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कर्नाटक में फिर विद्रोह

अयोध्या विवाद में आए फैसले से खुशी मना रही भारतीय जनता पार्टी को कर्नाटक में हुए राजनीतिक विद्रोह ने करारा झटका दिया है। हालांकि मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने विश्वास जताया है कि वे 12 अक्तूबर से पहले ही विधानसभा में विश्वास हासिल कर लेंगे और उनकी सरकार बनी रहेगी, लेकिन दक्षिण में पहली सरकार बनाए रखने का भाजपा का विश्वास हिल गया लगता है। येदियुरप्पा आरोप लगा रहे हैं कि यह उनकी सरकार को अस्थिर करने की कांग्रेस और जनता दल (एस) की साजिश है और इसके लिए एक विधायक को बीस करोड़ रुपये तक दिए जा रहे हैं। बहुत संभव है कि मुख्यमंत्री यह आरोप भ्रष्टाचार के उन आरोपों को बेअसर करने के लिए लगा रहे हैं, जिन्हें लगाकर भाजपा के 14 और पांच निर्दलीय विधायकों ने विद्रोह किया है। उन विधायकों का कहना है कि यह सरकार भ्रष्ट और निकम्मी है और इसे रहने का कोई हक नहीं है। बगावत करने वाले विधायक भ्रष्टाचार के आरोप तो लगा रहे हैं, लेकिन जिस तरह से उन्हें मनाने के लिए अवैध खनन के आरोपों से घिरे पर्यटन मंत्री जनार्दन रेड्डी चेन्नई गए, उससे लगता है कि यह मामला भ्रष्टाचार विरोध से ज्यादा सत्ता संघर्ष और उसमें हिस्सेदारी का है। भाजपा के बागी विधायकों की नाराजगी की गंभीर वजह यही जान पड़ती है कि कांग्रेस से भाजपा में आए विधायकों को तो अच्छे पद दिए जा रहे हैं और भाजपा के वफादार लोगों को दरकिनार किया जा रहा है।

कर्नाटक राज्य पिछले दिनों जिस कारण से सर्वाधिक चर्चा में रहा है, वह है रेड्डी बंधुओं की तरफ से बेल्लारी और आसपास के इलाकों में अवैध खनन। उनकी पकड़ बंगलुरु, हैदराबाद से लेकर दिल्ली तक इतनी जबरदस्त बताई जाती है कि येदियुरप्पा सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई का साहस नहीं दिखा सकती। उल्टे वह उनका पक्ष लेती नजर आती है। इसी मामले पर विरोध करते हुए कर्नाटक के लोकायुक्त ने इस्तीफा भी दे दिया था, जिन्हें बाद में पार्टी के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी के हस्तक्षेप के बाद मनाया गया।

कर्नाटक में कांग्रेस के प्रमुख नेता सिद्धरमैया ने बेल्लारी के अवैध खनन को मुद्दा बनाकर पदयात्रा और विशाल सभा भी की थी। इसके बावजूद कादुर और गुलबर्गा के उपचुनावों में हुई कांग्रेस की हार ने साबित किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन की रणनीति ज्यादा कामयाब नहीं हो रही है। येदियुरप्पा की अस्थिर होती सरकार ने जनता दल(एस) के नेता एचडी कुमारस्वामी और उपचुनावों में हार की जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस पार्टी के इस्तीफा देने वाले नेताओं को एक बार फिर सक्रिय होने का मौका दिया है। इस सक्रियता के बावजूद विधानसभा की मौजूदा संरचना में किसी मजबूत वैकल्पिक सरकार के उभरने की संभावना कम ही दिखती है। एचडी कुमारस्वामी एक बार कांग्रेस को झटका देकर भाजपा के साथ सरकार बना चुके हैं। वे फिर ऐसे ही किसी अवसरवादी गठजोड़ की फिराक में हैं। उधर कांग्रेस अगर सरकार बनाने की पहल करना चाहे तो उसे विश्वसनीय बहुमत मिलना आसान नहीं दिखता। हो सकता है येदियुरप्पा सरकार मौजूदा संकट को ङोल ले जाए और कुछ दिन सरकार बचा भी ले जाए। महज ढाई साल में वह जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर कर लड़खड़ा रही है, उससे लगता है कि वह पांच साल नहीं पूरे कर पाएगी। ऐसे में कांग्रेस के लिए मजबूत विकल्प के तौर पर उभरने की संभावना बनी रहती है।

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