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सामने हैं गांधी, देखिए तो सही

कौन कहता है कि गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं? यह हमारी निगाहों का दोष है कि हम उन्हें देख नहीं पा रहे। वरना अयोध्या विवाद पर अदालती फैसले के बाद हर गली-हर चौराहे पर हमें गांधीजी दिख रहे होते। आखिर हाशिम अंसारी जो आज कह-कर रहे हैं, वह गांधीजी का ही तो काम है। ऐसे ही लोगों को शांति पुरस्कार दिया जाना चाहिए। राष्ट्रीय एकता के सच्चे प्रतिनिधि वही हैं। भारत के मुस्लिम और हिंदू भाइयों ने आपसी मोहब्बत की ऐसी मिसालें दो-चार और रचीं, तो वह दिन दूर नहीं कि दुनिया के लोग गांधी के वतन की मिट्टी अपने सिर-माथे पर मलने लगेंगे।
कुलदीप गोपाल,  kuldipg99@gmail.com

एक अनोखी पहल
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पदस्थापित भारतीय डाक सेवा अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने एक अद्भुत कार्य किया है।  उन्होंने दुनिया भर की महान हस्तियों के बारे में जानकारी जुटाई है, जो किसी न किसी रूप में डाक विभाग से जुड़े रहे। डाक विभाग ने इन प्रसिद्ध विभूतियों को पल्लवित-पुष्पित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन पोस्टमैन थे, तो भारत में पदस्थ वायसराय लॉर्ड रीडिंग डाक वाहक रह चुके थे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे, तो वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार दीनबंधु मित्र पोस्टमास्टर थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरंभ में डाक-तार विभाग में काम किया था, तो महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी भी डाक विभाग से जुड़े थे। डाक विभाग से जुड़ी विभूतियों के बारे में जानकारी एक जगह संजोने का प्रयास सराहनीय है। इससे न सिर्फ विभाग के गौरवशाली अतीत का पता चलता है, बल्कि नई पीढ़ी भी इससे प्रेरणा ग्रहण कर सकती है।
धर्मेद्र कुमार, नंगली डेरी, नजफगढ, नई दिल्ली


कॉमनवेल्थ की चकाचौंध
कॉमनवेल्थ गेम्स की धमाकेदार शुरुआत में चालीस करोड़ रुपये के गुब्बारे से चमक-दमक वाले जो करतब दिखाए गए, उन्होंने समस्त विश्व को भारतीय कौशल का कायल बना दिया। बेशक देश की बड़ी धनराशि इस आयोजन पर खर्च हुई है, किंतु विश्व भर का मीडिया भारत की शान में कुछ लिखे-कहे बिना नहीं रह सका। कॉमनवेल्थ गेम्स में सुरक्षा की अचूक व्यवस्था से भी देशी-विदेशी मेहमानों के मुंह पर बेफिक्री की जो मधुर मुस्कान झलक रही है, उससे मेजबान दिल्ली का मस्तक समूचे विश्व में ऊंचा हुआ है। राष्ट्र के प्रबुद्ध वास्तुकारों, इंजीनियरों, श्रमिकों एवं विद्युत तकनीशियनों के अथक परिश्रम से तैयार खेल गांव में दिख रही छोटी-मोटी कमियां अब पाश्र्व में चली गई हैं। और अब तो हमारे देश के खिलाड़ियों ने पदकों की झड़ी लगाकर इस गौरव को चार चांद लगा दिया है। हमें नाज है अपने खिलाड़ियों पर, उन सभी लोगों पर, जिन्होंने तमाम आलोचनाओं के बीच अपना धैर्य और संयम नहीं खोया।
युगल किशोर शर्मा
खाम्बी, फरीदाबाद

स्वीकार किया गुनाह
मुशर्रफ साहब
जिन बच्चों को भारत के खिलाफ
आपने आतंकी बनाया,
आज वही बाप बनकर
आपके आगे आ गए,
जो भंवर भारत के लिए तैयार किया,
उसी में खुद गोता खा गए?
भारत तो अब भी खुशहाल है,
आप ही दर-बदर, बेहाल हैं
इतना होने पर भी समझे नहीं,
इंसान हो या क्या हो़?
सतीश चोपड़ा

जरूरी हैं चुनाव सुधार
बिहार की पूर्व मुख्मंत्री राबड़ी देवी दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ेंगी। यह राज्य के करदाताओं के परिश्रम की कमाई का अपव्यय है। सांविधानिक व्यवस्थाओं के तहत जब एक व्यक्ति एक साथ दो निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, तो फिर उसे दो जगहों से चुनाव ही क्यों लड़ना चाहिए? एक वर्तमान विधायक या सांसद को दूसरे सदन का चुनाव लड़ने से पहले इस्तीफा देने को बाध्य किया जाना चाहिए। किसी भी सदन के सदस्य के मंत्री बनते ही उसकी सदस्यता खत्म कर दी जानी चाहिए, ताकि वह निष्पक्ष रूप से जिम्मेदारी निभा सके और जहां से वह जीतकर आया है, उस क्षेत्र को नया प्रतिनिधि मिल सके। इसलिए अब वक्त आ गया है कि चुनाव सुधार की दिशा में ठोस पहल की जाए।
मधु अग्रवाल

यह कैसा अधिकार
सरकार सभी को शिक्षा का अधिकार देना चाहती है, किंतु राजधानी के अनेक सरकारी विद्यालयों में दसवीं के छात्रों को बोर्ड परीक्षा का अधिकार नहीं है, जबकि प्राइवेट स्कूल का शायद ही दसवीं का कोई छात्र हो, जो बोर्ड की परीक्षा नहीं दे रहा हो। इन सरकारी विद्यालयों के छात्रों से विद्यालयों में जबरन लिखवाया जा रहा है कि वे दसवीं की बोर्ड की परीक्षा नहीं देना चाहते। छात्र खुद को ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं। आखिर यह कैसा शिक्षा का अधिकार है?
हैप्पी बालानी

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