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लीला देखन मैं चला

लीला देखन मैं चला

हमारे उत्सवधर्मी देश में अनेक पर्व आज विराट उत्सव का रूप लेकर सैलानियों को आकर्षित करने लगे हैं। यहां सैलानियों को आस्था का समंदर और संस्कृति के अद्भुत रंग देखने को मिलते हैं। दशहरा भी ऐसा ही एक पर्व है, जब पूरा उत्तर भारत राममय हो जाता है। कहीं रामलीलाएं अपने पारम्परिक रूप के कारण पर्यटकों को पसंद आती हैं तो कहीं इनमें आधुनिकता की चमक-दमक लोगों को आकर्षित करती है। रामलीला और दशहरा के विविध रंगों के बारे में बता रहे हैं अविनाश शर्मा।

अद्भुत है वाराणसी की ‘घटित लीला’

वाराणसी क्षेत्र को रामलीला परम्परा का जनक कहा जाता है। आश्चर्य की बात है कि सैकड़ों वर्ष बाद भी वाराणसी की रामलीला उसी पारम्परिक रूप में होती है। वाराणसी आने वाले सैलानी इन दिनों में विशेष तौर पर रामनगर की रामलीला के पारम्परिक रंग देखने आते हैं। रामनगर की लीला को ‘घटित लीला’ कहते हैं। अपनी एक अलग शैली के लिए यह आज विश्वविख्यात हो चुकी है। इसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से हजारों साधु-संत आते हैं, जिन्हें रामायणी कहा जाता है। विशेष बात यह है कि लीला मंचन एक स्थान पर न होकर नगर के विभिन्न स्थानों पर होता है। संतों द्वारा पूरे रामनगर को रामकथा के प्रमुख स्थलों में विभाजित कर दिया जाता है, जैसे पंचवटी, अशोक वाटिका, जनकपुरी, अयोध्या आदि। हर स्थान पर उससे जुड़े प्रसंगों का मंचन किया जाता है। कलाकारों के साथ दर्शक भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं और पूरा नगर एक ‘ओपन एयर थियेटर’ बन जाता है। इन्हें देखने देश-विदेश के सैकड़ों सैलानी आते हैं। अगर आप रामनगर की रामलीला देखना चाहते हैं तो इस बार यहां के लिए घूमने का कार्यक्रम बना सकते हैं। यहां तो रामलीला विजयदशमी से एक माह पूर्व ही आरम्भ हो जाती है। इस दौरान आप कभी भी यहां पहुंच सकते हैं और इस अद्भुत रामलीला को देख सकते हैं। दिन में यहां के पवित्र देवालय और प्रसिद्घ घाट देखे जा सकते हैं।

राममय हो जाता है इलाहाबाद

इलाहाबाद की रामलीला भी आज पर्यटकों को खूब लुभाती है। यहां की रामलीला अभिनयपरक लीला का एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। दस दिन तक पूरा इलाहाबाद जैसे राममय नजर आता है। हर जगह रंग-बिरंगी झालरें एवं रोशनी की चकाचौंध नजर आती है। रामलीला मंडलियों को यहां रामदल कहते हैं। यह दल रामलीला करने के अलावा षष्ठी से विजयदशमी तक मर्यादा पुरुषोत्तम राम की चौकियां निकालते हैं। शोभायात्रा के रूप में चौकी निकालना ही इलाहाबाद के दशहरे का प्रमुख आकर्षण है। इनमें करतब और स्वांग आदि भी होते हैं। यहां पहुंचने वाले पर्यटक प्रयाग में त्रिवेणी स्नान के अलावा श्रंगवेरपुर और भारद्वाज आश्रम भी देखने जाते हैं। मान्यता है कि इन स्थानों का संबंध भगवान राम से रहा है।

राजस्थानी रंग में सराबोर कोटा का दशहरा

राजस्थान के छोटे से शहर कोटा का दशहरा भी काफी प्रसिद्घ हो चला है। वैसे तो यह उत्सव अन्य शहरों की तरह ही मनाया जाता है, लेकिन यहां पर्यटकों को रामलीला के अलावा राजस्थान के लोकनृत्य एवं संगीत की प्रस्तुति भी देखने को मिलती है। मेले का रूप ले चुके इस पर्व में शामिल होने राजस्थान के अन्य शहर और गांवों से लोग जब पारम्परिक वेशभूषा में आते हैं तो एक अलग ही समा बंध जाता है। यहां राम झांकी के रूप में शोभायात्रा भी निकाली जाती है। कोटा के दशहरा-मेले की विशेषता यह है कि दशहरे के दिन यहां रावण एवं कुम्भकरण आदि के 75 फुट तक ऊंचे पुतले जलाये जाते हैं। देश के अन्य भागों में पहले इतने ऊंचे पुतले बनाने का चलन नहीं था। कुछ वर्षो से एक प्रसिद्घ ‘एजुकेशन हब’ बनने के साथ ही कोटा के दशहरे की ख्याति और बढ़ गई है।

दुनियाभर में प्रसिद्ध-कुल्लू दशहरा

हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय शहर कुल्लू का दशहरा अपने आप में एकदम अनोखा है। सत्रहवीं शताब्दी में राजा जगतसिंह के काल में आरम्भ हुआ ‘कुल्लू दशहरा’ आज विश्व भर में प्रसिद्घ है, जिसे देखने हजारों पर्यटक आते हैं। यह पर्व विजयदशमी से आरम्भ होता है।  रघुनाथ जी अर्थात् भगवान राम को यहां सबसे बड़ा देवता माना जाता है। भक्तगण उन्हें ठाकुर कहते हैं। पहले दिन ठाकुर प्रतिमा एक सुंदर रथ में मंदिर से ढालपुर मैदान तक लाई जाती है। फूलों से लदे रथ में मनोहारी वस्त्रों और आभूषणों से सजे ठाकुर की छवि हर किसी को प्रभावित करती है। ठाकुर का आशीर्वाद पाने दूर-दूर के गांवों से लोग स्थानीय देवता का डोला वहां लेकर आते हैं। मनाली की हिडिम्बा देवी का डोला इनमें अग्रणी होता है। सैकड़ों लोकदेवताओं की उपस्थिति से कुल्लू देवलोक के समान नजर आता है। लोग नित्य अपने लोक-देवताओं सहित ठाकुर की स्तुति करते हैं। उस मौके पर यहां लोक-नृत्य और संगीत के कार्यक्रमों की धूम होती है। कुल्लू दशहरे के मेले में हिमाचल के हस्तशिल्प तथा वस्त्र आभूषण आदि भी खरीदे जा सकते हैं। उत्सव के अंतिम दिन ठाकुर के रथ को ब्यास नदी के तट पर लाया जाता है। यहां प्रतीक रूप में लंका दहन होता है। उसके बाद रघुनाथ जी की वापसी यात्रा के साथ पर्व सम्पन्न होता है। दशहरा दर्शन के बाद आप हिल स्टेशन के रूप में भी प्रसिद्घ कुल्लू और पास ही स्थित हिल स्टेशन मनाली भी घूमने जा सकते हैं और यात्रा को यादगार बना सकते हैं।

दिल्ली की रामलीला के नए रंग

देश की राजधानी दिल्ली में रामलीला के मंचन की भव्यता देखते ही बनती है। रामलीला का मंचन यहां ग्यारह दिन तक चलता है। पिछले तीन दशक में तो इस त्योहार का रंग इतना तड़क-भड़क वाला हो गया है कि पर्यटकों को मैसूर का दशहरा भी छोटा लगने लगा। दिल्ली की रामलीला देखने दूसरे शहरों के लोग ही नहीं, विदेशी सैलानी भी आते हैं। उनकी सुविधा के लिए आजकल एक स्क्रीन पर अंग्रेजी सब-टाइटल दिखाए जाते हैं। विभिन्न तकनीकों का प्रयोग करके अनोखे प्रभाव पैदा किये जाते हैं। कहीं हनुमान जी को उड़ते हुए दिखाया जाता है तो कहीं युद्घ में आग बाणों का प्रभाव पैदा किया जाता है। मंच की सजावट एवं लीला का प्रवेश द्वार भी हर वर्ष कुछ खास होता है। दशहरे के दिन तो यह भव्यता अपने शिखर पर होती है, जब रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के रंगबिरंगे ऊंचे विशाल पुतले मैदानों में खड़े दिखाई देते है। लीला के अंत में पटाखों से भरे पुतलों का दहन होता है। रामलीला मैदान की लीला, लवकुश रामलीला, परेडग्राउंड रामलीला, अशोक विहार की रामलीला, पंजाबी बाग की रामलीला आज बेहद लोकप्रिय हैं। हालांकि इस वर्ष कॉमनवेल्थ गेम्स के कारण रामलीलाओं की भव्यता कुछ कम हो सकती है, लेकिन राजधानी की रामलीला का इंतजार करने वालों को कोई निराशा नहीं होगी।

दिल्ली वालों को इंतजार होता है इसका

इस मौके पर श्रीराम भारतीय कला केन्द्र की रामलीला की बात न हो तो कलाप्रेमियों के साथ इंसाफ नहीं होगा। यह रामलीला बैले शैली में प्रस्तुत की जाती है, जिसमें दर्शकों को विशुद्घ कला के माध्यम से रामकथा के दर्शन होते हैं। इसके अंतर्गत रामचरितमानस के कुछ उद्देश्यपूर्ण दृश्यों को चुन कर प्रभावशाली ढंग से तीन घंटे में प्रस्तुत किए जाते हैं। देखा जाये तो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में 10-11 दिन की लीला देखने का समय भी बहुत कम लोग ही निकाल पाते हैं। यहां के दक्ष कलाकार अपनी भावभंगिमाओं एवं मुद्राओं द्वारा प्रसंगों की उत्कृष्ट अभिव्यति से दर्शकों को मन मोह लेते हैं। इसके लिए केन्द्र के स्वागतकक्ष में पास की व्यवस्था होती है।

कैसे पहुंचें

दिल्ली से वाराणसी की दूरी लगभग 950 किमी है। वहां जाने के लिए नई दिल्ली से काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस एवं शिवगंगा एक्सप्रेस सुविधाजनक ट्रेन हैं।
दिल्ली से इलाहाबाद की दूरी लगभग 730 किमी है। वहां के लिए नई दिल्ली से प्रयागराज एक्सप्रेस द्वारा जाना सबसे सुविधाजनक है।
कोटा जाने के लिए कोटा जनशताब्दी उपयुक्त ट्रेन है। यह दूरी 505 किमी है।
दिल्ली से कुल्लू शहर 530 किमी है तथा चंडीगढ़ एवं दिल्ली से सीधी बस सेवा है। हिमाचल पर्यटन एवं हिमाचल रोडवेज द्वारा दिल्ली से रात्रि में वॉल्वो बसें भी चलाई जाती है। इनके द्वारा लगभग 12 घंटे में कुल्लू और 14 घंटे में मनाली पहुंच सकते हैं।
पर्वतीय शहर अल्मोड़ा नैनीताल के निकट है। यह दिल्ली से मात्र 363 किमी है। वहां जाने के लिए दिल्ली से काठगोदाम तक रेलमार्ग द्वारा पहुंच सकते हैं। बस मार्ग से जाने के लिए हल्द्वानी या नैनीताल से बस बदलनी होती है।

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