DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

खेल, संघ और खिलाड़ी

मेडल अर्जित करना हंसी-ठट्ठा नहीं हैं। खिलाड़ी अपने चारों ओर लगन, परिश्रम और दृढ़ निश्चय से सन्नाटे का छंद बुनते हैं, तब कहीं जाकर उनसे पदक की आशा जागती है। उनकी दत्तचित्त, एकाग्रता वैसी ही है, जैसे किसी लेखक की अपने रचना कर्म में। जब कोई सफल होता है, तो स्टेडियम तालियों से गूंजता है, वर्ना खिलाड़ी को कोई घास तक नहीं डालता है। बड़े वीआईपी उसे बधाई देते हैं, उन पदाधिकारियों को भी, जिन्होने उसकी कामयाबी में योगदान दिया है।

वीआईपी भी जानते हैं कि यह महज एक रस्म-अदायगी है। ज्यादातर पदाधिकारी खेल के वह घुघ्घू हैं, जो उससे तब जुड़े, जब वह एसोसिएशन के अधिकारी बने। यों अति महत्वपूर्ण व्यक्ति भी विवश हैं। उन्हें पता है। वे रस्में निभाकर ही बड़े बने हैं, उन्हें तोड़कर नहीं। ऐसा न होता, तो हिंदी में सर्वप्रथम फैसला सुनाने वाले जज, प्रमुख न्यायाधीश क्यों न बनते? परिपाटी तोड़ने की सजा तो मिलनी ही मिलनी।

ऐसे धुरंधर पदाधिकारियों का खेल के संदर्भ में नाम सुनकर हमें हंसी आती है। हमें यकीन है कि कलमाडी साहब ने कभी कबड्डी भी न खेली होगी। आज वह खेलों की शान हैं। इसी प्रकार, कंचों पर निशाना साधने वाला कभी शूटिंग के सर्वेसर्वा का अवतार भी ले सकता है। यह भी मुमकिन है कि कभी गलती से अखाड़े के सामने से गुजरे सज्जन कुश्ती संघ के सचिव या अध्यक्ष बन बैठें। न जाने कब ऐसी संस्थाओं पर कौन हावी हो जाए।
खिलाड़ियों की क्षमता, प्रतिभा और कुशलता के विकास में इनका अवदान क्या होगा? शूटिंग के सरताजों ने कितनी रेंज बनवाई हैं? कितने बॉक्सर पनपे हैं, इन आकाओं के प्रसासों से। क्या ऐसे बधाई-योग्य हैं? हमें तो लगता है कि ये सब के सब दुत्कार के सुपात्र हैं, जयकार के हकदार नहीं!

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:खेल, संघ और खिलाड़ी