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गांधी जैसी उदारता की जरूरत

सन् 1999 से 2009 के बीच मुझे भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और ऐसे अन्य संगठनों की तरफ से बुरा-भला कहने वाले काफी मेल मिले। अगर मेरा लिखा हुआ कोई लेख आस्था, हिंदूवाद, हिंदुत्व, गुजरात या अयोध्या को किसी तरह से स्पर्श करता था तो सुबह नाश्ते के समय तक हमारा इनबाक्स या अखबार के अपने वेबसाइट के कमेंट्स का बाक्स मेल से भर जाता था।

इसमें उन लोगों के मेल होते थे जो किसी भी तरह से आहत हुए हों, जिन्हें कोई शिकायत हो या जो गाली-गलौज करने के आदी हों। इस तरह के मेल मई 2009 के बाद आना बंद हो गए। शायद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की दूसरी जीत ने कट्टर हिंदुत्ववादी लोगों की हवा निकाल दी थी। अब मालिकाना हक पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनका रेला फिर शुरू हो गया है।

मेल भेजने वाले इस कॉलम में सबसे पहले दिए गए हमारे सुझाव से नाराज हैं। बाद में टेलीविजन पर भी मैंने यही सुझाव दिया था कि विवादित संपत्ति का इस्तेमाल मंदिर, मस्जिद या दोनों बनाने के लिए नहीं करना चाहिए, बल्कि वहां अस्पताल या ऐसा पार्क हो चाहिए जो सभी धर्मो के लोगों और वास्तविक मानवीय मकसद के लिए उपयोगी हो। हमारे प्रस्ताव के बारे में आई कुछ प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं-

‘अगर उस स्थल पर राम मंदिर बनाया गया तो यकीन कीजिए कि हिंदुओं की संस्कृति का पुनरोद्भव होगा जो हर तरह से भारतीयों के लिए गौरव का विषय है।’

‘विधर्मी राम के बारे में क्या जानें? या पश्चिमी विचारों से भ्रष्ट हो चुकी सोच के अंग्रेजी दां लोग, अंग्रेजियत के उन्मादी!’

‘धर्मनिरपेक्षता की सोच को साबित करने के लिए भारतीय सभ्यता की आत्मा, जो कि राम ही हैं, की हत्या के अलावा और भी तरीके हैं! तुम नीच आदमी!’

‘यह व्यक्ति क्या है? क्या यह खेल लेखक है या इतिहासकार। इसका इतिहास का ज्ञान इतना अश्लील है, जितना तीसरे दर्जे के उपन्यास। देखिए, रामचंद्र गुहा नाम का यह आदमी भगवान राम को अपमानित करने पर आमादा है। तुम्हारे माता-पिता मूर्ख थे, जिन्होंने तुम्हारा नाम भगवान राम पर रखा है।’

‘तुम्हारी राय की परवाह कौन करता है? तुम ऐसे बात कर रहे हो, जैसे तुम अरबों हिंदुओं के प्रतिनिधि हो! तुम्हारे जैसे कम अक्ल के गुलाम लोग अपने अंधेरे घर के एक कोने में बैठकर दूसरों को उपदेश देते हैं। मैं शिक्षित, युवा और बहुपठित (तीन मास्टर डिग्रीधारी) हूं और पश्चिम में रहता हूं। फिर भी मुझे अपने देश और उसकी संस्कृति, अपने हिंदू धर्म, उसके नायक, ईश्वर और उनके दर्शन पर गर्व है। मैं उसका महत्व जानता हूं। मैं जानता हूं कि भगवान राम का हिंदुओं के लिए क्या महत्व है। वे राष्ट्रीय नायक हैं। उनके जन्मस्थान को नश्वर मनुष्य से प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। तुम वहां एक पार्क चाहते हो? अगर तुम चाहते हो तो उसे अपने कब्रिस्तान पर बनवा देना। तुम अपने बीमार विचारों को दूसरों पर थोपने वाले कौन होते हो?’

इन ई-मेल से उस बहुसंख्यक जनता की विश्वदृष्टि जाहिर होती है, जहां भारत मूल रूप से हिंदू राष्ट्र है। उसकी नैतिकता, मूल्य, आदर्श और आकांक्षाएं हिंदू बहुसंख्यक के मूल्यों, आदर्शो और आकांक्षाओं से निर्धारित होती हैं। निश्चित तौर पर यहां एक तरह का अंतर्विरोध है कि हर चुनाव के बाद यह जाहिर होता है कि बहुसंख्यक के इस विचार को हिंदुओं का अल्पसंख्यक तबका ही धारण करता है।

भारतीय जनता पार्टी जब चरम पर थी तब भी उसका वोट प्रतिशत 23 प्रतिशत से ज्यादा नहीं पहुंचा था। इसके बावजूद वह सारे हिंदुओं के लिए बोलने का दावा करती है और हिंदू हितों और भारतीय राष्ट्र के बारे में जो समीकरण बनाती है, उसे पूरे देश के लिए मान बैठती है।

साइबर स्पेस के नए बहुसंख्यकवाद को इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक महत्वपूर्ण अनदेखी से बढ़ावा मिला है। यह भूल थी बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर जजों की चुप्पी। वह विध्वंस जो कि अपने में एक आपराधिक काम था और जिसके कारण दंगे हुए और हजारों लोगों की जानें गईं।

जैसा कि सम्माननीय न्यायविद टीएन अंध्यारूजिना ने कहा कि उस जगह पर चार सौ साल तक खड़ी रहने वाली मस्जिद के विध्वंस की अनदेखी कर हाई कोर्ट ने एक तरह से उस पक्षकार को अराजकता के काम का फायदा दे दिया, जो खुद उसमें शामिल था या जैसा कि कुछ और कानूनी विश्लेषकों ने ज्यादा अच्छी तरह से कहा है कि इस फैसले ने 1992 के उत्पातियों को 2010 के विजेता के तौर पर उभरने का मौका दिया है।

संयोग से अयोध्या फैसले से पहले मैं महात्मा गांधी के वांग्मय के आरंभिक हिस्से पढ़ रहा था। उस दिन मैं नौवें खंड को देख रहा था। फैसला आने के बाद मैंने उसे किनारे रख दिया, लेकिन थोड़ी देर बात मुझे एक व्यक्ति का एक ऐसा बयान मिला जिसे मैं बिना किसी विवाद के एक महान भारतीय और एक महान हिंदू  के विचार के तौर पर उद्धृत कर सकता हूं।

जून 1909 में एक मुसलमान दोस्त हबीब मोतान ने गांधी से पूछा कि दक्षिण अफ्रीका के भारतीय समुदाय में किस तरह से हिंदू-मुस्लिम एकता हासिल की जा सकती है और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह भारत में कैसे हासिल की जा सकती है। उस पर गांधी का जवाब इस तरह है-

‘मैं हिंदू और मुसलमानों में कोई फर्क नहीं करता। मेरे लिए दोनों भारत माता की संतानें हैं। मेरा निजी विचार यह है कि चूंकि हिंदू बहुसंख्यक हैं और जैसा कि वे मानते हैं, और हैं भी, कि वे शैक्षिक तौर पर बेहतर स्थिति में हैं, तो उन्हें अपने मुसलमान भाइयों की वे अधिकतम बातें खुशी से मान लेनी चाहिएं, जितनी वे मान सकते हैं। एक सत्याग्रही के तौर पर मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि हिंदुओं को मुसलमानों को वह दे देना चाहिए जो वे मांग रहे हैं। उन्हें खुशी से वे बलिदान कर देने चाहिए जो इसमें जरूरी है। एकता इसी तरह की उदारता से हासिल की जा सकती है। अगर हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से बर्ताव के दौरान उसी सिद्धांत का पालन करते हैं, जो सगे भाई करते हैं तो अटूट सद्भाव होगा और तभी भारत की तरक्की हो सकती है।’

लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

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