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‘आधार’ अच्छा है पर रामबाण नहीं

यह पखवाड़ा कई चौंकाने वाली घटनाओं से भरा रहा है। श्रीराम जन्मभूमि मसले पर आए न्यायिक फैसले ने आपसी सहमति से इस विवाद का हल निकालने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। हालांकि संबंधित पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय में जाने का विकल्प अभी छोड़ा नहीं है, लेकिन तमाम आशंकाओं के विपरीत ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों ने इस फैसले पर अपनी जिम्मेदारी भरी प्रतिक्रिया दी। साफ है, ‘नया भारत’ विकास और बेहतर जिंदगी पर निगाह टिकाए आगे बढ़ चला है। ठीक इसी तरह, सभी नकारात्मक आशंकाओं के उलट कॉमनवेल्थ गेम्स का भी शानदार आगाज हुआ। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में जो गड़बड़ियां हुईं, उन्हें नजर अंदाज कर दिया जाए, बल्कि मेरे कहने का आशय यह है कि जब कभी देश के गौरव का सवाल सामने आता है, तब पूरा देश असंभव को संभव करने के लिए एकजुट खड़ा हो उठता है।

इन दो घटनाओं के साथ ही इस पखवाड़े एक और घटना घटी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के सुदूर आदिवासी इलाके में अनूठी पहचान योजना ‘आधार’ की शुरुआत की। फरवरी 2009 में केंद्र सरकार ने ‘यूनिक नेशनल आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ का गठन किया था। इस अथॉरिटी द्वारा देश के सभी नागरिकों को 12 अंकों का एक अनूठा नंबर दिया जाएगा। इस नंबर में अंगूठे के निशान व जैवसांख्यिकी (बायोमेट्रिक्स) विवरणों पर आधारित प्रत्येक व्यक्ति की पहचान से संबंधित सूचनाएं संरक्षित की जा सकेंगी। इसके बाद किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी पहचान छिपाना नामुमकिन हो जाएगा। उम्मीद जताई जा रही है कि इस पहचान नंबर से सरकारी सेवाओं का प्रभावी तरीके से निष्पादन संभव हो सकेगा, बल्कि गरीबी-उन्मूलन से संबंधित सरकार की योजनाओं एवं सबसिडी तय करने में भी यह काफी मददगार होगा।
‘आधार’ से जुड़े विचार नए नहीं हैं। अमेरिका में काफी समय पहले सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों से संबंधित लोगों को ‘सामाजिक सुरक्षा नंबर’ देने की सोच ने आकार लिया था और वहां पचास वर्षो से भी अधिक समय से ऐसे पहचान पत्र का इस्तेमाल हो रहा है। हाल ही में वहां पर सीनेट के कुछ सदस्यों ने यह प्रस्ताव रखा कि देश में बायोमेट्रिक सामाजिक सुरक्षा कार्ड शुरू किया जाए। इस प्रस्ताव को अमेरिका के नागरिक समूहों एवं निजता संबंधी वकीलों के जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा। आज से कुछ समय पहले ब्रिटेन सरकार ने भी बायोमेट्रिक राष्ट्रीय पहचान योजना शुरू की थी, लेकिन ब्रिटेन की नई सरकार इस योजना का खत्म करने, बल्कि एकत्रित बायोमेट्रिक आंकड़ों को ध्वस्त करने की सोच रही है। वहां कहा जा रहा है कि वह पूरी कवायद निर्थक, नौकरशाही संबंधी और निजता में हस्तेक्षप वाली थी।

भारत में ‘आधार’ को सरकारी सेवाओं के समस्त रोगों की रामबाण दवा के रूप में पेश किया जा रहा है। अपेक्षा की जा रही है कि यह पहचान पत्र शिक्षा के अधिकार के तहत दाखिले की निगरानी करेगा। यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दरारों को बंद कर देगा और वित्तीय समायोजन, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून तथा गरीबी-उन्मूलन से जुड़ी अन्य योजनाओं को लागू कराने में भी अचूक साबित होगा। फर्जी लाभार्थियों को छांट सकने वाली अनूठी पहचान संख्या की अवधारणा यकीनन आकर्षक है, लेकिन चिंता की बात यह है कि यह नंबर गलत पहचान या योजनाओं के क्रियान्वयन के रिसाव की समस्या को हल करने में कितना कारगर होगा। एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें सरकारी अनुदान संबंधी ज्यादातर लाभ परिवार केंद्रित हैं, बल्कि बड़ा परिवार एक नेमत-सा हो, उसमें निजी सूचनाओं पर आधारित ‘आधार’ कैसे लाभप्रद हो सकता है?

वर्तमान जन वितरण प्रणाली के साथ एक बड़ी समस्या यह है कि इसका लाभ उठाने वालों की पहचान सही नहीं है। गरीब परिवार इससे वंचित हैं, जबकि आर्थिक रूप से सक्षम इसका लाभ लूट रहे हैं। तो क्या अनूठा पहचान पत्र इस फर्जीवाड़े को समाप्त करने में सक्षम होगा? नहीं, क्योंकि यह सिर्फ उन्हीं लोगों की जांच करेगा, जो इसका लाभ पहले से उठा रहे हैं। वह इस बात की पड़ताल तो कर ही नहीं पाएगा कि क्या लाभार्थी सचमुच गरीबी रेखा के नीचे है।

आधार सुविधा के पैरोकारों की दलील है कि गरीबों के सामाजिक कल्याण के लिए चलाई जाने वाली योजनाएं पहचान संबंधी गड़बड़ियों के कारण जरूरतमदों तक पहुंच नहीं पातीं या फिर उन्हें इनके लाभ से वंचित कर दिया जाता है। अब आधार पहचान पत्र मिल जाने के बाद इस तरह की समस्याएं हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी। लेकिन सामाजशास्त्री इस तर्क से इत्तफाक नहीं रखते। उनका मानना है कि यह सामाजिक कल्याण से संबंधित योजनाओं की विफलता का अति-सरलीकरण है। उदाहरण के लिए, सामाजिक कल्याण के ज्यादातर कार्यक्रमों में कई तरह की एजेंसियां शामिल होती हैं। ऐसे में एक व्यक्ति की पहचान स्थापित कर देने भर से आवश्यक नहीं कि इन कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार और चोरी खत्म हो जाएगी। इस पहचान पत्र को लेकर चिंता की एक और वजह है। बायोमेट्रिक डाटा में शामिल की जाने वाली सूचनाएं, अंगूठे के निशान, आंखों के स्कैन और निजी विवरण लोगों की निजता के साथ समझौता हो सकता है, क्योंकि इनके दुरुपयोग की आशंकाएं हमेशा बनी रहेंगी। इस योजना की आलोचना इसलिए की जा रही है कि हमारे मुल्क में सख्त डाटा संरक्षण कानून नहीं हैं, जबकि पश्चिमी देशों में इससे संबंधित कड़े कानून हैं। ऐसे में, इसमें तीसरी पार्टी को चोरी-छिपे डाटा बेचे जाने की आशंका बनी हुई है। यह भी कहा जा रहा है कि अपनी निजता की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। भले ही उसकी निजता में यह अवैधानिक दखलंदाजी राज्य की ही क्यों न हो। संविधान के अनुच्छेद-21, हिंदू विवाह अधिनियम, कॉपीराइट कानून, बाल-अपराध कानून-2000 तथा अपराध प्रक्रिया संहिता में किसी न किसी रूप में निजी सूचनाओं को उजागर करने पर रोक लगाई गई है। ऐसे में, आधार पचहान पत्र के पूरी तरह से अस्तित्व में आने से पहले ही गोपनीयता संबंधी कानूनों को ठीक करना होगा।

इसमें कोई दोराय नहीं कि देश के सभी नागरिकों को पहचान पत्र दिया जाना एक नया व रचनात्मक कदम है और सामाजिक सशक्तीकरण की दिशा में यह महत्वपूर्ण पहल भी है। लेकिन अन्य व्यवस्थाओं की तरह ही यह व्यवस्था भी उतनी ही अच्छी है, जितनी हम इसे बना पाते हैं। पहचान नंबर अपने आप में तटस्थ हैं, पर उनका इस्तेमाल हम किस रूप में कर पाते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा। यह कोई रामबाण नहीं है, अलबत्ता यह हमारा नीतिगत हथियार बन सकता है। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती इसके उद्देश्यपूर्ण और प्रभावशाली इस्तेमाल की ही है।
लेखक राज्यसभा सदस्य हैं और केंद्रीय सचिव रह चुके हैं

 

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