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दिव्य शक्तियों को जागृत करने का पर्व नवरात्र

आज से नवरात्र का पर्व शुरू हो रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में यह अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। दुर्गा के इन नौ स्वरूपों की आराधना इन नौ दिनों में जो भक्त करेंगे, वह अपने जीवन में देवी की परमकृपा को प्राप्त होंगे। इस परमशक्ति के साथ अपने मन को जोड़ने का अवसर है- नवरात्रि। हम यहां अपने पाठकों के लिए नवरात्र पर एक पूर्ण वृत्तांत प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें इस पर्व के आध्यात्मिक महत्व से लेकर पूजा-विधान तक समेटा गया है।

जब पूरे विश्व के प्रमुख धर्मों में परमात्मा को एक पिता, एक पुरुष की तरह पूजा गया तो वहीं भारत ही एक ऐसा अद्वितीय और अलौकिक देश था, जहां उस परब्रह्मा को एक स्त्री-शक्ति के रूप में, एक माता के रूप में भी स्वीकार किया गया। हालांकि स्त्रैण और पुरुषैण, यह दोनों शक्ति के ही स्वरूप होते हैं, परन्तु जैसे माता और पिता के संयोग से संतान उत्पन्न होती है, उसी प्रकार शक्ति के स्वरूप का आधार शिव और शिव की कार्यशक्ति को ही हम देवी शक्ति कहते हैं।
हम यूं भी कह सकते हैं कि प्रकृति स्त्रैण है और परब्रह्मा परमात्मा पुरुष है। प्रकृति और पुरुष के समागम से ही यह सारे संसार का बनना, चलना और संहार होता है।
नवरात्रि के इन नौ दिवसों में आध्यात्मिक प्रवृति के समस्त हिंदू दुर्गा के नौ स्वरूपों का पूजन करते हैं। प्रमुखत: शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री ये देवी के नौ स्वरूप हैं।
इन नौ स्वरूपों का साधारणत: जो रूप-स्वरूप स्वीकार किया जाता है, पहले हम थोड़ा उस पर दृष्टि डालते हैं। उसके तदुपरांत इनके आध्यात्मिक और मानवीय अंगों को भी समझने का प्रयास करेंगे।
एक बात जो विशेष रूप से समझने की है, वह यह कि देवी का जो स्वरूप वर्णित किया जाता है, विशेषत: जैसे वह शेर की सवारी करती है, शेर की सवारी का अर्थ है- शौर्य, वीरता और साहस रखने वालों को ही देवी का यह आध्यात्मिक स्वरूप प्राप्त होता है। साधना करना बहुत शौर्य का कार्य है। जब मानव मन, देह, इंद्रियां और विषय-भोगों में फंसा हुआ हो और वासना में अंधा होकर इस असत्य संसार को ही सत्य जान रहा हो, तो ऐसे में देवी की महान कृपा अगर किसी पर हो और उसके अंत:करण में विशेष उत्साह और पौरुष जगे, तभी वह अपने आपको समस्त बंधनों से काटकर देवी को जानने समझने, अपने भीतर के देवत्व को समझने और जानने को तत्पर हो सकता है। देवी शेर की सवारी करती हैं। माने जिस भक्त के अंत:करण में साहस, शौर्य और दृढ़-संकल्प रूपी शेर होता है, उसी को परमात्मा की अनुभूति हो पाती है।

आध्यात्मिक स्वरूप
देवी का जो प्रथम स्वरूप शैलपुत्री दुर्गा का कहा गया है, इसमें भी साधक के लिए एक बड़ा गहरा संदेश है कि वह पर्वत की न्यांई स्थिर हो। कूटस्थ का बोध करने वाला हो, और कूट की न्यांई स्थिर हो। जो कभी नहीं बदलता, वही सत्य है। वही देवी है। उसी देवी की आराधना करने वाला देवी की ही न्यांई स्थिर, शांत और शीतल स्वभाव का हो जाता है।
देवी के दूसरे स्वरूप ब्रह्माचारिणी है जिसका हम साधकों के लिए एक बड़ा गहन संदेश है कि हम अपनी इंद्रियों पर, अपने मन पर आत्मबल से नियंत्रण करना जानते हों। ऐसा नहीं कि संसार का आकर्षण है और उसको जबरदस्ती साधक दबाता है। सत्य तो यह है कि साधक के लिए यह सारा संसार एक जलती हुई ज्वाला है। एक दिन वह ज्वाला सब कुछ समाप्त कर देगी क्योंकि यहाँ तो सब कुछ मरणशील है। ऐसा संसार का स्वभाव जानने, समझने के बाद कौन मूर्ख मन, इंद्रियों की तृप्ति के लिए इस संसार में अपने आपको देखेगा।
ब्रह्माचर्य का पालन एक सजा नहीं है, एक ऐसा चुनाव है, जो साधक स्वयं के लिए करता है। उसकी साधना से उत्तरोत्तर ऊध्र्वमुखी जो उन्नति होने जा रही है, उस उन्नति के लक्ष्य को अपने समक्ष रखते हुए साधक ब्रह्माचर्य का आचरण करता है। देवी चंद्रघंटा भी साधक के मन में एक गहरा आध्यात्मिक गूढ़ संकेत देती है। अज्ञानी मन अमावस्या की कालरात्रि की न्यांई है, परन्तु साधना, तपस्या करने से उसके भीतर सर्वप्रथम अर्धचंद्रमा ही जागृत होता है।
योग के ग्रंथों में, योग के गूढ़ रहस्यों में एक रहस्य यह है कि आज्ञाचक्र से और थोड़ा ऊपर शिखा की तरफ एक और चक्र होता है, जिसे हम कहते हैं- बिंदुचक्र। यह बिंदु अर्धचंद्रमा की ही न्यांई है। माने इसका अर्थ यह होता है कि जो साधक अपनी धरणा शक्ति के द्वारा मंत्र, यंत्र और तंत्र का अभ्यास करता है, उसका बिंदुचक्र जागृत होता है और इस बिंदुचक्र से अमृत का पानकर वह अत्यन्त आनन्द, स्थिरता और शांति की अनुभूति को प्राप्त करता है।
देवी के इन नौ स्वरूपों का सीधा-सीधा संबंध हमारे अंत:करण और हमारी आज की उस स्थिति से है, जहाँ आज अंधकार है। जहाँ अभी वासनाओं के असुरों का दल, जो हमारे मन के ही भीतर है, मन को ही घायल कर रहा है। हमारे मन की दैवी शक्तियाँ सुप्त हैं, अभी जागृत ही नहीं हुई हैं। तो इन असुरों के ताण्डव-नृत्य को समाप्त करने हेतु हमें दैवी-शक्तियों को जागृत करना होगा और इन दैवी-शक्तियों को जागृत करने के लिए देवी की उपासना सवरेपरि कही गई है।
प्रश्न यह उठता है कि है कोई ऐसा मानव, जिसको अपने जीवन में साहस नहीं चाहिए? है कोई ऐसा मानव, जिसको जीवन में शांति, कूटस्थता, स्थिरता और गम्भीरता की जरूरत नहीं? कोई भी मानव जिसके जीवन में आत्म-संयम, नियम और अनुशासन नहीं है, क्या वह किसी भी प्रकार की उन्नति को चख सकता है? अंधकार में भटक रहे मन के लिए विश्रंति प्रदान करने वाले जप-तप की सभी को आवश्यकता है। इसलिए दुर्गा के इन नौ स्वरूपों की आराधना इन नौ दिनों में जो भक्त करेंगे, वह अपने जीवन में देवी की परमकृपा को प्राप्त होंगे। इस परमशक्ति के साथ अपने मन को जोड़ने का अवसर है- नवरात्र। देवी चिह्न् है- शक्ति का, सौंदर्य का। देवी चिह्न् है- विद्या का, समाधि का, यान का। देवी चिह्न् है- व्रत का, अनुशासन का। देवी चिह्न् है- अध्यात्म की सवरेत्कर्ष उपलब्धियों का। देवी चिह्न् है- सिद्धियों का। कोई भी मानव अपने जीवन में शक्ति, विद्या, धन, गुण, अनुशासन, संयम, ज्ञान-चिंतन, शास्त्र-चिंतन, आत्म-चिंतन के बगैर मानवीयता को प्राप्त कैसे हो सकता है? इसलिए देवी की आराधना मानव के अंदर छिपी हुई उन रहस्यमयी दिव्य शक्तियों को जागृत करने का एक माध्यम है।
नवरात्र के इन नौ दिनों में जो व्यक्ति श्रद्धा, भावना से परिपूर्ण हो, नियम से जप, शौच, अहिंसा, स्वाध्याय, चिंतन का अभ्यास करता रहे तो इस परायण के फलस्वरूप उसकी अपनी गूढ़तम् दिव्य शक्तियाँ जागृत हो सकती हैं। फिर इस देवत्व को प्राप्त कर वह अपने जीवन को एक नई दिशा, एक नई उमंग, एक नई तरंग प्रदान कर सकता है।
देवी हमसे बाहर नहीं हैं। देवी हमीं में हैं। शिव हमसे अन्यत्र नहीं हैं। शिव भी मेरी ही परम चेतना हैं। अपने अंदर मौजूद इस शिव और शक्ति की पहचान करने का यह दुर्लभ सुअवसर किन्हीं सौभाग्यशालियों को मिलता है। मानव अधिकतर देह से संबंधित इच्छाओं, अभिलाषाओं की ही पूर्ति करने में अपना सारा जीवन व्यर्थ कर देता है। किन्हीं धन्यभागी, पुण्यशील मानवों के जीवन में अवसर आता है, जहाँ वह अपने अंदर मौजूद उस परम आदिशक्ति की पहचान कर पाता है और उस शक्ति की दिव्य लीला का अनुभव करके कृतकृत होता है। इस वर्ष के यह आश्विन माह के नवरात्रि आप सबके लिए मंगलमय हों। आपके जीवन में धर्म को समझने और उसका अभ्यास करने का एक सुअवसर बने।

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