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ब्लॉग वार्ता : पंचायत चुनावों का परिवार तंत्र

उत्तर प्रदेश में पंचायती चुनाव हो रहे हैं। उम्मीदवारों की प्रचार शैली बिल्कुल विधायकी वाली हो गई है। बैनर, माइक और केबल टीवी पर भी प्रचार हो रहे हैं। गांवों में हिन्दी अखबारों की पहुंच के कारण अखबारों में भी उम्मीदवारों के विज्ञापन खूब छप रहे हैं। इन विज्ञापनों से पता चल रहा है कि पंचायतों के चुनाव के तेवर बदल गए हैं। दिल्ली के मीडिया को देश के सबसे बड़े राज्य में हो रहे पंचायती चुनावों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन दलों की भी नहीं है, जो ग्रामीण स्तर पर राजनीति को बदलने की बात कर रहे हैं।

पंचायती चुनावों के पोस्टरों में महिला उम्मीदवारों की तस्वीरें बहुत कुछ कह जाती हैं। आधे सिर पर आंचल है। मुश्किल से जोड़े गए हाथ हैं। नीचे किनारे पर पति महोदय की तस्वीर है। पत्नी की तस्वीर झिझक भरी लगती है तो समर्थक पति का आत्मविश्वास झलकता है। कई विज्ञापनों में तो स्वर्गीय हो चुके ससुर जी का भी नाम हैं। इसी बहाने बहुओं की तस्वीरें तो सार्वजनिक हो रही हैं। कम से कम मर्द अपनी पत्नी के नाम पर
मुखिया कहलाने में शर्म तो नहीं महसूस कर रहे हैं।

एक तरह से ग्रामीण स्तर पर मर्दवाद का ढकोसलापन खोखला होने लगा है। अभी तक पत्नी अपने थानेदार पति पर रौब करती थी, अब तो पतियों की बारी है। गांव के लोग तो जानते ही हैं कि मुखिया जी ये नहीं वो हैं। वो मतलब उनकी पत्नी।

इतनी बात इसलिए की क्योंकि एक ब्लॉग ऐसा है, जो ग्राम स्वराज की बात करता है। क्लिक कीजिए http://gram-swaraj.blogspot.com  एक गांव की कहानी है, जहां इस बार पंचायत चुनाव में मुफ्त शराब नहीं बंट रही है। गाजियाबाद के शैलाना गांव की कहानी है।

इस गांव के 800 परिवारों में से 50 परिवार ऐसे हैं, जो मानते हैं कि मुफ्त में शराबखोरी गांव का माहौल बिगाड़ देगी। इसलिए उन्होंने तय किया कि जो भी उम्मीदवार शराब पिलाएगा, उसे वोट नहीं देंगे। यह सन्देश चुनाव लड़ रहे सभी नौ प्रत्याशियों को दे दिया गया है। इन 50 परिवारों के पास 300 वोट हैं, जो इस बात पर एकमत हैं कि किसे वोट नहीं देना है। बस इसी ताकत ने उम्मीदवारों पर दबाव बना दिया है।

इस अभियान का संचालन कर रहे डॉक्टर मुकेश के अनुसार, पिछले चुनाव में हरेक प्रत्याशी ने करीब 3 लाख रुपये की शराब बांटी थी, लेकिन इस बार 9 में से 2 उम्मीदवार ही चुपके से शराब पिला रहे हैं। अब लोग हिसाब लगा कर देख लें कि सरकारी योजनाओं में से पंचायत सदस्य कितना लूट रहे हैं। आखिर उनके पास इतना पैसा कहां से आया कि वे सिर्फ एक गांव में शराब बांटने पर 20-25 लाख रुपये खर्च कर रहे हैं? इस लूट का नतीजा आम ग्रामवासी भुगत रहा है। उसके गांव में जरूरी सुविधाओं के नाम पर भेजे गए पैसे एक रात में लुटाए जा रहे हैं।

ग्राम स्वराज ब्लॉग पर ऐसे कई किस्से हैं, जहां लोगों ने पहल की है और अपने गांव में जवाबदेही का संस्कार पैदा किया है। हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले में एक गांव है बेवल। यहां जब पंचायती चुनाव हुए तो दो बार के विजेता सरपंच के खिलाफ नए उम्मीदवार ने ऐलान कर दिया कि वह अपने सभी फैसले ग्राम सभा में लेगा। 

बेवल में ग्राम सभा की खुली बैठक कभी नहीं हुई थी। बिना प्रचार के ग्रामसभा का वादा करने वाला उम्मीदवार जीत गया। जीतने के बाद विजेता ने ऐलान कर दिया कि हारे हुए सरपंच से चार्ज ग्राम सभा में ही लेगा। 

आमतौर पर हारने पर सरपंच अधिकारी को चुपचाप चार्ज दे देता है, जबकि ग्राम सभा में उसे सबके सामने अपने फैसले का बहीखाता भी सौंपना होता है। मजबूर जब पराजित सरपंच ने ग्राम सभा में अपना हिसाब रखा तो कई घोटाले सामने आ गए।

हिन्दुस्तान अखबार कई राज्यों के गांव-गांव में जाता है। लाखों की संख्या में इसके सजग ग्रामीण पाठक हैं। उम्मीद है इस कहानी को पढ़कर अपने सरपंच से एक बार तो पूछेंगे ही कि भाई साहब या भौजाई जी ग्राम सभा की बैठक कब होगी।

यकीन मानिए इस ब्लॉग पर ऐसे कई किस्से विराजमान हैं जो पाठकों में यकीन पैदा करने की ताकत रखते हैं कि ग्राम सभा चाह ले तो उनके गांव की हालत अप्रत्याशित रूप से बदल जाएगी। फिर मुखिया जी को पंचायत के पैसे से खरीदे गए बोलेरो और कमांडर जीप पर चलने में पसीने आने लगेंगे। ग्राम स्वराज यही कर रहा है। देश भर से ऐसे किस्से जुटा कर आपका आत्मविश्वास बढ़ा रहा है।

ravish@ndtv.com
 
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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