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चाँद तक जाने को तैयारी में चंद्रयान-2

चंद्रयान-1 की कामयाबी के बाद अब चांद पर चंद्रयान भेजने की तैयारी में जुट गया है। चंद्रयान-1 ने पिछले वर्ष चांद पर पानी की मौजूदगी की पुष्टि की थी। वैज्ञानिक उपकरणों से लैस चंद्रयान-2 चंद्रमा को ज्यादा नजदीक से से देखेगा और उसकी सतह पर पानी सहित कई चीजों का गहराई से अध्ययन करेगा।

चंद्रयान-2 मिशन में एक ऑर्बिटर होगा, जो चंद्रमा का चक्कर लगाएगा। इसमें एक लैंडर को भी शामिल किया जा रहा है, जो चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। 425 करोड़ रुपये की इस परियोजना को अंतिम रूप देने के लिए पिछले दिनों भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की कई बैठकें हुई थीं। इन बैठकों में ऑर्बिटर के साथ पांच पेलोड अथवा वैज्ञानिक उपकरण और लैंडर के साथ दो पेलोड भेजने का निर्णय लिया गया।

चंद्रयान-2 को एक भूसमकालिक उपग्रह प्रक्षेपण वाहन (जीएसएलवी) के जरिए 2013 में श्रीहरिकोटा से रवाना किया जाएगा। लैंडर अपने साथ एक रोबो भी ले जाएगा, जो चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करेगा। ऑर्बिटर और रोवर का निर्माण इसरो द्वारा किया जाएगा, जबकि रूस लैंडर की व्यवस्था करेगा। चंद्रयान पर रखे जाने वाले तीन पेलोड नए होंगे, जबकि दो अन्य पेलोड चंद्रयान-1 ऑर्बिटर पर भेजे गए पेलोड के सुधरे हुए रूप होंगे। चंद्रयान-2 का कुल वजन करीब 2650 किलोग्राम होगा, जिसमें ऑर्बिटर का वजन 1400 किलोग्राम और लैंडर का वजन 1250 किलोग्राम होगा।

भारत के पहले चंद्र अभियान, चंद्रयान-1 ने अपने करीब 95 लक्ष्य पूरे कर लिए थे, लेकिन अंतरिक्ष विज्ञान की सलाहकार समिति के अध्यक्ष यू. आर. राव के मुताबिक अभी चंद्रमा के कई मामले ऐसे हैं, जिनका और गहराई से अध्ययन जरूरी है। उनका कहना है कि इस मिशन के कुछ प्रयोग 50 से 70 प्रतिशत तक ही अपना लक्ष्य पूरा कर सके थे। चंद्रयान-1 का टेरेन मैपिंग कैमरा चंद्रमा का सिर्फ 45 प्रतिशत ही नक्शा तैयार कर पाया था।

चंद्रयान-2 इसलिए छोड़ा जा रहा है क्योंकि हम चंद्रमा का संपूर्ण कवरेज चाहते हैं, नई और बेहतर टेक्नोलॉजी को आजमाना चाहते हैं तथा बेहतर क्वॉलिटी के फोटो प्राप्त करना चाहते हैं। चंद्रयान-2 की एक खास बात यह है कि इस पर चंद्रयान-1 की तरह कोई विदेशी उपकरण नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि चंद्रयान-1 मिशन के दौरान चाँद पर पानी की खोज का श्रेय नासा द्वारा लूटने की कोशिश पर अनेक भारतीय वैज्ञानिकों ने गहरे आक्रोश का इजहार किया था।

इस बीच भारतीय वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के वायुमंडल की कुछ ऐसी विशेषताओं का पता लगाया है, जो चंद्र विज्ञान की मौजूदा मान्यताओं को बदल सकती है। इससे हमारी दशकों पुरानी यह चिंता और भी तीव्र हो सकती है कि मनुष्य की खोजी गतिविधियों से चंद्रमा में परिवर्तन आ रहे हैं। तिरुअनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) के रिसर्चरों ने चंद्रयान-1 पर लगे एक उपकरण से मिले डाटा का विश्लेषण करने के बाद पता लगाया है कि दिन में चंद्रमा का वायुमंडल 70 के दशक में भेजे गए अपोलो मिशनों के अनुमान से 100 गुना ज्यादा घना है।

चंद्र एल्टिटय़ूडनल कंपोजिशन एक्सप्लोरर (चेस) ने चंद्रमा के वायुमंडल का अध्ययन किया था और उसने वहां पानी, कार्बन डायआक्साइड और दूसरे मालिक्यूल के चिह्न् पकड़े थे। चंद्रमा पर कार्बन डाइआक्साइड का एक प्रमुख मालिक्यूल के रूप में उभरना आश्चर्यजनक है, लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि चंद्रमा के वायुमंडल में कुल दबाव अब तक के ज्ञान आंकड़े से करीब 100 गुना अधिक है।

‘प्लेनेटरी एंड स्पेस साइंस’ पत्रिका द्वारा मंजूर किए गए एक पेपर में वीएसएससी के रिसर्चरों का कहना है कि उच्च दबाव का मतलब यह है कि चंद्रमा की सतह के बर्ताव को बेहतर ढंग से समझने की जरूरत है। या फिर अपोलो मिशनों के अध्ययनों के बाद पिछले चार दशकों में वहां दबाव में वृद्धि हुई है।

चेस प्रयोग से जुड़े प्रमुख भारतीय वैज्ञानिक राजगोपाल श्रीधरन का कहना है कि चंद्रमा पर दर्ज किए गए उच्च दबाव से एक सवाल यह खड़ा होता है कि क्या हम चंद्रमा को बदल रहे हैं। मनुष्य की उपस्थिति से चंद्रमा पर पड़ने वाले प्रभावों पर वैज्ञानिकों ने पहले भी चिंता व्यक्त की थी। 1991 में प्रकाशित ल्यूनर सोर्सबुक के अनुसार मनुष्य की उपस्थिति से चांद की सतह पर परिवर्तन होते हुए देखे गए हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रत्येक अपोलो ने चांद पर जो गैस छोड़ी, वह उसके मौजूदा वायुमंडल के बराबर थी।

अपोलो अभियान के दौरान नासा के साथ काम करने वाले एक भूगर्भशास्त्री, ग्रांट हीकेन का कहना है कि अपोलो के लैंडिंग मॉडय़ूल और अंतरिक्ष यात्रियों के स्पेस सूट्स से निकली गैस ने चंद्रमा के वायुमंडल को लगभग दोगुना कर दिया था। अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री के वैज्ञानिक नाथ गोस्वामी के मुताबिक चंद्रमा पर कार्बन डाइआक्साइड का स्नेत नहीं है। चंद्रमा पर उच्च दबाव और कार्बन डाइआक्साइड की मौजूदगी के कारणों की अभी और विस्तृत छानबीन जरूरी है। उम्मीद है कि भारत के चंद्रयान-2 पर लगे उपकरणों से चंद्रमा के वायुमंडल की बेहतर तस्वीर मिल सकेगी।

नए तथ्य होंगे उजागर
चंद्रयान-2 पिछले चंद्र मिशन से कैसे अलग होगा? इसरो के वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रयान-1 ने काफी दूरी से चंद्रमा का अध्ययन किया था, जबकि चंद्रयान-2 वास्तव में उसकी सतह पर जाकर गहराई से पड़ताल करेगा और उसके बारे में कुछ नए तथ्यों को उजागर करेगा।

पिछले मिशन ने चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र में पानी का पता लगाया था। इसरो के वैज्ञानिकों ने अभी यह तय नहीं किया है कि रोवर युक्त लैंडर को चंद्रमा के किस हिस्से पर उतारा जाए, लेकिन रोवर चंद्रमा की सतह पर भ्रमण करते हुए अन्य चीजों के अलावा पानी की भी खोज करेगा। रूस द्वारा डिजाइन किया जा रहा लैंडर बहुत हल्के ढंग से बिना किसी झटके के साथ चंद्रमा की सतह पर उतरेगा।

चंद्रयान-1 मिशन में ल्यूनर प्रोब के साथ ऐसी सुविधा नहीं थी। लैंडर चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट टचडाउन के बाद रोवर को निकालेगा, जो कुछ दूरी तक भ्रमण करके चट्टानों और अन्य वस्तुओं के नमूनों को एकत्र करेंगे। रोवर पर लगे वैज्ञानिक उपकरण चंद्रमा केसतही तत्वों का विश्लेषण करके डेटा को ऑर्बिटर के पास भेज देंगे। ऑर्बिटर यह सारा ब्योरा इसरो के अर्थ स्टेशन को प्रेषित कर देगा।

एक सवाल  है कि भारतीय वैज्ञानिक चंद्रमा में इतनी ज्यादा दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं, खासकर ऐसे समय जब रूस और अमेरिका की निकट भविष्य में वहां कोई बड़ा मिशन भेजने की कोई योजना नहीं है। रूस का लूना-2 यान 1959 में चंद्रमा की सतह पर उतरा था। चंद्रमा पर अंतिम मिशन सत्तर के दशक में भेजा गया था। इसरो के वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले मिशनों द्वारा एकत्र डेटा हमारे पास नहीं हैं। दूसरी बात यह कि दूसरे देशों द्वारा भेजे गए दर्जनों मिशन चंद्रमा पर पानी की खोज नहीं कर पाए। पानी की खोज का श्रेय हमारे चंद्रयान-1 मिशन को ही मिला।

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