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अयोध्या प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में जाने की संभावना बरकरार

अयोध्या प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में जाने की संभावना बरकरार

अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवादित स्थान को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा तीन हिस्सों में बांटकर दो हिस्से हिन्दू पक्ष और एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिए जाने के बाद दोनों हिन्दू पक्ष और मस्जिद पक्ष के सबसे पुराने पक्षकार हाशिम अंसारी सुलह समझौते से मामले को आपसी सहमति से निपटा लेने के प्रयास में लगे हैं, जबकि मुकदमे में दो अहम पक्षकार निर्मोही अखाड़े के साथ रहे अखिल भारत हिन्दू महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड परस्पर विरोधी दावों के साथ सर्वोच्च न्यायालय में जाने की तैयारी में हैं।

अखिल भारत हिन्दू महासभा के प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तिवारी ने कहा कि सम्पूर्ण विवादित स्थल राममंदिर के निर्माण के लिए हिन्दुओं को मिलना चाहिए और यदि सुन्नी वक्फ बोर्ड अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं होता तो महासभा इस महीने के अंत तक सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल कर देगी।

उन्होंने कहा कि महासभा बार-बार कह चुकी है कि समझौता केवल एक शर्त पर हो सकता है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड विवादित स्थल से अपना दावा छोड़ दे, जिसके बदले हम उसे अन्यत्र कहीं मस्जिद निर्माण के लिए दोगुनी भूमि देने को तैयार है।

तिवारी ने कहा कि अभी तक जो भी बातचीत हुई है वह महासभा की मांग के अनुरूप किसी सकारात्मक और सार्थक निष्कर्ष की ओर पहुंचती दिखाई नहीं पड़ रही है। हमारा स्टैन्ड साफ है कि पूरी भूमि रामलला को मिलनी चाहिए और वक्फ बोर्ड को अपना दावा छोड़ देना चाहिए।

मस्जिद की तरफ से सबसे पुराने पक्षकार 90 वर्षीय हाशिम अंसारी भले ही अब इस विवाद का आपसी सहमति से समाधान निकालने के लिए प्रयासरत हो लेकिन सुन्नी वक्फ बोर्ड अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं दिखता और जफर अहमद फारूकी की अध्यक्षता में पांच अक्टूबर को हुई आपात बैठक में बोर्ड अपने दावे को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती देने का फैसला कर चुका है।

बोर्ड के अधिवक्ता जफरयाब जीलानी पहले ही स्पष्ट कर चुके है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अपनी तरफ से समझौते का कोई प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाला नहीं है और यदि दूसरे पक्ष की तरफ से कोई प्रस्ताव आता भी है तो उस पर सिर्फ तब गौर करेगा जब कि वह शरीयत के कानून के दायरे में हो। सुन्नी वक्फ बोर्ड के सूत्रों के अनुसार, बोर्ड इस महीने के आखिर अथवा अगले महीने की शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है।

बहरहाल, आम सहमति से विवाद के निपटारे में लगे पक्षकार अब भी अपने प्रयासो में लगे हैं और इस बात के प्रति आश्वस्त हैं कि आपसी सहमति के आधार पर विवाद का समाधान हो जाएगा। इस मामले में दो मुख्य पक्षकार निर्मोही अखाड़ा तथा रामलला विराजमान के प्रतिनिधियों एवं मस्जिद पक्ष के सबसे पुराने पक्षकार हाशिम अंसारी के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है और सूत्रों का दावा है कि उनके बीच आम सहमति भी बन चुकी है, और अब बात स्वीकार्य फार्मूले को लेकर है।

इस बीच, मस्जिद पक्ष के एक और पक्षकार हाजी महबूब ने हाशिम अंसारी के प्रयासों पर यह कहकर सवाल खड़ा कर दिया है कि उन्होंने आम सहमति बनाने की दिशा में कदम उठाने के पहले मुस्लिम समुदाय को भरोसे में नहीं लिया। महबूब का कहना है कि विवादित स्थल पर मस्जिद का दावा केवल अयोध्या फैजाबाद के मुसलमानों का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे मुस्लिम समुदाय का मामला है।

उन्होंने कहा कि मस्जिद की तरफ से हाशिम अंसारी अकेले पक्षकार नहीं है, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले में ऐसे बहुत से बिन्दू है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय आनी जरूरी है, इसलिए मामले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती तो दी ही जाएगी और उसके बाद जो भी निर्णय आता है, हमें मान्य होगा।

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