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सुरक्षा परिषद में भारत

संयुक्त राष्ट्र के इस मंच पर भारत को मिला विराट समर्थन बदलती हुई दुनिया में भारत के महत्व को दिखाता है। अब जरूरत अगली मंजिल की ओर बढ़ने की है।

भारत का सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना जाना तो महत्वपूर्ण है ही, उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि 190 वैध वोटों में से भारत को 187 वोट मिले। भारत सरकार इस बात से वाकिफ थी कि वोटों की संख्या बड़ी होना महत्वपूर्ण है, इसलिए विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा, विदेश सचिव निरुपमा राव और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरदीप सिंह पुरी सभी सदस्य देशों से मिलने-जुलने और उनके वोट पक्के करने में लगे रहे थे। लेकिन इतने जबर्दस्त समर्थन की उम्मीद तो उन्हें भी नहीं थी। यह समर्थन नए अंतरराष्ट्रीय समीकरणों में भारत के बढ़ते महत्व को दिखाता है। महत्वपूर्ण यह भी है कि अब चारों ‘ब्रिक’ देश सुरक्षा परिषद में होंगे यानी अगले दो वर्षो तक सुरक्षा परिषद में दुनिया में तेजी से उभरती हुई शक्तियों का प्रतिनिधित्व होगा। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को भी अच्छे वोट मिले हैं जो यह बताता है कि दुनिया के तमाम देश अब तक नए यथार्थ को समझते हैं कि आने वाले वक्त में दुनिया का आर्थिक और रणनैतिक नेतृत्व किसके पास होगा। यह भी ध्यान देने की बात है कि चीन ने भारत की विजय का स्वागत किया है, जाहिर है चीन अपने पड़ोसी, प्रतिद्वंद्वी और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोगी देश से इस मुद्दे पर टकराव नहीं चाहता। यह भी महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान ने भी भारत को वोट दिया और इस बात को जाहिर भी किया, हालांकि इस प्रक्रिया में गुप्त मतदान होता है। पाकिस्तान का यह कदम दोतरफा रिश्तों को बेहतर बनाने की दिशा में कितना कारगर होगा, यह बताना मुश्किल है, लेकिन जाहिर है कि एशिया को एकमात्र उम्मीदवार देश के खिलाफ जाकर पाकिस्तान अनावश्यक कड़ुवाहट और असुविधा से बचना चाहता था।

भारत की सदस्यता जब अगले वर्ष जनवरी में शुरू होती तो उसके सामने कई चुनौतियां होंगी। अपने पड़ोस और एशिया की समस्याओं से तो उसे जूझना ही होगा। संयोगवश हम दुनिया के ऐसे हिस्से में रह रहे हैं, जो फिलहाल सबसे ज्यादा उथल-पुथल का केंद्र है, इसलिए यहां स्थिरता के साथ-साथ राष्ट्रीय हित का समन्वय साधने की हमें कोशिश करनी होगी। लेकिन जिन देशों ने भारत और उसके सहयोगी देशों को वोट दिए हैं, उनकी उम्मीदें इससे काफी ज्यादा होंगी। वे चाहेंगे कि सुरक्षा परिषद में ‘ब्रिक’ या ‘इब्सा’ जैसे समूहों के सदस्य देशों के आने से सुरक्षा परिषद में कुछ बुनियादी परिवर्तन हो और वह छोटे देशों के प्रति ज्यादा प्रभावशाली सिद्ध हो। भारत की सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने की कोशिश के पीछे भी यही तर्क है कि बदली हुई परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद का ढांचा भी बदलना चाहिए और उसमें बदले हुए यथार्थ का सही प्रतिनिधित्व होना चाहिए। भारत की भूमिका इस तर्क को ज्यादा मजबूती दे सकती है और स्थायी सदस्यता के लिए हमारी दावेदारी को और पुख्ता कर सकती है। सुरक्षा परिषद को ज्यादा प्रासंगिक बनाने की सख्त जरूरत है और इस कोशिश में भारत की बड़ी भूमिका हो सकती है। लंबे अर्से से हम खुद महाशक्तियों की ताकत से पैदा हुई समस्याएं भुगत रहे हैं, इसलिए इन समस्याओं को हमसे बेहतर कौन जानता होगा। भारी समर्थन के साथ बड़ी उम्मीदें भी जुड़ी होती हैं, लेकिन हमारे लिए तो यह शुरुआत है, ज्यादा बड़ी भूमिका हमारा इंतजार कर रही है।

 

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