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काम और नजरिया

कहा जाता है कि श्रेष्ठ लोग वे होते हैं, जो कोई भी काम सबके कल्याण के लिए करते हैं, आम लोग वह होते हैं, जो कोई भी काम सिर्फ अपने लिए करते हैं और मूर्ख वे होते हैं, जो काम इसलिए करते हैं कि क्योंकि यह उनकी मजबूरी होता है और उनके पास इसका कोई विकल्प नहीं होता।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि श्रेष्ठ बनने के लिए आप ऐसे काम को तलाशें जिससे सबका कल्याण हो। असल बात यह है कि आप जो काम कर रहे हैं, उसके प्रति आपका नजरिया क्या है, क्या आप उसे सार्वजनिक कल्याण से जोड़ पाते हैं या नहीं।

एक जगह पत्थरों को तराशने का काम चल रहा था। एक पथिक वहां से गुजरा। उसने काम में लगे मजादूर से पूछा कि वह क्या कर रहा है। मजदूर ने कहा- देखते नहीं पत्थर घिस कर पसीना बहा रहा हूं। पथिक ने फिर पूछा- लेकिन पत्थरों से क्या बनेगा? मजदूर ने कहा- जो भी बने मुझे इससे क्या। मुझे तो बस पत्थर ही घिसने हैं।

पथिक ने यही सवाल जब दूसरे मजदूर से पूछा तो उसने जवाब दिया- मैं मंदिर निर्माण के लिए पत्थर घिस रहा हूं। इससे जो मजदूरी मिलेगी, उससे अपना और अपने परिवार का पेट पालूंगा।

तीसरे मजदूर का जवाब सबसे अलग था- मैं इस इलाके के सबसे बड़े मंदिर के निर्माण में लगा हूं। मंदिर बन जाएगा तो लोगों को पूजा के लिए दूर नहीं जाना होगा। तीनों मजदूर थे, तीनों एक ही काम कर रहे थे, लेकिन अपने काम और अपने जीवन के बारे में तीनों का नजरिया अलग-अलग था।

दरअसल हम जो काम करते हैं, वह बाहर होता है, लेकिन उसके लिए हमारा नजरिया हमारे भीतर विकसित होता है। यह नजरिया सिर्फ यही नहीं बताता कि हम काम को कैसे करते और देखते हैं, बल्कि यह भी बताता है कि पूरे समाज में हम अपने लिए क्या भूमिका देखते हैं। हमारी सोच हमारे काम की ही नहीं हमारी गुणवत्ता भी तय करती है।

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