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कॉमनवेल्थ ने बढ़ाईं उम्मीदें

देश में 19वें कॉमनवेल्थ के आयोजन ने एक बात तो अच्छी की है कि इसने खेलों के प्रति लोगों का नजरिया बदल दिया है। केंद्र व राज्य सरकारों ने पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के लिए बतौर पुरस्कार बड़ी धनराशि की घोषणा कर इसका आकर्षण बढ़ा दिया है। निश्चित रूप से अब अभिभावक अपने बच्चों की खेल प्रतिभा को सिर्फ क्रिकेट की ओर मोड़ने की कोशिश नहीं करेंगे। कॉमनवेल्थ ने माहौल ही ऐसा बना दिया है। अब खिलाड़ियों और खेल प्रशासन के ऊपर है कि वे इसका कितना लाभ उठा पाते हैं।
विवेक तनेजा, डी-79, मंगल बाजार, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-92

एक भद्दा मजाक
संयुक्त राष्ट्र की संस्था फूड ऐंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कश्मीर तथा अरुणाचल प्रदेश को अलग देश माना है। इस तरह की हरकतों के खिलाफ हमें तत्काल कूटनीतिक स्तर पर उचित कार्रवाई करनी चाहिए। जब हम सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए जी-जान से जुटे हैं, तब इस तरह की कार्रवाइयों के प्रति हमें अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। हमें यह सब पता होना चाहिए कि इन हरकतों के पीछे किन देशों का हाथ है। हमें अपने मित्र और भीतरघात करने वाले देशों के बारे में विस्तार से पता होना चाहिए। इतना ही नहीं, हमें अपने विकास की रफ्तार तेज करने के साथ-साथ इस तरह के भद्दे मजाकों का भी प्रतिवाद करना चाहिए।
सुभाष लखेड़ा, न्यूजर्सी
 
बात हजम नहीं हुई
अभी हाल ही में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सिमी और आरएसएस को एक समान संगठन बताया है। यह उचित नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि राहुलजी दोनों को जानते नहीं हैं या फिर वह राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास कर रहे हैं। आरएसएस राष्ट्रवादी संगठन है और सिमी घोषित रूप से राष्ट्र-विरोधी संगठन। उसकी पाकिस्तानपरस्ती जग-जाहिर है। इन दोनों को एक ही तराजू पर कैसे तौला जा सकता है? पहली बार राहुलजी ने कुछ विवादास्पद बात कह डाली है। आरएसएस की विचारधारा को लेकर प्रश्न किए जा सकते हैं, लेकिन उसे सिमी जैसा करार देना जमता नहीं। यह तुलना आश्चर्यजनक है, क्योंकि 1962 में जब चीनी हमला हुआ था, तो नेहरूजी की अनुमति से गणतंत्र दिवस परेड में आरएसएस का जत्था भी सम्मिलित हुआ था और नेहरूजी ने बहुत तारीफ की थी। आशा है राहुल जी बुरा नहीं मानेंगे और इस पर ठंडे दिमाग से विचार करेंगे।
मनोज शर्मा, भोपाल 

उपाय भी बताएं
पिछले दिनों एक गैर सरकारी संगठन ‘प्लान इंडिया’ की रिपोर्ट पर आधारित खबर आपके अखबार में पढ़ी- मर्दो से खौफजदा हैं शहरी लड़कियां। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। ये हमारे शहरों-महानगरों की कानून-व्यवस्था की कलई भी खोलते हैं। लेकिन सिर्फ समस्या बताने से कुछ नहीं होगा। अच्छा होता कि संस्था पीड़ितों से इस समस्या का हल भी पूछती। शायद उनकी राय से कानून बनाने वाले या उन्हें लागू करने वाली एजेंसियों को कोई रास्ता दिख जाता।
आसिफ खान, ए-55, गली नंबर-दो, बाबरपुर, दिल्ली-32

मीडिया से सवाल
आदमी अपने काम से नामी होता है। अच्छे काम करने वाले को विख्यात और बुरे कृत्य को अंजाम देने वालों को कुख्यात कहा जाता है। मीडिया का काम यदि समाज का प्रशिक्षण करना भी है, तो मैं उससे पूछना चाहता हूं कि वह कुख्यात लोगों को ही क्यों सबसे अधिक हमारे सामने परोसता है? कसाब, बबलू श्रीवास्तव, राज ठाकरे, राखी सावंत और मल्लिका सेहरावत ही उसे क्यों बार-बार दिखते हैं? यदि ये लोग उसके आदर्श नहीं हैं, तो वह इन कुख्यात लोगों की बेसिर-पैर की बातों, हरकतों को सुर्खियां क्यों बनाता है? क्या देश का मीडिया इन प्रश्नों का जवाब देगा?
दिलीप गुप्ता, बरेली

रिक्तियां बढ़ाए सरकार
केंद्र सरकार अक्सर यह रोना रोती है कि देश में पुलिसकर्मियों, शिक्षकों, डॉक्टरों, प्रोफेसरों की कमी है। बात सही है। प्राय: ऐसी खबरें पढ़ने-सुनने को मिलती हैं कि फलां स्कूल में दो वर्ष से एक भी शिक्षक नहीं है, तो अमुक राज्य के दर्जनों स्वास्थ्य उप-केंद्रों पर कोई डॉक्टर ही नहीं है। बिहार और उत्तर प्रदेश के कॉलेजों की हालत भी कमोबेश एक-सी है। उत्तर भारत के ज्यादातर कॉलेजों में अब भी नए रोजगारपरक पाठ्यक्रमों की पढ़ाई प्राध्यापकों के अभाव के कारण शुरू नहीं हो पाई है। कहा तो यह भी जाता है कि कुछ राज्यों में कॉलेजों में ठेके पर रिटायर्ड प्रोफेसरों को रख लिया गया है। ऐसी स्थिति है, तो सरकार रिक्तियों की संख्या बढ़ाती क्यों नहीं है? उसे अपने कुछ कर्मचारियों पर ही खजाना लुटाने और उनकी अनाप-शनाप तनख्वाह बढ़ाने के बजाय विभिन्न विभागों में रिक्तियों की संख्या बढ़ानी चाहिए, ताकि देश की तरक्की भी हो और लोगों को काम भी मिले।
रवि कुमार, वेस्ट पटेल नगर

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