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बिहार में स्वर्ग

मैं बिहार में वोटर नहीं हूं, लेकिन वहां के वोटरों के भाग्य से ईर्ष्या करता हूं। अगर होता तो लालू प्रसाद यादव को वोट देता। वे मुख्यमंत्री बनते और मुझे मोटर साइकिल देते। सुना है कि नीतीश कुमार के राज में बिहार में सड़कें ठीक हो गई हैं, तो मोटर साइकिल चलाने का मजा लिया जा सकता है। लालू जी के राज में सड़कें खराब हुईं भी तो उसमें थोड़ा वक्त लगेगा, तब तक तो मोटर साइकिल चलाई ही जा सकती है। मोटर साइकिल देने के अलावा दूसरा वादा वे कर रहे हैं कि पुरानी गलतियां नहीं दोहराएंगे, अच्छा प्रशासन देंगे। तो हो सकता है कि उनके राज में सड़कें भी अच्छी बनी रहें। यह भी हो सकता है कि कानून और व्यवस्था की स्थिति भी ठीक रहे यानी यह खतरा न रहे कि मोटर साइकिल कोई दबंग लालू समर्थक छीन ले। तब मोटर साइकिलें शोरूम से जबर्दस्ती उठवाई नहीं जाएंगी, बाकायदा खरीदी जाएंगी और उनकी कीमत भी चुकाई जाएगी।

ऐसा हुआ तो नीतीश कुमार की इस दलील का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा कि मोटर साइकिल के लिए पेट्रोल कहां से आएगा। क्योंकि तब मोटर साइकिल पेट्रोल से नहीं चलेगी, वह खुशी से चलेगी। मनुष्य ही नहीं, जड़ वस्तुएं भी इतनी खुश हो जाएंगी कि खुशी की ऊर्जा से चलेंगी। कल्पना कीजिए शानदार सड़कों पर मोटर साइकिल दौड़ाते हुए नौजवान। मोटर साइकिलें ऐसी जिनसे जरा भी धुआं न निकले और नौजवान ऐसे कि जिन्हें देखते ही हर्षोल्लास का समा बंध जाए। ऐसा हुआ तो बिहार से पलायन एक दम रुक जाएगा। ये मोटर साइकिलें बिहार की सीमा में ही दौड़ेंगी और बिहार से जाने वाली ट्रेनें खाली होंगी। ऐसे आदर्श और स्वर्ग से सुंदर बिहार के लिए एक बार रिस्क लेने में क्या हर्ज है?

 

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