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अगले आईपीएल में बदल जाएगा नजारा

उत्तर प्रदेश के रहने वाले और महाराष्ट्र से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य राजीव शुक्ला का व्यक्तित्व बहुआयामी है। पत्रकार से क्रिकेट प्रशासक और फिर राजनेता बने शुक्ला के हाल ही में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का उपाध्यक्ष मनोनीत होने के बाद खेल और खेलों की राजनीति पर उनसे रूबरू हुए राजनीतिक संपादक निर्मल पाठक:

आप पत्रकार हैं, राजनेता हैं, क्रिकेट प्रशासक हैं, उद्योगपति हैं, क्या हैं?
मैं खाली नहीं बैठता। कुछ न कुछ करता रहता हूं। लेकिन मेरा मुख्य फोकस राजनीति है। इसके बाद जो समय बचता है वह क्रिकेट को देता हूं। क्रिकेट में बहुत ज्यादा समय देने की जरूरत नहीं होती। दिन भर में एक घंटा बहुत होता है। व्यवसाय में न्यूज-24 से मैनें खुद को अलग रखा है। बालीवुड में दिलचस्पी के चलते ई-24 को जरूर में कुछ समय देता हूं।

राजनेता क्यों चिपके रहना चाहते हैं खेलों से?
देखिये, राजनेता भी इसी समाज से आते हैं। कुछ अच्छे हैं, कुछ गड़बड़ भी हैं। लेकिन इसकी वजह से यह तो नहीं हो सकता कि सभी जगह आप अफसरों, इंजीनियरों या व्यापारियों को भर दें। खराब लोग तो उनमें भी होंगे। महत्वपूर्ण यह है कि कौन कितना समर्पित है।

खेल संगठनों की कमान खिलाड़ियों के हाथ में क्यों नहीं है?
ऐसे भी उदाहरण हैं जहां किसी संगठन की कमान खिलाड़ियों के हाथ में आई और उन्होंने बेड़ा गर्क कर दिया। ऐसे भी उदाहरण हैं जब खिलाड़ियों ने संगठन को उबारा है। महत्व इस बात का है कि जिसे दायित्व सौंपा जा रहा है वह सक्षम है या नहीं। यह बहुत ही बेतुका तर्क है कि खेल संगठन तभी ठीक होंगे जब उनकी कमान खिलाड़ियों के हाथ में होगी।

पर शरद पवार न तो क्रिकेट के साथ न्याय कर पा रहे हैं और न अपने मंत्रालय के साथ।
पवार साहब का क्रिकेट से पुराना लगाव है। उनके ससुर बड़े खिलाड़ी थे। मंत्रालय के साथ न्याय कर पा रहे हैं या नहीं यह मैं नहीं जानता पर मैं इतना जानता हूं कि क्रिकेट में इतना ज्यादा काम नहीं होता कि उससे किसी दूसरे काम पर असर पड़े। सच्चाई यह है कि उनके बीसीसीआई का अध्यक्ष बनने के बाद क्रिकेट के क्षेत्र में ढेर सारे काम हुए हैं और उनकी सराहना भी हुई है।

खेल संगठनों को नियंत्रित करने के लिए एक रेगुलेटरी अथारिटी बनाये जाने का प्रस्ताव था।
जितनी रेगुलेटरी अथारिटी बनाएंगे खेलों का उतना बेड़ा गर्क होगा। आज बीसीसीआई इतना बेहतर इसलिए कर रही है, क्योंकि उस पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। बाकी सारे संगठन सरकार की ओर से मिलने वाली ग्रांट पर निर्भर रहते हैं और उसी हिसाब से उनमें अफसरों की दखलंदाजी भी रहती है। खेल संगठनों को और स्वायत्ता मिलनी चाहिए लेकिन उनकी जवाबदेही भी तय हो। सरकारी दखल कम से कम होना चाहिए।

पदाधिकारियों का कार्यकाल तय करने की कोशिश खेल मंत्रालय ने की थी उसे संगठनों ने कामयाब नहीं होने दिया।
हर खेल संगठन का अपना संविधान है। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि खेल संगठनों में उनके संविधान के मुताबिक निष्पक्ष चुनाव हों। तभी उसमें सही लोग आएंगे।

ललित मोदी के बाहर होने के बाद आईपीएल का क्या भविष्य है?
आईपीएल की सफलता का सबसे बड़ा कारण यह था कि इसका आयोजन बीसीसीआई ने किया था। इसके साथ देश के प्रांतीय संगठनों के अलावा अंतरराष्ट्रीय संगठन जुड़े हुए हैं जिनके चलते आईपीएल सफल हुआ है।

पिछले आईपीएल आयोजन के साथ कई विवाद भी जुड़े। सुधार के लिए क्या कर रहे हैं?
आरोपों की जांच हो रही है। सरकार भी करा रही है और बीसीसीआई भी अपने स्तर पर जांच कर रहा है। मैच के बाद देर रात की पाटियों को निरस्त कर दिया गया है। आईपीएल-4 में सारा नजारा बदला हुआ मिलेगा।

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