को भी ले आए। रात-दिन पहलवानी करना। बगड़ी, पट्टा लगाना, धड़, ढाक, घिस्सा, मैटवैट जैसे देसी दांव लगाने में माहिर अनिता का कहना था कि पिताजी ने मुझसे कहा कि बेटा तुझे देश का सबसे बड़ा पहलवान बनना है। अनिता ने हारते-हारते बाजी जीती थी। ऐसा बगड़ी दांव लगाया था कि विरोधी पहलवान चित्त हो गई थी। महाबीर ही जानते हैं कि वह कैसे पांच-पांच पहलवानों की खुराक का इंतजाम करते हैं।
लड़कियों ने मेडल जीते तो कहीं न कहीं घर की महिलाओं ने ही उनका साथ दिया। किसी की राह में समाज आया तो किसी को गरीबी ने रोकने की कोशिश की, लेकिन कुछ कर दिखाने का जज्बा इन्हें रोक नहीं पाया और कर दिखाया। यही दिल्ली के कॉमनवेल्थ खेलों की देन भी है और सबक भी। भारत के नौजवान खिलाड़ियों ने दिखा दिया कि वह नाजुक मौके पर चूकते नहीं हैं, बल्कि अपना सर्वश्रेष्ठ सामने लाते हैं। वह ज्यादा आक्रामक हैं, विरोधियों को बख्शते नहीं हैं और हर कीमत पर जीतने का माद्दा रखते हैं।
लेखक टीवी पत्रकार हैं

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