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करियर के गोल में खेल का रोल

करियर के गोल में खेल का रोल

कॉमनवेल्थ गेम्स हों या इंडियन प्रीमियर लीग, खेल अब सिर्फ खेल नहीं रह गए हैं, कमाई का एक बड़ा जरिया बन गए हैं। एक बहुत बड़ा बाजार इससे जुड़ गया है, जिसमें जॉब भी हैं, रोब भी और शोहरत भी। अब मैनेजमेंट, विज्ञापन, ब्रान्ड, डिजाइन, सुरक्षा, खानपान, डॉक्टर, यहां तक कि वकील का पेशा भी इससे सीधे-सीधे जुड़ गया है। उत्पादन यानी खेल का सामान बनाना और खेलना तो इसके परंपरागत रोजगार हैं ही। जब इसमें इतनी संभावनाएं हैं तो क्यों न आप भी खेल के इस बाजार में करियर का खेल खेल कर देखें।

खेलकूद में दिनभर व्यस्त रहने वाले युवा की जिन्दगी को बर्बाद कह कर खिल्ली उड़ाना अब बीते दिनों की बात हो गई है। खेल अब करियर के कई नए रंग दे रहा है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आए दिन होने वाले तरह-तरह के मैच और प्रतियोगिताओं के कारण खेल, खिलाड़ी और उससे जुड़े लोगों के सामने पैसा, ग्लैमर और पद सब कुछ हाजिर है। क्रिकेट से जुड़ी इंडियन प्रीमियर लीग हो या कॉमनवेल्थ गेम्स, पूरा माहौल खेलमय हो गया है। इन खेलों के कारण आज तरह-तरह के करियर और काम निकल कर सामने आ रहे हैं। कोई इसे मैदान में उतर कर हासिल कर रहा है तो कोई मैदान के बाहर रह कर आयोजन आदि से जुड़ कर अपने करियर को नए आयाम दे रहा है। खेल प्रबंधन, खेलों का सामान तैयार करना, खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करना, उनके खानपान और स्वास्थ्य की देखभाल का जिम्मा उठाना, खेलों के लिए बाजार से पैसा और विज्ञापन जुटाना आदि भी खेल करियर के खास हिस्से हैं और कमाई के नए रास्ते दिखा रहे हैं।

विशेषज्ञों की मानें तो एक जमाने में विभिन्न खेलों में बेहतर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी के पास अवसर के नाम पर किसी सरकारी दफ्तर में क्लर्की या सिपाही का काम आता था। अगर वह कुछ ज्यादा तेज-तर्रार है तो कोच की भूमिका में सामने आता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। खिलाड़ियों के पास भी सरकारी दफ्तर में कर्मचारी या कोच बनने के अलावा बाजार में तरह-तरह के करियर सामने आ रहे हैं। इस तरह के अवसर देखते हुए ही कॉमनवेल्थ में तीरंदाजी में गोल्ड जीतने वाली गगनदीप कौर कहती हैं, मैं खेल पत्रकार बनना चाहती हूं। कौर के अलावा देश में और भी खिलाड़ी हैं, जो खेलों के बहाने तरह-तरह के अवसर तलाश रहे हैं। इन अवसरों के अनुकूल प्रशिक्षण के लिए संस्थानों में विविध कोर्स भी चलाए जा रहे हैं। चाहे वह स्पोर्ट्स मैनेजमेंट का हो या फिर स्पोर्ट्स से जुड़े फिजियोथैरेपिस्ट का। ऐसे में खेल में काम और करियर के अवसर को जानना और उसे चुनना जिन्दगी को एक नई राह दिखाना है।

स्पोर्ट्स मैनेजमेंट

खेलों के आयोजन ने स्पोर्ट्स मैनेजमेंट के क्षेत्र में काम करने का बड़ा अवसर मुहैया कराया है। इसके लिए यह जरूरी है कि आप खेलों की जरूरत को समझों। उसे सफल बनाने के लिए विशेष तरह की दक्षता हासिल करें। खेल में विज्ञापन, बाजार, दर्शक, सुरक्षा और खान-पान आदि कई चीजें शामिल होती हैं। इन सबका प्रबंधन किस तरह किया जाए, इसे देखना प्रबंधकों के लिए जरूरी है। खेल प्रबंधन में करियर संवारने के लिए आज युवा प्रबंधकों की एक अलग पौध तैयार हो गई है।

स्पोर्ट्स मार्केटिंग

खेल की सफलता का राज बाजार में छिपा है। बाजार के साथ खेल के गठबंधन ने मार्केटिंग का काम भी दिया है। खेलों की मार्केटिंग कैसे करनी है, यह कला जानना भी जरूरी है। इसे जानने वाले आज अपने करियर को नए आयाम दे रहे हैं। वे खेलों की मार्केटिंग करके पैसा और कंपनियों में पद, दोनों हासिल कर रहे हैं।

साइकोलॉजिस्ट

खेलों में हार-जीत के लिए खिलाड़ियों को स्वस्थ रखना एक बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य का एक पहलू मनोविज्ञान से भी जुड़ा है। किसी खिलाड़ी को मैदान में जाने से पहले कैसे प्रेरित और प्रोत्साहित करना है, उसे मानसिक तौर पर मजबूत करके आत्मविश्वास से लैस करने के लिए मनोवैज्ञानिकों की भी जरूरत पड़ती है। 

खेल साइंटिस्ट

खेलों के दौरान खिलाड़ियों को चोट लगती ही रहती है। चोटों से निजात पाने और उनके लिए दवाएं ईजाद करने के काम में वैज्ञानिकों की जरूरत पड़ती है। ऐसे वैज्ञानिक, जिन्हें इस क्षेत्र का ज्ञान हो और विशेषज्ञता भी, वे यहां करियर खोज सकते हैं।

स्पोर्ट्स गुड्स इंडस्ट्री

क्रिकेट हो या कोई अन्य खेल, इनमें आज तरह-तरह के सामान की जरूरत पड़ती है। बैट-बॉल जैसे खेल के लिए प्रयुक्त होने वाले सामान से लेकर खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए भी कई तरह के उपकरणों की जरूरत होती है। उनकी पोशाक और उसके डिजाइन तैयार करने में भी एक्सपर्ट लोगों की जरूरत होती है। ये सामान गुणवत्तापूर्ण हों और आधुनिक भी, इसका ख्याल भी रखना जरूरी है। इस क्षेत्र में खेल से जुड़ा सामान तैयार करने ने एक उद्योग की शक्ल ले ली है। इस कारोबार ने नए अवसर मुहैया कराए हैं।

स्पोर्ट्स एजेंट

किसी खिलाड़ी को आइकन कैसे बनाना है, उसकी ब्रांडिंग कैसे करनी है, यह काम भी करियर के तौर पर उभर रहा है। बेहतर ब्रांडिंग विज्ञापन जुटाने का काम करती है, जैसे क्रिकेटर वीरेन्द्रर सहवाग की एजेंट बन कर लतिका खनेजा ने इस क्षेत्र में अलग पहचान बनाई है।

डायटीशियन

खिलाड़ियों के लिए किस वक्त और कौन सा खाना उपयुक्त है, यह तय करने का काम खेल की समझ रखने वाला डायटीशियन ही कर सकता है। आज देश-विदेश में होने वाले तरह-तरह के मुकाबलों को ध्यान में रखते हुए डायटीशियन का रोल अहम हो गया है। नामचीन खेलों और खिलाड़ियों के साथ डायटीशियन की नियुक्ति या कंसलटेंट के रूप में काम करना भी अब आम बात है।

स्पोर्ट्स लॉ

खेलों के आयोजन में इजाफों ने विवादों को भी खूब जन्म दिया है। चाहे वह ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच होने वाले मुकाबले में उठे विवाद हों या फिर खिलाड़ी और उनके विज्ञापन एजेंटों के बीच। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन विवादों का निपटारा कैसे हो, इसके लिए स्पोर्ट्स लॉ के विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती है।

मीडिया के क्षेत्र में

खेल ने मीडिया के क्षेत्र में भी कई नए अवसर प्रदान किए हैं। कमेंटेटर, खेल लेखन और रिपोर्टिग के लिए विशेष प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत पड़ती है। ऐसा युवाओं की, जिनमें खेल विशेष की समझ हो और लेखन और कम्युनिकेशन स्किल भी। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों ऐसे लोगों के लिए अवसर मुहैया करा रहे हैं। खिलाड़ी कमेंटेटर बन कर लाखों कमा रहे हैं। खेलों के आंकड़ों को जानने-समझने के लिए सांख्यिकीविद् की भी जरूरत पड़ रही है। हर दिन बनने वाले नए रिकार्डस की व्यवस्था रखने का काम भी सांख्यिकीविदों को अवसर मुहैया करा रहा है।

स्पोर्ट्स कोर्स से जुड़े संस्थान

स्पोर्ट्स अथोरिटी ऑफ इंडिया
लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन, ग्वालियर
अमरावती शिक्षण प्रसारक मंडल कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन
इंदिरागांधी इंस्टीटय़ूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन, विकासपुरी, दिल्ली

कोर्स

स्पोर्ट्स में करियर के हिसाब से कई संस्थानों में कोर्स चलाए जा रहे हैं। इनमें बीपीएड, एमपीएड और स्पोर्ट्स इकोनॉमिक्स एंड मार्केटिंग शामिल हैं। दिल्ली का इंदिरा गांधी इंस्टीटय़ूट बीपीएड, एमपीएड के अलावा बीएससी इन फिजिकल एजुकेशन, हेल्थ एजुकेशन एंड स्पोर्ट्स का विशेष कोर्स चला रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एसजीटीबी खालसा कॉलेज स्पोर्ट्स मार्केटिंग पर विशेष कोर्स चला रहा है। कई निजी संस्थानों ने भी स्पोर्ट्स पर सर्टिफिकेट और डिप्लोमा के रूप में नए-नए कोर्स शुरू किए हैं।

खेल से पा सकते हैं करियर की नई ऊंचाई

प्रो. स्मिता मिश्र (खेल कमंटेटर और एसजीपीटी खासला कॉलेज, डीयू, दिल्ली में एसोसिएट प्रोफेसर)

पिछले एक दशक में खेलों का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। खेलों ने नई उपलब्धियां तो हासिल की ही हैं, इसके जरिए करियर के नए आयाम भी खुले हैं। खेलों की दुनिया में बाजार के प्रवेश से यह सब कुछ संभव हुआ है। खेल विशेष से जुड़ने और उसमें बेहतर परफॉर्मेस देने पर किसी युवा के पास सबसे पहले पैसा आता है। उसके साथ-साथ बाजार भी आता है। जैसे मुक्केबाजी में बीजिंग में विजेन्दर की सफलता ने पदक के साथ बाजार को भी उसकी ओर खींचा। उसमें एक नए तरह का आत्मविश्वास आया। उसकी सफलता की देखादेखी उसके गृहनगर भिवाणी में मुक्केबाजी के बाजार ने खूब जोर पकड़ा। युवाओं में इस तरह के सपने को साकार करने के लिए नए-नए निजी संस्थान खुले। प्रशिक्षण के बहाने पैसा कमाने का नया रास्ता आया। आज पारंपरिक तौर के बजाय नए ढंग से देखें तो खेल के जरिए हम नई ऊंचाई छू सकते हैं। खेल टाइम पास के लिए नहीं, पढ़ाई की तरह करियर को नई उंचाई देने के लिए भी है। इसलिए इस सोच से बाहर निकलें कि पढ़ाई ही पद और प्रतिष्ठा देती है। पढ़ाई के अलावा समाज में खेल भी पद, पैसा और प्रतिष्ठा दिलाने का अवसर लेकर सामने आया है।

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