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शास्त्रीयता के शिखर पुरुष मल्लिकार्जुन मंसूर

शास्त्रीयता के शिखर पुरुष मल्लिकार्जुन मंसूर

पंडितजी विगत चार-पांच दशकों के अंतराल में भारतीय शास्त्रीय संगीत के चार-पांच चुनिंदा दिग्गजों में अन्यतम थे। बिल्कुल शिखर प्रतिभा। शायद ही कोई संगीतज्ञ उन तक पहुंचा हो। मंसूर संगीत के क्षेत्र में साठ सालों से भी ज्यादा अवधि तक सक्रिय रहे। संगीत ही नहीं, बल्कि किसी भी कला विधा में इतने समय तक निरंतर सक्रिय रहने वाले बहुत कम लोग मिलेंगे।

चार साल की उम्र में उन्होंने घरबार छोड़कर संगीत सीखना; गाना-बजाना शुरू किया था। यह सिलसिला 82 साल की आयु में उम्र के अंतिम दिन तक जारी रहा। आखिर तक उन्होंने पेशेवर मंच प्रस्तुति देना जारी रखा। उल्लेखनीय बात यह है कि इसके पीछे कोई व्यावसायिक प्रेरणा नहीं थी, बल्कि संगीत ही उनके लिए सांस थी।

पंडित जी का सन् 1929-30 में पहला कमर्शियल रिकार्ड बना। एच एम वी वालों ने बनाया। और उसके बाद से यह सिलसिला सन् 1991 तक चलता रहा। इस तरह साठ सालों तक कोई संगीत रिकार्ड करा रहा है, यह साधारण बात नहीं है।

उनका पहला पब्लिक कंसर्ट सन् 1927 में हुआ था। वह कर्नाटक के धारवाड़ इलाके के थे। वहीं उनका जन्म हुआ था। उनका पहला पब्लिक कंसर्ट भी वहीं हुआ। और, उनकी अंतिम सार्वजनिक प्रस्तुति सन् 1992 में (पंडितजी का इसी वर्ष 12 सितंबर को देहांत हुआ) दिल्ली के कमानी सभागार में हुई। मृत्यु के पहले अगस्त में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में मियां की मल्हार ‘करीम नाम तेरो’ गायी। उन्हें फेफड़े का कैंसर था, पर मृत्यु के चौदह दिनों पूर्व उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए करीब चालीस मिनट तक गाया। इस व्यापकता से उनके कला-कर्म के विस्तार का अंदाजा लग सकता है। शास्त्रीय संगीत में सक्रियता का उनका यह दृष्टांत इकलौता भले ही न हो, विरल अवश्य है।

संगीत के क्षेत्र में समयावधि के लिहाज से अकेले पंडित रविशंकरजी उनकी बराबरी कर सकते हैं। इसलिए यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है कि इन दोनों दिग्गजों में गहरी दोस्ती रही। सन् 1952 के आसपास इन दोनों का जो संपर्क हुआ वह 1992 तक गहरे मेलजोल के रूप में बना रहा।

पंडितजी गहरे तक आध्यात्मिक थे। यह दिलचस्प है कि वे संगीत में अपनी सिद्धि का श्रेय अपने आध्यात्मिक गुरुओं को देते थे, जबकि अपने संगीत के गुरुओं के प्रति उनके अंतर में हमेशा अपार श्रद्धा मौजूद रही। उन्होंने लिंगायत संप्रदाय के श्री मृत्युंजय स्वामी से दीक्षा ली थी।

पंडितजी बसवेश्वर और अक्का महादेवी के पदों को बड़े प्रेम से गाते थे। उनकी आध्यात्मिकता में आचार भी शामिल थे और उनके प्रति वे गहन अनुशासन रखते थे। वे नित्य पूजा के पहले जलस्पर्श तक नहीं करते थे। निस्संदेह वे धार्मिक थे और इस तरह के अनुशासन के कारण उन्हें सफर वगैरह में तकलीफ भी होती थी, लेकिन उन्होंने इसे कभी भंग नहीं होने दिया। वे संगीत में भक्ति को जरूरी मानते थे।  

सन् 1979 में जब मैं रेडियो में सरोद बजाता था तभी दिल्ली में ही उनके करीब आने का सौभाग्य मिला। पंडितजी का निर्मल शिशु जैसा सहज व्यवहार था। सबके साथ अपना संगीत-ज्ञान बांटने की प्रगाढ़ इच्छा उनमें थी। बिना किसी दंभ के वे सबसे संवाद करने को उत्सुक रहते थे। इन्हीं चीजों के कारण सहज ही मैं उनकी तरफ आकर्षित हुआ।

आप उनसे कोई प्रश्न करते तो वे आपकी अज्ञानता के कारण आपको किसी निम्न आसन पर बिठाकर खुद ऊंचे आसन चढ़कर बताते, ऐसा नहीं होता। वे हरेक जिज्ञासा को बहुत गहराई या पूरी ऊंचाई तक जाकर शांत करने का प्रयत्न करते थे और जिज्ञासु को भी उसी स्तर तक ले जाते थे जहां वे खुद होते थे।

उनकी यह अद्भुत क्षमता थी। किसी भी सवाल से वे कतराते नहीं थे। सवाल करने वाले को कभी छोटा नहीं समझते थे।.. वे कंठ-संगीत के थे और मैं तंत्री-वाद्य का हूं, पर उन्होंने पूरे जीवन मुझे इसी तरह बताया। उन्होंने मुझे साथ रखकर आगे का रास्ता दिखाया। अपनी विद्वता के शिखर से पंडितजी कभी नीचे नहीं उतरे पर जब भी किसी ने कोई जिज्ञासा प्रकट की उसे वे उसी शिखर तक ले गए। वे पारसमणि थे, जिसे छुआ वह सोना हो गया।

संगीत उनका फितूर था, उन्हें बहाना चाहिए होता था इसको प्रत्यक्ष करने का। वे अपना दिन संगीत के सहारे ही बिताने की कोशिश करते थे। वे संगीत की महत्ता और गरिमा से पूर्णत: वाकिफ थे, पर वे अपनी विशिष्टता और श्रेष्ठता से किसी निर्दोष शिशु की तरह अनभिज्ञ रहे। 1986-87 की बात है। मेरी बेटी तब बिल्कुल छोटी थी। जब पंडितजी दिल्ली में मेरे घर आते तो उसे सुलाने के लिए लोरियां गाया करते। एक बार यहीं दिल्ली में उनका कार्यक्रम था और मेरी पत्नी उसमें नहीं जा पाई। कार्यक्रम के बाद जब वे लौटे तो उसे बताया कि वहां उन्होंने क्या गाया। यह बताना सिर्फ बताना नहीं था, पंडितजी ने पूरा गाकर उसे सुनाया।

दिल्ली आने पर वे प्राय: मेरे पास रहते थे और मुझे भी धारवाड़ में उनके घर पर रहने का मौका मिला। मैंने लगभग 100 कार्यक्रमों में उनके साथ भाग लिया। सरोद बजाया। हालांकि पंडितजी के परिवार की संगीत की पृष्ठभूमि नहीं थी। वे एक बेहद गरीब किसान के बेटे थे। सिर्फ उनके बड़े भाई थे जो हारमोनियम बजाते थे और नाटक से जुड़े थे। पंडितजी ने ग्वालियर घराने के प्रसिद्ध गुरु पंडित नीलकंठ बुआ आलूरमठ, और कोल्हापुर में रहने वाले जयपुर अतरौली घराने के उस्ताद अल्लादिया खां के बेटों उस्ताद मंजी खां और भुर्जी खां से संगीत की शिक्षा ली।

पंडितजी संस्कृति और परम्परा को सबसे बड़े धर्म की तरह मानते थे। एक बार किसी ने व्यंग्यवश उन्हें ‘अपने गुरु का तोता’ कहा। इस पर पंडितजी ने कहा कि इससे बड़ी बात मेरे लिए और क्या हो सकती है। शुद्धता के वे बड़े आग्रही थे। उनका कहना था कि राग संगीत व्याकरणबद्ध है, उसे तोड़ना आसान है पर बनाए रखना बहुत मुश्किल है। सदियों में कोई एक चीज बनी है उसे अपनी रचनात्मकता से बदलना आसान है पर उसके मूलरूप को बनाए रखना बेहद कठिन है। फिर उनका यह भी मानना था कि अपने घर की दरोदीवार को सुव्यवस्थित रखना चाहिए ताकि उसमें बाहर से उड़कर धूल-गंदगी न घुस आए।

वे कहते थे, शास्त्रीय संगीत में जो भी इनोवेशन, चिंतन या प्रयोग करना है सब कुछ उसी दायरे में समेटना पड़ेगा। नया राग बनाना बड़ी बात नहीं है, पर पुराने रागों को सीखना बहुत मुश्किल है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में पुराने और अप्रचलित रागों को सहज तरीके से सामने लाने का श्रेय पंडितजी को ही जाता है। उन्होंने एक सौ से ज्यादा दुर्लभ रागों का गायन किया। इनमें से अधिकतर रिकार्ड किए जा चुके हैं। पंडित रविशंकर ने माना है कि खोयी हुई विरासत को बचाने का श्रेय सबसे ज्यादा पंडित मंसूरजी को है। किशोरी अमोनकर ने भी कहा है कि परंपरा को सबसे ज्यादा बचाकर पंडितजी ने ही रखा।

उनका परिवार बहुत बड़ा था। पत्नी, सात कन्याएं और एक बेटा। वे अत्यंत साधारण गृहस्थ का जीवन जीते थे। उन्होंने आजीवन पारिवारिक दायित्व बखूबी निभाया। परेशानियां झेलीं, लेकिन सत्तर सालों में कभी संगीत का रियाज नागा नहीं किया। अपने घर के सबसे छोटे कमरे में लोहे की एक छोटी-सी खाट पर बैठकर वे रियाज करते थे। तानपूरा हमेशा सुर में मिलाकर रखते थे।

वे शिखर पर पहुंचने के बाद भी आजीवन छात्र बने रहे। खुद से काफी कम उम्र वालों से भी सीखने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। दूसरी तरफ वे किसी चीज का श्रेय खुद नहीं लेते थे। कोई चीज गाते वक्त जब तार गांधार लगाते तो तारीफ करते थे कि यह तो रहमत खां साहब की देन है, जबकि उन्होंने रहमतखां साहब को न तो सुना था न देखा था। शायद यह बात उन्हें उनके गुरुदेव ने सिखाते वक्त बताई थी और वहीं से वे हमेशा रहमतखां जी का आभार जताते रहते थे। उन्हें अनेक सम्मान मिले पर वे अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा पुरस्कार फैयाज खां साहब की तारीफ और बाल गंधर्व की अपने कार्यक्रम में उपस्थिति को मानते थे।
प्रस्तुति : धर्मेन्द्र सुशांत

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