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नैतिक साहस को नोबेल

नोबेल शांति पुरस्कार के व्यापक राजनैतिक निहितार्थ हमेशा ही रहे हैं और इस वर्ष का पुरस्कार भी इसका अपवाद नहीं है। चीन की सरकार को चीन के मानवाधिकार कार्यकर्ता लियू जियाबो को यह पुरस्कार मिलने से असुविधा होगी और पुरस्कार देने वाली समिति ने यह जानकर ही पुरस्कार भी दिया होगा।

चीन की सरकार की समस्या यह है कि वह इक्कीसवीं शताब्दी में एक ऐसी शासन प्रणाली पर अड़े रहने की जिद ठाने हुए है, जिसकी प्रासंगिकता अगर कुछ थी भी तो वह काफी पहले खत्म हो गई है और इस वक्त में उसे कोई सही नहीं ठहरा सकता।

उसकी समस्या यह भी है कि देश के बाहर आर्थिक ताकत और देश के अंदर पुलिस और फौज की ताकत के सहारे वह विरोध को कुचलना चाहती है, लेकिन उसके विरोधी चाहे वे दलाई लामा हों, लियू जियाबो हों, अहिंसक और सभ्य-सुसंस्कृत तरीके से उसका विरोध करते हैं। इन लोगों के विरोध से भौतिक रूप से चीन सरकार को   चाहे ज्यादा नुकसान न होता हो, उसका नैतिक आवरण उधड़ जाता है।

दलाई लामा या लियू को नोबेल पुरस्कार मिलना इसलिए भी चीन की एकाधिकारवादी सत्ता को नागवार गुजरता है, क्योंकि उससे यह भी पता चलता है कि चीन की आर्थिक ताकत के बावजूद दुनिया में उसके तौर-तरीकों का विरोध मौजूद है।

लियू जियाबो चीन में लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष के प्रतीक बन गए हैं। वे जेल में हैं और उन्हें पता भी नहीं रहा होगा कि उनको नोबेल शांति पुरस्कार देने के लिए लेक वालेसा और डेसमंड टूटू जैसे सम्मानित लोग मुहिम चलाए हुए थे, क्योंकि बाहर से उनका संपर्क इतना ही है कि उनकी पत्नी महीने में एक बार उनसे मिल सकती हैं।

चीन सरकार ने इस घोषणा की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित तरीके से ही की। उसने नॉर्वे को उससे संबंध बिगड़ने की धमकी दी और इंटरनेट और टीवी पर इस पुरस्कार से संबंधित सूचनाओं को रोक दिया। गूगल पर लियू के नाम की सर्च को बंद कर दिया गया।

क्या चीन पर इस नोबेल पुरस्कार का कोई अच्छा असर पड़ेगा? अगर चीन से आने वाले संकेतों को पढ़ा जाए, तो इसकी उम्मीद कम ही लगती है। चीन की एकाधिकारवादी नीतियों की वजह से समाज के कई समूहों में असंतोष पनप रहा है और उस समाज में दरारें आ रही हैं, लेकिन इन दरारों को सहानुभूति से पाटने के बजाय  सरकार ज्यादा सख्त होकर इस स्थिति से निपटना चाहती है।

चीनी सत्ता प्रतिष्ठान में ज्यादा उदारता के पक्ष-विपक्ष में बहस चलती रही है, लेकिन पिछले दिनों तिब्बत और जिनजियांग इलाकों में विद्रोह के बाद कट्टरवादी और फौजी ताकतों का ही पलड़ा भारी हुआ है। लोग यह मानते हैं कि उदार अर्थव्यवस्था और अनुदार राजनीति का तालमेल ज्यादा दिनों तक नहीं बैठता और ऐसी अर्थव्यवस्था लोकतंत्र को जरूरी बनाती है।

चीन इस विचार का एक बहुत बड़ा अपवाद है। यह देखना होगा कि क्या उदार अर्थव्यवस्था और तानाशाही का यह अब तक सफल प्रयोग भविष्य में भी सफल होगा? यह साफ है कि चीन की खुली ताकत का विरोध करने के लिए, खासतौर पर पश्चिम के पास लियू जैसे लोगों की नैतिक ताकत है, यह भी देखना काफी दिलचस्प होगा कि यह नैतिक और अहिंसक ताकत कितनी कारगर हो सकती है।

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  • Web Title:नैतिक साहस को नोबेल