DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पुरुषों की नस समझ लीजिए जिंदगी आसान

पुरुषों की नस समझ लीजिए जिंदगी आसान

सवाल तो बड़ा उलझा हुआ है लेकिन जानने में कोई हर्ज नहीं कि आजकल के पुरुष क्या सोचते हैं अपनी चाहत और पसंद के बारे में। पैसे को लेकर इनका क्या कहना है, महिलाओं के बारे में कैसा सोचते हैं वगैरा, वगैरा। इस तरह की बीस बातें हैं जिन पर पुरुषों की राय के पन्ने आपके सामने खोले जा रहे हैं। आप खुद ही तय करें कि वे सही सोचते हैं या गलत।

पैसा, पैसा, पैसा

गाना तो गाते हैं कि पैसा, पैसा करती है तू पैसे पर क्यों मरती है लेकिन खुद को भरपूर पैसा चाहिए। बैंक में माल भरा हो और कोई यह न पूछे कि कहां से आया इतना पैसा। साथ ही वह पैसा व्हाइट में हो तो कहना ही क्या। तजिंदर डोगरा कहते हैं कि पुरुषों को पैसा चाहिए और वह भी व्हाइट में। कम से कम इतना तो हो कि अपने सारे खर्चे पूरे हो सकें, ईएमआई दे सकें और कुछ निवेश कर सकें।

गठीला बदन

सलमान, शाहरुख, आमिर जैसे अभिनेता अगर अपनी सिक्स पैक बॉडी बना सकते हैं तो उनके फैन क्यों नहीं बना सकते। उन्हें भी लगता है कि बॉडी तो सॉलिड होनी ही चाहिए। देबांजन चक्रवर्ती का कहना है कि पैक छह हों या आठ, कुछ भी चलेगा। लेकिन कुछ लोग एक ही पैक पर संतुष्ट रहते हैं। उनके हिसाब से पेट का थोड़ा बाहर रहना सम्पन्नता की निशानी है। 27 साल के कॉपी राइटर नितिन अग्रवाल का मानना है कि महिलाओं को अमीर लोग पसंद हैं लेकिन मोटा होना कोई अच्छा आइडिया नहीं है।

औरत

महिलाएं तो ऐसी होनी चाहिए जो यह न कहें कि तुमने मेरे मन की बात क्यों नहीं जान ली। उन्हें कोई जल परी या करिश्मा कपूर नहीं चाहिए लेकिन वे कम से कम बातें सीधी करें। बायोटेक्नोलॉजी के छात्र क्षितिज चावला कहते हैं कि घुमावदार नहीं चलेगी। उन्हें क्या कहना है, क्या सलाह करनी है, साफ-साफ कहें तो ठीक रहेगा। तेरे दिल में आज क्या है, तू कहे तो मैं बता दूं, वाला अंदाज नहीं चाहिए।

लड़की

लड़कियों की बात अलग है। वह जरूर ऐसी होनी चाहिए जो हमारे मन की बात जान ले। करन जोसफ राघवन का कहना है कि मैं क्या सोचता हूं, वह उसे पता होना चहिए। रोजाना तो नहीं लेकिन कम से कम महीने में एक बार तो हमारी तारीफ करे। अब क्या है कि जितना वह हमें समङोगी, उतनी आसानी होगी।

समझदारी

विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाएं जल्दी समझदार होती हैं। पुरुषों का भी मानना है कि महिलाएं ज्यादा समझदार होनी चाहिए। राघवन मानते हैं कि ऐसा होना तो चाहिए लेकिन ऐसा लगता है कि हर बात पर चहकने वाली लड़कियां ही औरतों के रूप में सामने रहती हैं। समझदारी दिखती नहीं। वह इतना तो समझे कि मर्द को जब गुस्सा आता है तो उसे क्या करना चाहिए। कुछ समय के लिए अकेला तो छोड़ दे।

सेक्स

एक पुरुष का जीवन इस शब्द के इर्द-गिर्द घूमता है। मार्केटिंग से जुड़े सौरभ अग्रवाल कहते हैं कि जीवन में जब आराम बढ़ता है तो पाए जाने वाले सुखों में सबसे ऊपर तो यही रहता है। ऑफिस में भी सुंदर चेहरे हों तो क्या बात है।

शराब

अपने में खो जाने के लिए इससे बढ़ कर और कोई रास्ता नहीं। शराब पीना बुरा है भला, इसकी परवाह कौन करे। जहां चार यार मिल जाएं, वहीं रात हो गुलजार, के फॉर्मूले पर चलना पसंद है। कुछ मर्दानी बात है इसमें। चक्रवर्ती को लगता है कि बेशक महिलाएं शिकायत करें लेकिन कुछ मामलों में वे पसंद भी करती हैं।

तनख्वाह

ऐसी नौकरी तो हो जिसमें खाने-पीने के साथ-साथ घूमने के लिए भी पैसा मिल सके। तनख्वाह अच्छी होनी चाहिए। एक आजादी का एहसास तो हो। ऐसा नहीं कि मन मार के जी रहे हैं। हर कदम पर कटौती करनी पड़े तो बड़ी कोफ्त होती है। अरोड़ा का कहना है कि सास-बहू के धारावाहिक की ऊब से निकल कुछ रोमांच के लिए जगह बनाई जा सके, ऐसी नौकरी होनी चाहिए।

नाइट पार्टी

दोस्तों के साथ सप्ताह में कम से कम एक बार तो ऐसा मौका मिले। पुरुष नहीं चाहते कि उनका हर पल घरवाली के साथ ही बीते। अरोड़ा की राय है कि दोस्तों को आपस में मिल कर मस्ती करने का मौका मिलना ही चाहिए। दोस्तों के साथ बिना किसी बंधन या रोकटोक के खुशी मनाने का अवसर मिलता है तो बड़ा अच्छा लगता है।

खरीदारी

बड़ा ही बोरिंग काम लगता है। घर वालों के साथ तो यह सजा से कम नहीं। एक ही दुकान पर खड़े रहना डरावना लगता है। खास तौर पर तब जब मां, बहन, बीवी, गर्लफ्रेंड यह तय न कर पाएं कि क्या खरीदना है। चावला इसे सबसे खराब समय मानते हैं।

पार्टी

माइकल जैक्सन या जॉन की तरह डांस का दम न हो फिर भी कोशिश यही रहती है कि पार्टी में सबकी निगाहों उनकी तरफ हो। भागड़ा हो या तख्ततोड़ डांस, रहनी चाहिए फुल मस्ती। इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि देखने वाले क्या सोचते हैं या कहते हैं। ध्यान खींचने में महिलाएं भी कम माहिर नहीं होतीं लेकिन पुरुषों से जरा कम। साथ में पार्टी की चाहत भी कम नहीं होती। उसके बाद पी कर धुत पड़े दोस्त को उसके घर छोड़ने में बड़ी जिम्मेदारी का एहसास होता है।

असर

घर हो या दफ्तर, बात तो उनकी ही मानी जानी चाहिए। लगता है कि हम सभ्यता में आगे आ गए हैं लेकिन सामने वाला उनसे डरना भी तो चाहिए। बॉस को उन्हें कुछ कहने में संकोच नहीं हो तो फिर सब बेकार। इसके बाद ही तो कह पाएंगे कि देखा मेरे से बात करने में बॉस को भी सोचना पड़ता है। ऐसे ही कोई कुछ कह देगा क्या।

बचपना

राघवन कहते हैं कि हम जीवन भर मां को छोड़कर महिलाओं को बच्चों की तरह प्यार से उनका खयाल रखते हैं। हम भी चाहते हैं कि हमारा भी कोई इसी तरह खयाल रखे। चाहें भी क्यों न, जिम्मेदारियों से दूर रहना किसे पसंद नहीं है।

शरीर के बाल

दाढ़ी या मूंछ बनाना तो रुटीन में आता है लेकिन शरीर के दूसरों हिस्सों के बालों पर चर्चा कम ही होती है। पुरुषों को लगता है कि उनके शरीर के बाल महिलाओं को पसंद आते हैं। बात कुछ इसी तरह मर्दाना बनती है। विपरीत का आकर्षण वाली बात दिखाई देती है।

कोई काम मुश्किल नहीं

पुरुषों को लगता है कि और कुछ हो न हो, उन्हें स्ट्रीट स्मार्ट तो होना ही चाहिए। वर्ना लोग यही ताने देंगे कि कुछ करना भी आता है कि नहीं।

ड्राइविंग स्किल्स

दूसरों को तपाक से कहते सुना जा सकता है कि देखो कैसे गाड़ी चला रहा है। अपनी ड्राइविंग पर पूरा भरोसा होता है। ट्रैफिक सेंस अपनी तो बहुत अच्छी होती है। उन्हें यह भी लगता है कि ट्रैफिक पुलिस वाला उन्हें वीआईपी मानते हुए चाहे वे कैसे भी चलें, कुछ न कहे।

ढिशुम-ढिशुम

लगता है कि कौई ऐसा मौका आए कि किसी बदमाश को ऐसा उठा कर फेंक डालें कि देखने वाले उनकी तुलना हीरो से करें। चावला कहते हैं कि कम से कम अपनी रक्षा या बचाव करने में तो कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। और भी बहुत सारी बातें है जिन पर पुरुषों की अपनी राय है या हो सकती है। कोई जरूरी नहीं कि हर पुरुष ऐसा ही सोचे लेकिन जितने लोगों से बात की गई उनकी राय में पुरुष ऐसे ही होते हैं। खैर, इस पर हमेशा ही अलग-अलग राय होती है फिर भी उनकी सोच के घेरे में झांकने की यह एक कोशिश मात्र है।

एकांत

पुरुषों के लिए यह निहायत ही जरूरी बात है। उन्हें अपने एकांत या निजता से बड़ा प्रेम होता है। अरोड़ा का कहना है कि हमारा अलग कमरा होना चाहिए जहां कोई भी हमें परेशान न करे। वह बड़ा ही भाग्यशाली होगा जिसे ऐसी औरत मिलेगी जो इसकी अहमियत समझती होगी और इसका सम्मान करती होगी।

खाना

खाना तो बढ़िया होना ही चाहिए। दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है, यह अक्सर लड़कियों को समझाया जाता है। पति का दिल जीतने के लिए खाना अच्छा बनाने की नसीहत घर की बड़ी-बूढ़ी औरतें देती रहती हैं। अग्रवाल कहते हैं कि कौई बात नहीं। मां की तरह तुम्हें खाना बनाना नहीं आता तो क्या हुआ। कम से कम ऐसा तो बनाएं कि गुस्सा न आए। अब तो हम किचन में उनका हाथ बटाने को तैयार हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पुरुषों की नस समझ लीजिए जिंदगी आसान