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तो टैगोर का शांतिनिकेतन भी बिक जाएगा

भूमि अधिग्रहण के सवाल पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का अक्खड़पन घटने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। उन्होंने न सिंगूर से शिक्षा ली, न नंदीग्राम से और न लालगढ़ से। नयाचर में सेज के लिए जमीन अधिगृहीत किए जाने के बाद राज्य सरकार ने अब डानकुनी की जमीन का अधिग्रहण किया है।

डानकुनी में अधिगृहीत भूमि पर फ्लाई ओवर बन रहा है। इस अधिग्रहण को लेकर किसी का विरोध नहीं हो सकता, क्योंकि इससे परिवहन सुगम होगा, लेकिन प्रशासन की अक्खड़ता यहां भी है। अक्खड़ता मुआवजे को लेकर प्रकट हो रही है।

भूमि अधिग्रहण के साथ जो शब्द अनिवार्यत: जुड़ा हुआ है, वह है- पुनर्वास। डानकुनी में फ्लाई ओवर बनने से किसान या खेत मजदूर नहीं, व्यवसायी उजड़ेंगे। इस पुल के बनने से सैकड़ों दुकानदार, मकान मालिक व फुटपाथ के दुकानदार उजड़ने जा रहे हैं। इनकी संख्या करीब ढाई हजार है, लेकिन स्थानीय शासन ने सिर्फ 122 लोगों के पुनर्वास का ऐलान किया है। बाकी लोग कहां जाएंगे? इस अधिग्रहण से अनेक वितरक, खरीदार, रिक्शाचालक प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभावित होंगे। उनका क्या होगा? उनके परिजनों का क्या होगा?

डानकुनी से उजाड़े जा रहे दुकानदारों का पुनर्वास एक किलोमीटर दूर किया जा रहा है। सरकारी तौर पर कहा गया है कि कुछ लोगों को फ्लाई ओवर के नीचे भी जगह दी जाएगी, लेकिन अभी तक यह तय नहीं है कि जिसकी दुकान जितनी बड़ी थी, उतनी ही बड़ी दुकान उसे मिलेगी या नहीं? वहां यदि व्यवसाय नहीं चला, तब उनकी और उनके यहां काम करने वाले कर्मचारियों की जीविका का क्या होगा? विभिन्न मकानों में रहने वाले किरायेदारों के साथ भी कोई लिखित समझौता नहीं किया गया है। जो लोग प्रभावित हो रहे हैं, उन्हें सही-सही मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा है।

इन्हीं सवालों को लेकर डानकुनी व्यवसायी समिति ने आंदोलन छेड़ रखा है। समिति का कहना है कि सभी लोगों को मुआवजा देना होगा। जिसकी जितनी जगह ली जा रही है, प्रशासन को उसे उतनी ही जगह देनी होगी। पुनर्वास वाली जगह दुकानदारों की सहमति से ही तय की जानी चाहिए, क्योंकि दुर्गापुर एक्सप्रेस-वे के किनारे जो जगह राज्य सरकार के सार्वजनिक निर्माण विभाग ने पुनर्वास के लिए तय की है, उसे समिति ने स्वीकार नहीं किया है।

राज्य सरकार भूमि मालिकों को बाजार भाव से काफी कम राशि बतौर मुआवजा दे रही है। पहले यहां की जमीन का जो भाव था, उसी को आधार मानकर बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने मुआवजे का भाव सुनिश्चित किया है।
पुनर्वास की वैकल्पिक जगह सहमति से तय होनी चाहिए और मुआवजे की राशि बाजार के मौजूदा भाव के अनुसार होने के बाद ही वहां से दुकानदारों व निवासियों को हटाया जाना चाहिए। राज्य सरकार को वर्ष 1994 के जमीन अधिग्रहण कानून का भय दिखाने से बाज आना चाहिए। उस कानून में कहा गया है कि जनहित के लिए, मसलन अस्पताल, स्कूल, खेल मैदान आदि के लिए सरकार जमीन का अधिग्रहण कर सकती है। 

वर्ष 1994 के भूमि अधिग्रहण कानून का दुरुपयोग करना राज्य सरकार कब बंद करेगी, मुझे नहीं पता। इसके दुरुपयोग की पराकाष्ठा हम शांतिनिकेतन में देख चुके हैं। रवींद्रनाथ ठाकुर की जयंती का यह 150वां साल है और उन्हीं द्वारा स्थापित विश्वभारती विश्वविद्यालय, जिसे हम शांतिनिकेतन आश्रम कहते आए हैं, की जमीन का अधिग्रहण माकपा के प्रभुत्व वाले श्रीनिकेतन-शांतिनिकेतन विकास प्राधिकरण ने कर लिया- विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के लिए।

इस अधिग्रहण के खिलाफ हम लड़ रहे हैं और लड़ते रहेंगे। शांतिनिकेतन को बचाने के लिए, रवींद्रनाथ के नाम की रक्षा के लिए सभी रवींद्रप्रेमियों को आगे आना चाहिए। शांतिनिकेतन से रवींद्रनाथ के प्रभाव को मिटाने की साजिश कोई नहीं सह सकता। रवींद्रनाथ का आश्रम सदैव से ही पर्यावरण की रक्षा की सीख देता आया है, उसके विपरीत आचरण को आखिर कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? यह देश कितना अभागा है, जहां शांतिनिकेतन की जमीन भी बेच दी जाती है।

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