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शिक्षा के अधिकार का बचकाना खेल

बचपन में अक्सर हम बच्चे इकट्ठे होकर एक खेल खेला करते थे। एक बच्चा घर के बीचोंबीच खड़ा हो जाया करता और बाकी बच्चों कमरों के कोनों में खड़े हो जाते। घर के केन्द्र में खड़ा बच्चा हर कोने में जाता और दोनों हाथ हिलाकर कहता ‘चक-चक चलनी’ इस पर कोने में खड़ा बच्चा तुरंत दूसरे कोने की ओर इशारा कर कहता ‘पल्ले घर मंगनी’।

इसी तरह दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे तक खेल चलता जाता। जब तक सब बच्चों थक हार कर बैठ न जाते। बस इस खेल-सा ही है शिक्षा अधिकार कानून, 2009। क्रमवार तरीके से अगर इस विधेयक के कानून में बदलने की प्रक्रिया देखें तो आप भी यही कहेंगे कि ये बड़े स्तर पर खेले गए हमारे बचपन के खेलों जैसा ही है।

सन् 2000 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित सम्मेलन में भारत विश्व के बाकी सभी देशों के साथ घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करता है, जिसमें दुनिया भर के बच्चों को अनिवार्य, मुफ्त, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने की बात की गई थी। घोषणा पत्र में साफ शब्दों में अंकित था कि हम दुनिया भर के 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए शिक्षा मुहैया कराने को प्रतिबद्ध हैं।

खैर, 2002 में संविधान संशोधन किया गया और शिक्षा को प्रत्येक भारतीय बच्चों के मौलिक और न्यायिक अधिकारों की सूची में शामिल किया गया। एक खेल यहां भी हुआ, 86वें संशोधन में सिर्फ शिक्षा को मौलिक अधिकार में जोड़ा गया, पर बच्चों की परिभाषा में कोई संशोधन नहीं हुआ। भारतीय संविधान आज भी 14 वर्ष से कम आयु तक के इंसान को ही बच्चा मानता है, जबकि बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए हस्ताक्षर के अनुरूप संशोधन तो किया, पर चार साल की जिम्मेदारी से बहुत सफाई से पल्ला भी झाड़ लिया।

बहरहाल, सन् 2004 में आयकर, एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी, सर्विस टैक्स सब पर दो प्रतिशत का शिक्षा अधिभार लगाया गया। कहा गया देश को शिक्षित करने के लिए होने वाले खर्चे के मद्देनजर जनता का सहयोग जरूरी है। जनता ने बाकी के करों की तरह इस अधिभार का भार भी ग्रहण किया। शिक्षा का अधिकार कानून की चलनी में और छलना बाकी था। सात साल बाद अगस्त 2009 में राष्ट्रपति ने इस विधेयक पर अपनी स्वीकृति दी। अक्टूबर में शिक्षा अधिकार विधेयक संसद में पारित हुआ और एक अप्रैल 2010 सें इसे कानून के रूप में लागू कर दिया गया।

कानून बनाने के बाद बड़ी ईमानदारी से सरकार ने इस कानून को कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों के हवाले कर दिया। राज्य सरकारों ने ये विरासत स्थानीय प्रशासन को सौंपी और स्थानीय प्रशासन ने स्कूल संचालन समिति को। लाल फीताशाही के शब्दकोश में इसे विकेन्द्रीकरण कहते हैं। मतलब स्पष्ट हैं कि स्कूल या विद्यालय संचालन समितियों की जिम्मेदारी है कि कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर न रहे। अब अगर वाकई प्रत्येक बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलाने की बात करें तो देश के तकरीबन 22 करोड़ बच्चे इस आयु वर्ग में आते हैं।

इनमें से 4.6 प्रतिशत यानी 92 लाख बच्चों अभी भी स्कूल से बाहर हैं। हालांकि ये सरकारी आंकड़े हैं और वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी। पर फिलहाल सरकारी आंकड़ों के हिसाब से ही बात करते हैं। 

कानून बनाने के बाद मानव संसाधन मंत्रालय ने कहा कि देश में शिक्षा अधिकार कानून के सफल क्रियान्वयन के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपयों की जरूरत अगले पांच साल में पड़ेगी। इस आंकड़े के हिसाब से सालाना खर्च आएगा 34,000 करोड़ रुपये। बजट पेश किया गया तो कार्यान्वयन के लिए दिए गए 15 हजार करोड़। बाकी की राशि? पूछने पर कहा गया कि राज्य सरकारें पैसे जुटाएं, कारपोरेट हाउस भागीदारी निभाएं।

अब जबकि कानून बने पांच महीने बीत चुके हैं। मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और गुजरात सरकारों ने मॉडल रूल तैयार कर लिए हैं। कुछ राज्यों में अब भी ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। 

बहरहाल, कानून बनने के पांच महीने बाद भी स्थानीय प्रशासन नहीं समझ पा रहा है कि हर एक किलोमीटर पर स्कूल कहां से आएंगे? शिक्षा हर एक बच्चों तक पहुंचाने के लिए जरूरी प्रशिक्षित 12 लाख शिक्षक किस तरह रखे जाएंगे? अधोसंरचना में आने वाली लागत कहां से जुटाई जाएगी? स्थानीय तंत्र राज्य सरकारों की ओर उम्मीद से देख रहा है और राज्य सरकारें केन्द्र सरकार की ओर। फिलहाल, सरकार इस कानून के बन जाने मात्र से संतुष्ट है और सवालों की ओर पीठ करे खड़ी है।


लेखक शिक्षा अधिकार कार्यकर्ता हैं 

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