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अब सुलह की सिलाई कर रहे हाशिम चचा

हाशिम चचा बोले तो हाजी मोहम्मद हाशिम अंसारी। नब्बे वसंत देख चुके हाशिम चाचा रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुकदमे के मुद्दई हैं। साथ ही बाबरी मस्जिद पुनर्निर्माण समिति के संयोजक भी हैं। वह ऐसे अकेले मुद्दई हैं, जो बाबरी मस्जिद की लड़ाई 1949 से लड़ रहे हैं।

हाशिम चाचा ने सिर्फ दो जमात पढ़ाई की है। किताबी ज्ञान बेशक उनमें न हो, पर दुनियादारी को अच्छे से जानते हैं। मजहब को लेकर वे कट्टरपंथी नहीं हैं। यही वजह है कि अयोध्या के विभिन्न धर्मावलंबी उन्हें प्यार से चचा बुलाते हैं।

बाबरी मस्जिद के लिए लड़ने वाले हाशिम चाचा के रिश्ते इस मुकदमे के हिन्दू पक्षकारों से बहुत अच्छे रहे। तभी तो रामजन्मभूमि आन्दोलन के पुरोधा महंत रामचन्द्र दास परमहंस और निर्मोही अखाड़े के सरपंच भास्कर दास इस मुकदमे के सिलसिले में जब लखनऊ जाते थे तो हाशिम भी उनके साथ हो लेते थे। अयोध्या से लखनऊ का रास्ता गप्पें मारते हुए कट जाता था।

उनकी माली हालत अच्छी नहीं है। सिलाई करके उन्होंने अपना जीवन बिताया है। बावजूद इसके बाबरी मस्जिद के नाम पर उन्होंने कभी किसी से न कोई आर्थिक मदद मांगी और न ली। कोई मदद देने आया तो भी विनम्रता से उसे न कर दी।

उनके एक बेटा और एक बेटी है। आंखें जवाब दे गई हैं इसलिए अब वे सिलाई नहीं करते हैं। बेटा इकबाल अंसारी टैक्सी चलाता है। बैंक से लोन लेकर एक टैम्पो भी खरीद लिया है। उसी से घर का खर्चा-पानी चलता है।

हाशिम चाचा आपातकाल में मीसा में भी बंद हो चुके हैं। 1967 में देश जब आजादी के मोहभंग से गुजर रहा था, तब हाशिम चाचा ने फैजाबाद की मया विधान सभा सीट से चुनाव लड़ा था। उनका चुनाव चिन्ह ऊंट था। तमाम कोशिशों के बाद भी वे चुनाव हार गए। 

हाशिम चौधरी चरण सिंह से प्रभावित थे और उनके साथ कुछ   समय रहे भी। बाद में राजनीति से उनका दिल टूट गया और सामाजिक कार्यो में जुट गए। अब वे थक गए हैं। चाहते हैं कि अब मामले को आपसी सुलह से निपटा लिया जाए। अब मुकदमेबाजी नहीं चाहते। उनका मानना है कि अब इस लड़ाई को आगे नहीं बढ़ाना है। अब तो अयोध्या वाले मिल बैठ कर मंदिर-मस्जिद का फैसला कर लेंगे।

हाशिम चाचा फैसला आने के दो दिन बाद से ही सुलह की कोशिशों में जुट गए। हिन्दू पक्षकारों के सामने सुलह का प्रस्ताव पेश किया और देश के साधुओं की सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत ज्ञानदास से मिलने अयोध्या की हनुमानगढ़ी में पहुंच गए। मंदिर-मस्जिद मसले को मिल बैठ कर सुलझाने और खुद मध्यस्थ बनने का प्रस्ताव रखा।

हाशिम की पहल का महंत ज्ञानदास ने स्वागत किया और उन्होंने मध्यस्थ बनना स्वीकार कर अयोध्या पर समझौते की हाशिम चाचा की पहल को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। बात सही दिशा में बढ़ रही है। डर है तो बस मंदिर-मस्जिद के नाम पर रोटी सेंकने वालों से। हाशिम चाचा अपने मकसद में कामयाब हों, देशवासियों को इसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

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