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शक्तिरूपेण संस्थिता ग्लोबल गांव की देवियां

शक्तिरूपेण संस्थिता ग्लोबल गांव की देवियां

आज की स्त्री, लड़की जैसी खुद बनना चाहती है, वैसा ही आदर्श तलाशती है। नवरात्र देवी पूजा और देवी के नव रूपों के पूजने का उत्सव है। मगर आज के परिदृश्य में देखें तो चारों ओर लाखों-करोड़ों देवियां नजर आती हैं। वे अपनी बेड़ियों को तोड़कर इतनी आगे निकल आई हैं कि यह कहा जाने लगा है कि इसे देश में जिस इकॉनामिक ग्रोथ की बात हो रही है उसकी मूलवाहक मध्य वर्ग की वे स्त्रियां हैं, जिन्होंने घर और बाहर दोनों मोर्चे संभाले हैं। आत्मविश्वास से भरी ये औरतें हर जगह दिखाई देती हैं। दिल्ली मेट्रो को अपने यहां स्त्रियों के लिए अलग से कोच लगाना पड़ा है। आज वर्क प्लेस से लेकर बाजारों, सड़कों, दफ्तरों, मॉल्स में ये लड़कियां, स्त्रियां नजर आती हैं। जरा गौर से देखें, उनकी बातें सुनें तो ये उल्लास से भरी खिलखिलाती नजर आएंगी। महादेवी वर्मा के शब्दों की ‘नीर भरी दुख की बदली’ वाली इमेज को इन्होंने उतार फेंका है।
कहते हैं कि देवी को देवी बनाने में देवताओं का बहुत बड़ा हाथ था। उन्होंने अपनी-अपनी शक्तियां देवी को दी थीं। आज की आत्मविश्वास से भरी सीधी चलती, आंखों में आंखें डालकर बात करती और हर क्षेत्र में सफल होने को बेताब इस देवी को शक्तियां दी हैं हमारे लोकतंत्र, हमारी शिक्षा, बहुत-सी सरकारी योजनाओं ने भी। इस नई लड़की ने बता दिया है कि यदि समान अवसर मिलें और उन अवसरों के उपयोग की आजादी हो, तो यह लड़की दौड़कर आसमान छू सकती है। चंद्रमा की घर्षणविहीन जमीन जहां कूद-कूदकर चलना पड़ता है, वहां दौड़ लगा सकती है। भारत को आर्थिक शक्ति बनाने और उसे अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर एक ताकतवर देश के रूप में उभारने में इसी लड़की और स्त्री का हाथ है। कितने नाम गिनाएं? कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, देश के सबसे बड़े खेल महोत्सव को सफलतापूर्वक आयोजित कराने वाली शीला दीक्षित, धीर गम्भीर विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, उत्तर प्रदेश की कद्दावर मुख्यमंत्री मायावती, औरतों के लिए बेशुमार काम करने वाली वृंदा कारत, पर्यावरणविद मेनका गांधी। इसके अलावा खेलों के शीर्ष पर बैठी साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा, डोला बनर्जी, चार बार विश्व बॉक्सिंग चैम्पियन मैरी कॉम। इसी तरह समाज सेवी इला भट्ट, अरुणा राय, गौरा देवी, सईदा हमीद, वुमन कमीशन की गिरिजा व्यास। मनोरंजन के क्षेत्र में ऐश्वर्या राय, प्रियंका चोपड़ा, कैटरीना कैफ, करीना कपूर। बिजनेस में- शोभना भरतिया, इंदिरा नूयी, चंदा कोचर, प्रिया सिंह और किरण शॉ मजूमदार। इन महिलाओं को देखें तो ये वे हैं जो अपने-अपने क्षेत्र में शिखर पर हैं। शिखर पर पहुंचने के लिए हमेशा एक पिरामिड बनाना पड़ता है। एक औरत के शिखर पर पहुंचने के लिए सैकड़ों नीचे खड़ी औरतें और उनका अंतरराष्ट्रीय बहनापा काम आता है।

गांव की इन देवियों को जानिए

शहरों को छोड़िए, गांव-गांव में औरतों ने अपनी पहल और मेहनत से तसवीर बदल दी है। महाराष्ट्र को ही लें। यहां के रणमाला, नांदेगांव, श्रीगांव और मेंगदेवाली में एक ही बात समान है कि यहां की सरपंच औरतें हैं। रणमाला की चानगुजा रावजी सिनालगर 43 वर्ष की हैं। बचपन में पोलियो होने के कारण पैर खराब हो गया था। गांव की इस महिला को गांव वालों ने सर्वसम्मति से सरपंच चुना। वह दलित हैं। चानगुजा की सबसे पहली प्राथमिकता गांव की सफाई थी। उसने गांव भर में शौचालय बनवाए। इससे गांव की औरतें इतनी खुश हुईं कि उन्होंने शौचालयों के दरवाजों-दीवारों पर अपने-अपने नाम और घर के पते लिख दिए। इसी तरह की कहानी सुनीता राजाराम की है। 33 वर्ष की यह महिला नांदेगांव सतारा की है। इस गांव में पानी की बेहद कमी थी। सुनीता का कहना है कि अपनी शादी के अठारह साल तक वह सिर्फ पानी की तलाश में भटकती रही। फिर उसने सरकारी संस्था जल प्रकल्प का नाम सुना। उसकी मदद से इन्होंने पानी का संरक्षण करना शुरू किया। तीन साल बाद हालत यह है कि गांव में पानी की कोई कमी नहीं है। खेत लहलहा रहे हैं।

पैंतीस साल की लता दत्तात्रेय ने भी मेनगदेवाडी गांव की सरपंच बनकर नई मिसाल कायम की है। उन्होंने गांव में कन्या भ्रूण हत्या के मामले में अभियान चलाया। लोगों को लड़की का महत्व समझाया। अब गांव में जिस घर में भी लड़की पैदा होती है वहां सरपंच के नेतृत्व में उत्सव मनाया जाता है।

इन सबसे अलग है टौंक जिले के सोडा गांव की छवि राजावत। उसके दादा भी गांव के सरपंच थे। छवि देश के बेहतरीन संस्थानों में पढ़ी है। वह सरपंच चुने जाने के बाद बहुत से मुद्दों को हल करना चाहती है। उसके गांव में पानी की कमी है। जो पानी है उसमें भारी मात्र में फ्लोराइड है। बिजली की समस्या है। सड़कें खराब हैं। गांव में जींस-टी शर्ट पहनने वाली छवि का मानना है कि वह राजनीति में नहीं जाना चाहती। वह तो अपने गांव के विकास के लिए काम करना चाहती है।

आई कैरी स्पीड

टाटा फोटोन का एक एड इन दिनों आता है। इसमें एक लड़की हाथ में उपकरण पकड़े है और स्लोगन है-आई कैरी स्पीड। सचमुच आज की लड़की और स्पीड का जो सम्बंध है वह पहले कभी देखा सुना नहीं गया। अगर इस लड़की का एक रेखाचित्र बनाएं तो कुछ इस तरह दिखेगा- कटे बाल, आंखों पर धूप का चश्मा, पेंट-शर्ट का पहनावा, कंधे पर लैपटॉप, कानों पर आई फोन.. या तो वह तेज चाल से ठक-ठक करती चली जा रही है या टू व्हीलर, बस, मेट्रो, कार में फर्राटा भर रही है। नई आर्थिक नीतियों और ग्लोबलाइजेशन ने इस देवीस्वरूपा के लिए दुनिया के दरवाजे खोल दिए हैं। शिक्षा और तकनीकी ज्ञान ने उसे इन दरवाजों में प्रवेश दिलाया है।

शक्ति की ही पूजा

इन सभी महिलाओं या जिन्हें हम देवियां कह रहे हैं, इनमें एक बात समान है- चुनौतियों का डटकर सामना करना और हिम्मत न हारना। इसीलिए तो इंदिरा नूयी ने एक बार एक मीटिंग में कहा था- ‘क्या पता कल को तुममें से ही कोई इंदिरा नूयी बन जाए।’

इंदिरा नूयी का यह कथन अपनी समकालीन चंदा कोचर के बारे में कितना सही है। 1983 में चंदा ने आई.सी.आई.सी.आई. बैंक में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में करियर शुरू किया था और आज वह सर्वोच्च पद पर हैं। औरतों ने अपने कठिन परिश्रम से शिखर प्राप्त किया है और वे अपने-अपने शक्ति केंद्रों के शीर्ष पर जा बैठी हैं। जब इंदिरा नूयी कहती हैं कि यदि आपके बॉस का मेल सवेरे चार बजे आया हो तो उसका जवाब चार बजकर एक मिनट पर चला जाना चाहिए, तब वह अपने अथक परिश्रम की ही बात कह रही होती हैं। दवाओं के क्षेत्र में नाम कमाने वाली किरण शॉ मजूमदार भी अपनी सफता का सारा श्रेय अपनी मध्यवर्गीय अपब्रिगिंग और अथक परिश्रम को देती हैं।

सावित्री का उदाहरण आजकल बहुत नेगेटिव रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन यदि उस स्त्री के आत्मविश्वास और न थकने वाली मेहनत और निडरता को देखिए कि वह यमराज तक से भी नहीं डरी। इसी तरह पार्वती को उनके शुभचिंतकों ने डराया कि जिसे वर के रूप में पाना चाहती हो, वह तो अवधूत है। न तन पर कपड़े न रहने को घर। लेकिन उनका अडिग निश्चय बना रहा कि वह शिव से ही विवाह करेंगी। आज की इन देवियों ने शायद विरासत में मिली देवियों से ही बहुत कुछ सीखा है।

दुनिया कुछ बेहतर बनाएं

ये नई देवियां सिर्फ अपने और अपने परिवार के बारे में ही नहीं सोच रही हैं। दुनिया की समस्याओं पर गम्भीरता से विचार कर रही हैं। इंदिरा नूयी जब कहती हैं कि दुनिया में एक अरब लोगों को साफ पानी नहीं मिलता है। पानी की कमी दुनिया का सबसे बड़ा चैलेंज है या कि ‘परफारमेंस’ यदि बिना ‘परपज’ के हो तो इसे वह ठीक नहीं मानतीं। चंदा कोचर भी आई.सी.आई.सी.आई. में महिलाओं के उत्थान के लिए बैंक में अधिक से अधिक महिलाओं को रखने की पक्षधर हैं। सरकारी योजनाओं के तहत औरतों की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की वजह से माताओं की मृत्युदर में कमी आई है। इससे आने वाले दिनों में महिलाओं के स्वास्थ्य की तसवीर ही नहीं बदलेगी, नई जेनरेशन का भाग्य भी बदल जाएगा।

जिस तरह लड़कियां सामाजिक समस्याओं पर बोल रही हैं, धार्मिक उन्माद फैलाने वालों को भी चुनौती दे रही हैं। अयोध्या मसले पर हमने हाल ही में बहुत-सी सामान्य लड़कियों से लेकर सेलिब्रिटीज तक को बोलते सुना। सभी इस बात पर एकमत थीं कि समाज के ताने-बाने को बिगाड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। जिस तरह रक्तबीज का संहार काली के हाथों हुआ था, उसी तरह आज की ये देवियां हर उस राक्षस का वध करने को तैयार हैं जो उनकी जिंदगी में जहर घोलता हो। चाहे वह राक्षस शराब के रूप में सामने आए या धार्मिक उन्मादियों के रूप में। उत्तराखंड, आंध्र, हरियाणा में शराबबंदी आंदोलन में अग्रणी भूमिका महिलाओं ने ही निभाई थी। 2009 में रामसेना के हमले के जवाब में महिलाओं ने पिंक ब्रिगेड के बैनर तले प्रमोद मुथालिक को पिंक चड्डी भेजने का अभियान चलाया था। यह अभियान सोशल नेटवर्किग साइट्स पर भी सफल रहा था। दुकानों से एक-एक दिन में डेढ़-डेढ़ सौ चड्डियां गायब हो गई थीं।

आइए इन देवियों का स्वागत करें।

इंदिरा: स्त्री-शक्ति की प्रतीक

सुष्मिता सेन ने जब मिस युनिवर्स का खिताब जीता था, उस समय उनसे पूछा गया था कि उनका आदर्श कौन है। जवाब था- इंदिरा गांधी। आज जो लड़के-लड़कियां 20-25 आयुवर्ग के हैं, उनमें से बहुत से इंदिरा गांधी को अपना आदर्श मानते हैं हालांकि उन्होंने इंदिरा जी का जमाना नहीं देखा है। इंदिरा गांधी इस देश में स्त्री शक्ति का प्रतीक हैं। बहुत पहले एम.एफ. हुसैन ने उन्हें दुर्गा के रूप में चित्रित किया था। उस समय लोगों ने इसकी आलोचना की थी, लेकिन यंग जेनरेशन इंदिरा गांधी को एक ताकतवर और लौह महिला के रूप में देखती और पूजती है। वर्षों पहले इंग्लैंड की लौह महिला कही जाने वाली वहां की प्रधानमंत्री मारगेट्र थैचर यहां आई थीं। इंदिरा जी यहां की प्रधानमंत्री थीं। तब न जाने कितने अखबारों ने इन दो शक्तिशाली महिलाओं की तुलना की थी और निष्कर्ष निकाला था कि अपनी प्रधानमंत्री की शालीनता का कोई जवाब नहीं।

‘इंदिरा जी की शक्ति उनके मौन में थी’-  ऐसा उनकी करीबी मित्र पुपुल जयकर ने लिखा था। लेकिन आश्चर्य तो यह है कि आज की बातूनी, हर वक्त कान पर मौबाइल लगाए पीढ़ी को इंदिरा गांधी या उन्हीं की तरह कम बोलने वाली सोनिया गांधी में इंदिरा गांधी की छवि दिखाई देती है।

हाल ही में जब प्रियंका गांधी ने अपना हेयर स्टाइल बदला तो सारे लड़के-लड़कियां कहने लगे कि वह तो एकदम इंदिरा गांधी लगती हैं।

इनका लोहा कौन न माने!

राजनीति पर नजर डालिए। केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी, विपक्ष की ताकतवर नेता भारतीय जनता पार्टी की सुषमा स्वराज, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की बृंदा करात, तृणमूल कांग्रेस की फायरब्रांड नेता ममता बनर्जी, दलित अधिकारों की प्रमुख प्रवक्ता और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती हरियाणा की नेता शैलजा कुमारी, भाजपा. नेता पर्यावरणविद मेनका गांधी, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, अरुणा राय, इला भट्ट तथा ऐसे बहुत से नाम जो गाहे-बगाहे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं। इनमें सबमें सवरेपरि हमारी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल। और हां, लम्बे समय से दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज शीला दीक्षित को मत भूल जाइएगा। इस पर भी सोने में सुहागा यह कि केबिनेट ने महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले बिल को संसद में रखने की मंजूरी दे दी है। क्या आपने इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं की उपस्थिति और निर्णायक पदों पर महिलाओं को बैठे सुना है? हाल ही में जब भारत-पाकिस्तान के विदेश सचिवों की वार्ता हुई थी तो एक अखबार ने दोनों सचिवों को हाथ मिलाते हुए नहीं सिर्फ उनके हाथों को छापा था। निर्णयकारी पद पर बैठी एक स्त्री निरूपमा राव का हाथ। चित्र एक प्रतीक था वुमैन एमपावरमेंट और भारत में स्त्रियों की स्थिति बताने के लिए।

अमरीका में कामकाजी औरतों का एक सर्वे हुआ था जिसमें पता चला था कि वहां मैनेजमेंट तथा उससे जुड़े अन्य उच्च कार्यों में जो औरतें काम करती हैं उनमें गोरी तथा एशियाई औरतों का प्रतिशत 41 और 46 है। यानी कि एशियाई स्त्रियां अमरीकी स्त्रियों को उनके ही देश में तगड़ी टक्कर दे रही हैं।

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