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सब सूना-सूना है

जी नहीं, यह सूनी-सूनी आंखों, सूनी-सूनी रातों या फिर सूनी-सूनी राहों टाइप कोई गम का गीत नहीं है। कल जो भरा-भरा था, खचाखच था, वह भी अब सूना-सूना है। कॉमनवेल्थ खेलों की ओपनिंग सेरेमनी जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में हुई। बताते हैं कि बड़ी धांसू रही। दर्शकों की भी कमी नहीं रही। कहते हैं कि प्रवेश करते हुए कई किलोमीटर लंबी लाइन लग गई। उस दिन स्टेडियम में तो खूब रौनक रही, पर शहर सूना-सूना था।

फिर ओपनिंग सेरेमनी के बाद सारे स्टेडियम सूने-सूने से नजर आए। अब कलमाडी साहब की जुबान तो चाहे कितनी ही फिसलती रहे और माल देखकर नेताओं, अफसरों और ठेकेदारों का ईमान भी चाहे कितना ही फिसल ले, पर दर्शक नहीं फिसलने चाहिए। उनके बिना मजा क्या है? पर वे भी फिसल गए। मेडल-वेडल तो हमारे खिलाड़ी भी इस बार खूब ले रहे हैं, लेकिन स्टेडियम सूने-सूने हैं। यह देखकर बताते हैं कि फेनेल और हूपर नाराज हो गए। कलमाडी से बोले- जाओ दर्शक लाओ। सुना है होटल, रेस्तरां और गेस्ट हाऊस भी सूने-सूने से हैं। विदेशी खिलाड़ी तो आए, पर अतिथि नहीं आए। आने की बात तो दूर, यहां तो दिल्लीवाले ही बाहर चले गए। बच्चों की छुट्टियां हैं, दफ्तर पहुंचने का कोई ठिकाना नहीं, इसलिए चले गए। अब तो बताते हैं कि बाजार भी सूने-सूने से पड़े हैं। इसलिए सूने पड़े हैं कि विदेशी तो आए नहीं और घर के लोग बाहर चले गए।
हालत यह है कि सिनेमा हॉल तक सूने पड़े हैं। मनोरंजन का बाजार सूना है। खेलों के मौके पर आयोजित किए जा रहे सांस्कृतिक समारोहों में भी यही सूनापन छाया हुआ है। जश्न में सूनापन हो तो जश्न ही क्या हुआ? पर इतना सूनापन ठीक नहीं है जी। रौनक जरूरी है। पर वह आए कहां से और कैसे?
सहीराम

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