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एक सार्थक फिल्म के ऑस्कर में जाने का अर्थ

आमिर खान की बहुचर्चित फिल्म पीपली लाइव आगामी ऑस्कर अवार्ड की सर्वश्रेष्ठ पांच विदेशी फिल्मों की कतार में खड़ी हो पाएगी या नहीं, अभी कहना मुश्किल होगा, किन्तु यह तय है कि वर्ष 2011 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीपली लाइव भारत के मौजूदा हालात पर एक कड़वी सच्चाई के रूप में जरूर उभरकर आएगी। इस फिल्म को देखकर कोई भी संवेदनशील दर्शक यह अंदाज लगा सकता है कि 21वीं सदी के इस दौर में भारत की तस्वीर में सब कुछ रंगीन न होकर सफेद और सियाह भी है।
पीपली लाइव का हिन्दुस्तान सिर्फ शाइनिंग इंडिया, इनक्रेडेबिल इंडिया और मेरा भारत महान के लुभावने लफ्जों में बयान नहीं किया जा सकता। वर्ष 1998 और 2008 के दौरान जिन दो लाख किसानों को मुफलिसी और शर्मिदगी के कारण आत्महत्या करनी पड़ी, उनका दर्द, कराह और वेदना इस फिल्म में मुखरित होती है। भारत की भ्रष्ट राजनीति, संवेदनहीन नौकरशाही और मीडिया की मौकापरस्ती के बुने हुए जाल में फंसे नाथा और बुधिया प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कहानी कफन के माधव और घीसू तथा गोदान के होरी जैसे पात्रों की त्रसदी का वह रूप है, जो 21वीं सदी के भारत का कटु यथार्थ है। पिछली सदी में हमारे राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक संदर्भ भले ही बदल गए हों, किन्तु लगता है कि माधव, घीसू, होरी, नाथा, बुधिया जैसे आम हिन्दुस्तानियों की जिंदगी में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया है। 21वीं सदी के ग्रामीण भारत में शोषकों के चेहरे जरूर बदल गए हैं। क्रूर जमींदार, सूदखोर बनिए और लालची पंडितों की जगह भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों, बैंक अधिकारियों और अवसरवादी मीडिया कर्मियों ने ले ली है। लगता है कि जल्दी दौलतमंद बनने की अंधी दौड़ में समाज के ये ठेकेदार भारतीय संविधान की मूल भावना और मर्यादाओं को भूल गए हैं, जिसमें हर तरह के शोषण को खत्म करने की कल्पना की गई थी।
फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के महासचिव सुपर्ण सेन के अनुसार, ऑस्कर में भारत की अधिकारिक प्रविष्टि के रूप में नामित होने के लिए पीपली लाइव का चयन 27 भारतीय फिल्मों में से किया गया। इससे पहले भी आमिर खान की दो फिल्में लगान और तारे जमीन पर भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में ऑस्कर पहुंची थीं। ब्रिटिश राज के खिलाफ खेल के माध्यम से हिन्दुस्तानी ग्रामीण युवाओं की साहसिक मुहिम पर आधारित लगान तो ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ पांच विदेशी फिल्मों की श्रेणी में पहुंच गई थी, किन्तु पहले स्थान के लिए बोस्निया की नो मैन्स लैंड से मात खा गई। पिछले दो दशकों में भारत उदारीकरण और वैश्वीकरण के रास्ते पर चलकर विश्व के तेजी से विकसित हो रहे और उभरते हुए शक्तिशाली राष्ट्रों के बीच अपनी जगह भले ही बना चुका हो, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण और भ्रष्टाचार के मामलों में हमारे हालात कुछ अविकसित अफ्रीकी देशों से ज्यादा बेहतर नही हैं। यूएनडीपी द्वारा हाल ही में जारी आंकड़े चौकाने वाले हैं, जिनमें भारत के कथित बीमारू राज्यों, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की गरीबी की तुलना सब सहारा अफ्रीकी देशों से की गई है।
अगले वर्ष 2011 में ऑस्कर अवार्डो के घोषित होने तक पीपली लाइव उसी तरह सुर्खियों में रहेगी, जैसे पिछले वर्षो में स्लमडॉग मिलियनेयर और लगान तथा साठ-सत्तर के दशक में सत्यजीत राय और मृणाल सेन की फिल्में रही हैं। बिमल राय की दो बीघा जमीन भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुचर्चित रही थी, जिसमें बलराज साहनी ने कर्ज में डूबे भारतीय किसान की मार्मिक भूमिका को निभाया था, जो कि भुखमरी के कारण कलकत्ता में हाथ रिक्शा चलाने के लिए मजबूर होता है। सत्यजित राय की पाथेर पांचाली आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक क्लासिक फिल्म मानी जाती है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीपली लाइव की ख्याति जैसे-जैसे बढ़ेगी, देश के अंदर यह सवाल उठेगा कि यह भारतीय किसानों की गरीबी और बदहाली को महिमामंडित करते हुए देश की छवि को खराब कर रही है। भूतकाल में यह आरोप पाथेर पांचाली, दो बीघा जमीन, सलाम बॉम्बे और स्लमडॉग मिलियनेयर पर भी लगाए जाते रहे हैं। गरीबी का ग्लोरीफिकेशन करना गलत है, किंतु उस पर परदा डालना उससे बड़ा पाप है। इंडिया शाइनिंग या इनक्रेडेबिल इंडिया सच्चाई का एक छोटा पहलू है, क्योंकि देश के पांच प्रतिशत धनाढ्य वर्ग की समृद्धि ही समूचे देश की सच्चाई नहीं है। शेयर मार्केट, रियल एस्टेट, वित्तीय क्षेत्र, फैशन उद्योग, मनोरंजन उद्योग में जो उभार दिखाई देता है, वह कृषि में गायब है। भारतीय कृषि अमूमन एक घाटे का सौदा है। ऐसे में पीपली लाइव का ऑस्कर में पहुंचना विश्व सिनेमा में भारतीय फिल्मों की ताकत को दिखाता है। 

लेखक बिड़ला इन्स्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेन्ट टेक्नोलॉजी (बिमटेक) के निदेशक हैं

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