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कर्नाटक में प्रहसन

विधानसभा अध्यक्ष के.जी. बोपैया ने अपने ‘पक्षपातपूर्ण निर्णय’ से राज्यपाल हंसराज भारद्वाज पर लगे राजनीतिक सक्रियता और हस्तक्षेप के आरोपों को फीका कर दिया है। आमतौर पर स्पीकर सत्तारूढ़ दल का ही होता है और यह माना जाता है कि संकट में वह सरकार को बचाएगा ही, लेकिन उससे यह काम संविधान के दायरे में रह कर करने की अपेक्षा की जाती है।

लगता है, बोपैया ने यहां महज मुख्यमंत्री बीएस येदीयुरप्पा की सरकार बचाने का ध्यान रखा और संविधान को ताक पर रख दिया। स्पीकर ने मतदान से पहले ही भारतीय जनता पार्टी के ग्यारह विधायकों के साथ पांच निर्दलीय विधायकों को विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर जो अग्रिम कार्रवाई की है, वह राजनीतिक तौर पर चाहे जितनी सही ठहराई जाए, लेकिन कानून की कसौटी पर खरी उतरती नहीं दिखती।

कई राज्यों में स्पीकर के ऐसे निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी गई है। वही कर्नाटक के स्पीकर के फैसले के साथ भी हुआ है। यही वह वजह है, जिसके कारण स्पीकर के न्यायिक विवेक पर और भी ज्यादा जिम्मेदारी आ जाती है। उसे चाहिए कि वह जो भी निर्णय दे, वह कहीं से जल्दबाजी और दुर्भावना में उठाया गया कदम न लगे, पर इस मामले में होता उल्टा ही रहा है।

अगर उत्तर प्रदेश के स्पीकर केशरी नाथ त्रिपाठी ने पार्टी विभाजन को महीनों तक चलने वाली एक लंबी प्रक्रिया मानते हुए दलबदल कानून की बेहद लचीली व्याख्या कर डाली थी, तो कर्नाटक के राज्यपाल ने अति कठोर होते हुए विधायकों के पार्टी को औपचारिक तौर पर छोड़ने,  व्हिप का उल्लंघन करने और नोटिस का जवाब देने तक का भी इंतजार नहीं किया। इस तरह के फैसले स्पीकर को दी गई न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग हैं।
  
स्पीकर ने मत-विभाजन का अवसर न देकर विश्वास मत को ध्वनिमत से पास कराकर जल्दबाजी और पक्षपात के संदेह को जन्म दिया है। बोपैया के फैसले में सबसे विवादास्पद मामला पांच निर्दलीय विधायकों को अयोग्य करार देने का है। हालांकि वे और उनके पक्ष के कानूनी विशेषज्ञ इसे संविधान की दसवीं अनुसूची के मुताबिक उचित ठहरा रहे हैं, लेकिन यह व्याख्या किसी के गले नहीं उतर रही है।

जिस तरह मार्शलों और पुलिस बल का उपयोग किया गया, उससे भी लगता है कि विधानसभा की कार्यवाही निष्पक्ष तौर पर संचालित नहीं की जा सकी है। यही वजह है कि पहले राज्य में राष्ट्रपति शासन का सुझाव देने वाले राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने येदीयुरप्पा सरकार को एक और मौका देकर 14 अक्टूबर तक बहुमत साबित करने को कहा है।

जाहिर-सी बात है कि अब किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना उतना आसान नहीं है, जितना कर्नाटक के ही मुख्यमंत्री रहे एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार के फैसले के पहले हुआ करता था। इन्हीं कारणों से केंद्र सरकार ने राज्यपाल भारद्वाज के सुझाव पर कोई फैसला लेने के पहले फिर विश्वास मत लिए जाने की सिफारिश करवाई है।

राज्य की स्वायत्तता और केंद्र-राज्य संबंधों की गरिमा के लिहाज से यह उचित ही है। राज्य की राजनीतिक स्थितियां जितनी तेजी से अस्थिर हो रही हैं, उसमें संविधानसम्मत विश्वास मत की गारंटी लेना मुश्किल है। इसलिए कर्नाटक विधानसभा के इस प्रहसन का अंत किसी नए चुनाव में ही दिखाई देता है।

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  • Web Title:कर्नाटक में प्रहसन