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बापू मुझे आश्रम में घुसने नहीं देते, लेकिन..

बापू की जयंती आई और चली गई। हमने उसे वैसे ही मनाया, जैसे मनाते आए हैं। उनकी हत्या के बाद इसी तरह मनाते हम देखते चले आ रहे हैं। हमारे नेता राजघाट में उनकी समाधि पर जाते हैं। फूल-माला चढ़ाते हैं। थोड़ी देर के लिए बापू के पसंदीदा भजनों को सुनते हैं। फिर अपने घर चले जाते हैं।

यह एक किस्म की रस्म अदायगी हो गई है। यह उनकी जयंती और पुण्यतिथि दोनों पर ही होता है। हम में बहुत थोड़े से लोग ही इस सवाल पर सोचते हैं कि क्या हम उनके बताए रास्ते पर चल रहे हैं? या कम से कम उस पर चलने की कोशिश ही कर रहे हैं।

मैं खुद को गांधीवादी कहता हूं। हालांकि मुझे कोई शक नहीं है कि अगर मैं उनके आश्रम में जाता, तो वह मुझे घुसने ही नहीं देते। वह भगवान में भरोसा करते थे। मैं नहीं करता। वह कट्टर शाकाहारी थे। और लंदन में भी बैरिस्टरी करते-करते शाकाहार का प्रचार कर रहे थे। मैं तो बिना मांस-मछली के नहीं रह सकता। मेरा मानना है कि शाकाहार तो कुदरत के खिलाफ है। चंद घास-फूस खाने वाले जानवरों के अलावा सभी जानवर, पंछी वगैरह एक-दूसरे को खाकर ही जिंदा रहते हैं।

बापू ने शराबबंदी लागू करने की कोशिश की थी। उसे संविधान में भी शामिल करा दिया। वह बुरी तरह फ्लॉप हुआ। किसी भी देश में शराबबंदी नहीं चल पाई। मैं मानता हूं कि थोड़ा-थोड़ा पीना सेहत के लिए अच्छा है। हां, धुत्त हो जाने के मैं खिलाफ हूं। बापू से मुझे कुछ और शिकायतें हैं। उन्होंने अपनी बीवी कस्तूरबा के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया। अपने बच्चों को ठीक से नहीं देखा। लेकिन फिर भी मैं उन्हें क्यों चाहता हूं? अपने को गांधीवादी क्यों कहता हूं?

दरअसल, उसके पीछे तीन वजह हैं। बापू कभी झूठ नहीं बोलते थे। बापू की पूरी कोशिश थी कि किसी को ठेस न पहुंचे। बापू अपने सिद्धांतों के लिए अपनी जान भी देने को तैयार थे। वह तो अपने प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए जो पीर पराई जाणे रे।’ की खुद मिसाल थे। मैं उन्हें प्रभु का बंदा मानता हूं, जो दूसरे का दुख-दर्द समझता था।

बीजी वर्गीज
अगर मुझसे बेहद काबिल और निडर हिंदुस्तानी पत्रकारों के बारे में पूछा जाए, तो मैं बेहिचक पहले तीन में बीजी वर्गीज का नाम लूंगा। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के बाद वह ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में चले आए। फिर ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के भी संपादक रहे। उन्हें मैगासेसे अवार्ड भी मिला। वह फिलहाल 80 से ऊपर हैं और कई अखबारों के लिए लिख रहे हैं।

आप किसी से भी उनके बारे में पूछिए, हर कोई उन्हें बेहतर इनसान कहेगा। कुछ-कुछ बोर करने वाला। हाल ही में उनकी आपबीती आई है, ‘फर्स्ट ड्राफ्ट : विटनेस टू द मेकिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया।’ उसमें सचमुच आज के हिंदुस्तान को बनते देखा जा सकता है। उन्होंने जिसके बारे में लिखा है, खुल कर लिखा है। वह चाहे राष्ट्रपतियों के बारे में हो या प्रधानमंत्रियों के बारे में। चाहे उद्योगपतियों पर हो या आम आदमी के बारे में।

माफी मांगता हूं
मैं जैसे-जैसे और बूढ़ा हो रहा हूं, मेरे हाथ कांपने लगे हैं। आंखें जवाब देने लगी हैं। मैं अपनी ही लिखावट पहचान नहीं पाता हूं। मेरे पेन फ्रेंड शिकायत करते हैं कि वे मेरे लिखे को लेंस से भी नहीं देख पाते। उसका सबसे बड़ा शिकार मेरे सचिव और स्टेनो टाइपिस्ट होते हैं।

कुछ वक्त पहले उसका असर दिखा। मैं मजहबी कट्टरपन पर लिख रहा था। एक पागल पास्टर ने कुरान जलाने का ऐलान कर दिया था। उसके कहते ही इस्लामी दुनिया गुस्से से पागल हो गई थी। पंजाब के मलेरकोटला में एक चर्च जला दी गई थी। मेरे कॉलम में उसकी जगह मक्का चला गया। हर कोई जानता है कि मक्का में कभी चर्च थी ही नहीं। मक्का और मदीना में गैर-मुस्लिम जा ही नहीं सकते। मैंने संपादक से अपना विरोध जताया। उन्होंने मेरी कॉपी भेज दी। उसमें ही गड़बड़ थी, लेकिन अखबार में कोई उस गलती को नहीं पकड़ सका। मैं उसके लिए अपने पाठकों से माफी मांगता हूं।

उससे भी पहले मुझसे डॉ. जाकिर नायक की जगह जाहिर नायक हो गया था। कुछ अखबार ही उसे ठीक कर पाए थे। किसी ने गुस्से में मुझे लिखा कि उस शख्स से क्या उम्मीद की जाए, जो नाम तक ठीक से नहीं लिख सकता।

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