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झेलगांव की बारात

झेलगांव में बारात आई थी। बाराती शहराती थे। जर्जर प्राइमरी पाठशाला के कमरों की सफाई कराकर जैसे-तैसे जनवासा बना था। दीवारों में सीलन थी। छत से चूना टपक रहा था। दूल्हे का फूफा हत्थे से उखड़ गया-कहां हैं लड़की का बाप? हमको भरोसा दिलाया था, शहर की शादियों जैसा इंतजाम रहेगा। यहां न तो साफ-सुथरे गद्दे हैं, न तकिए। खटिया खड़ी है। बिस्तरा गोल है। खिड़की से शीशे तक गायब हैं। एक वाशबेसिन है भी, तो उसमें पान की पीक सूख रही है।

लड़की का बाप प्रकट हुआ। बोला-शादी-बारात में तो यह सब चलता ही है। वैसे हमने अपने लिहाज से बेहतर इंतजाम कर रखा है। यही है आपका बेहतर इंतजाम! दूल्हे का जीजा दहाड़ता हुआ बोला। ऐसा ही रहा तो कल को इस झेलगांव में कोई शादी करने नहीं आएगा।

लड़की का बाप बोला- वो क्या है कि इस गांव में 1982 के बाद से कोई बड़ी शादी नहीं हुई। इधर टेंट-कैटरिंग वाले भी चालू टाइप मिलते हैं। आप सबकी आवभगत में गुस्ताखी हुई है, मैं इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेता हूं। आप पहले राजनीति में रहे हैं क्या, जो नैतिक जिम्मेदारी ले रहे हैं! दूल्हे के मामा ने मुस्कुराते हुए कहा- बस, आप बदइंतजामी की जिम्मेदारी मान लें, उतना ही काफी है।

इतने में ही चार-छ: युवा बाराती अपनी अटैचियां उठाकर वापस जाने लग गए। एक-दो ने गालियां भी बक दीं। लड़की के ताऊ ने सुन लीं। वह गरज उठा- हम भी हैसियत में कम नहीं हैं। हमें नीचा दिखाया तो इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

अचानक जनवासे में एक कुत्ता घुस आया। दुल्हन का बाप लाठी लेकर उसके पीछे भागा। तभी बाजे वालों ने बैंड बजा दिया। बाराती नाचने लग गए। दूल्हा हाई जंप मारता हुआ लंगड़ी घोड़ी पर बैठ गया। घोड़ी झेलगांव की और दौड़ने लगी।   

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