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विकास बनाम जाति का अगला मोर्चा

बीजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यह उम्मीद कर रहे हैं कि उनका नया जातीय समीकरण नीतीश के विकास के नारे की हवा निकाल देगा। दूसरी ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं कि जातीय समीकरण का जमाना अब लद गया है। अब बिहार के लोगों को न्याय के साथ विकास तथा सुशासन की लत लग गई है। लोग पुराने दिनों में वापस नहीं जाना चाहते। उन दिनों की कल्पना से ही लोगबाग सिहर उठते हैं।

इस दावे-प्रतिदावे के बीच यह पड़ताल मौजूं होगी कि क्या बिहार या फिर पूरे देश में अब तक मतदाता विकास को वोट देते रहे हैं या जातीय समीकरण को? या फिर दोनों के समुचित मिश्रण को? पिछले अनुभव बताते हैं कि चुनावों में विकास और जातीय समीकरण दोनों का मिला-जुला असर रहा है, बशर्ते कि मिश्रण ठीकठाक हो। अब तक मिले संकेतों के अनुसार, इस बार बिहार में यही होने जा रहा है।

बिहार में या यूं कहें कि पूरे देश में भी ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी दल की सरकार ने समावेशी विकास किया और इसे कसूर मानकर मतदाताओं ने उसे वोट से वंचित कर दिया। ऐसा सोचना ही मतदाताओं का अपमान करना है। कई नेतागण यदा-कदा यह कहते रहते हैं कि विकास को वोट नहीं मिलता। यह तर्क आमतौर पर वही नेता देते हैं जिन्हें अन्य कारणों से विकास नहीं करना होता। उनकी रुचि खास-खास लोगों के विकास में ही अधिक रहती है।

यह कहना भी सही नहीं होगा कि सिर्फ विकास के जरिये ही कोई दल दोबारा सत्ता में आ सकता है। चुनाव में जीत के लिए कुछ अन्य तत्व भी जरूर सहायक होते हैं। अधिकतर मतदाता यह चाहते हैं कि विकास में उस वर्ग के लोगों को अधिक तरजीह दी जाए, समाज के जिस हिस्से को अब तक विकास का लाभ काफी कम मिला है।

हाल के वर्षों के पांच उदाहरण यह साबित करते हैं कि विकास व समीकरण के वाजिब मिश्रण पर भी वोट मिलते ही हैं। पहला उदाहरण अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के इंडिया शाइनिंग यानी ‘भारत उदय’ के नारे का है।

दूसरा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के विकास कार्यक्रमों का है। तीसरा उदाहरण सन् 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के मुद्दे का है। चौथा नीतीश शासन के प्रारंभिक वर्षो में हुए छह उपचुनावों का है। सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में भी बिहार में न्याय के साथ विकास करने वाले राजद को भारी विजय मिली। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि जनता ने कभी विकास को अस्वीकार नहीं किया।

हां, सितंबर 2009 के कुछ उपचुनावों में राजग को बिहार में जरूर हार का मुंह देखना पड़ा था, क्योंकि तब बटाईदारी विवाद को लेकर मतदाताओं का एक हिस्सा नीतीश सरकार से नाराज हो उठा था। बाद में नीतीश सरकार को बटाईदारी कानून को कड़ा नहीं करने का वचन देना पड़ा। लगता है कि संबंधित लोगों का गुस्सा समाप्त हो गया है या फिर काफी कम हो गया है।

पहले चंद्रबाबू नायडू का उदाहरण लिया जाए। आंध्र प्रदेश में सन् 1999 में लोकसभा के साथ विधानसभा के भी चुनाव हुए थे। तब तेलुगू देशम को विधानसभा चुनाव में 47.6 प्रतिशत मत मिले थे। नायडू मुख्यमंत्री बने। पर, सन् 2004 के आंध्र विधानसभा चुनाव में तेलुगू देशम् को मात्र 40.20 प्रतिशत वोट मिले। वे सत्ता से बाहर हो गए। नायडू की हार के बाद अनेक राजनीतिक व चुनावी विश्लेषकों ने यह फतवा देना शुरू कर दिया कि विकास पर वोट नहीं मिलते।

दरअसल सन् 2002 के गुजरात दंगे का राजनीतिक असर आंध्र की राजनीति पर पड़ गया। चंद्रबाबू नायडू से आंध्र प्रदेश के अल्पसंख्यक नेताओं  ने कहा था कि अब आप अटल बिहारी सरकार से समर्थन वापस ले लीजिए। नायडू ने समर्थन वापस नहीं लिया। नतीजतन सन् 2004 के चुनाव में तेलुगू देशम अल्पसंख्यक वोट से पूरी तरह वंचित हो गया।

तेलुगू देशम के घटे वोट के प्रतिशत को देखने से यह साफ हो जाता है कि यदि अल्पसंख्यक मतदाताओं ने उसे सन् 1999 की तरह ही सन् 2004 में भी वोट दिए होते तो नायडू सत्ता से बाहर नहीं होते यानी वे विकास के कारण से नहीं, बल्कि एक अन्य कारण से हारे। अब नायडू भाजपा के साथ जाने का नाम नहीं लेते। सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 145 और भाजपा को 138 सीटें मिलीं यानी इन दो प्रमुख दलों में मात्र 7 सीटों का अंतर रहा।

कल्पना कीजिए कि सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान राजग के साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो कैसा नतीजा आता? जाहिर है कि सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में बिहार में जितनी सीटें यूपीए को मिली, उतनी ही सीटें राजग को मिलतीं। फिर केंद्र में किसकी सरकार बनती?

इतना ही नहीं, राजग ने अपने गलत राजनीतिक कदम उठाते हुए द्रमुक को छोड़कर अन्ना द्रमुक को अपना लिया। नतीजतन उस प्रदेश में राजग का भट्ठा बैठ गया। हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला से दोस्ती तोड़ना भी महंगा साबित हुआ। कल्पना कीजिए कि लोजपा, द्रमुक और चौटाला का दल पहले की तरह ही सन् 2004 में भी राजग में ही होते तो ‘इंडिया शाइनिंग की जीत’ को भला कौन रोक सकता था? यानी जीत के लिए विकास के साथ सही सामाजिक समीकरण भी चाहिए। क्षेत्रीय दल विभिन्न सामाजिक समूहों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं।

केंद्रीय मंत्री के रूप में नीतीश कुमार को बिहार में सड़क और रेल के क्षेत्रों में अनेक विकास कार्य करने का मौका मिला था। बिहार के मतदाताओं ने उनके विकास कार्यों की तुलना लालू-राबड़ी सरकारों के कार्यों से की। उन्हें नीतीश कुमार के काम बेहतर लगे। साथ ही नीतीश कुमार को सही सामाजिक समीकरण का लाभ भी मिला। नतीजतन नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन गए।

नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद विकास कार्यों ने तो राजनीति में ऐसा काम किया, जैसा काम इसके पहले कभी नहीं हुआ था। नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद बिहार में लोकसभा के तीन और विधानसभा के तीन उपचुनाव हुए। इन सभी उप चुनावों में सत्ताधारी राजग की जीत हुई। बिहार में लोकसभा की 40 में से 32 सीटें 2009 में राजग को मिलीं। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि नीतीश सरकार ने विकास की एक बड़ी लकीर खींच दी। अब इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में देखना है कि राज्य में न्याय के साथ विकास करने वालों को जनता मुकुट पहनाती हैं या फिर जातीय समीकरण बनाने वालों को?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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