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प्रियदर्शिनी और न्याय

पीड़ित पक्ष, मीडिया और सिविल सोसायटी ने प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड में हाई कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह की जीत और संतोष का भाव जताया था, वैसा भाव सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बिल्कुल नहीं है। प्रियदर्शिनी के पिता निराश हैं, सिविल सोसायटी दुखी है और जाहिर है मीडिया भी उत्साहित नहीं है। वजह है सुप्रीम कोर्ट की तरफ से फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलना।

सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि कुछ बातें अभियुक्त संतोष सिंह के पक्ष में हैं, इसलिए इसे बेहद असाधारण मामला नहीं माना जा सकता। इससे क्या यह मान लिया जाए कि हाईकोर्ट मीडिया और सिविल सोसायटी के इतने दबाव में आ गया था कि उसने न्यायपालिका की साख बचाने के लिए फांसी से कम सजा देना उचित नहीं समझा।

हाई कोर्ट के दो जजों की पीठ ने इस मामले की तेज सुनवाई कर 42 दिन के भीतर फैसला दिया था। अब उससे जुड़े जज न्यायमूर्ति सोढी ने जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उचित ठहराया है, उससे यह भी एक अर्थ निकल सकता है।

इसके विपरीत यह भी माना जा सकता है कि दिल्ली पुलिस ने तहकीकात के मामले को इतना बिगाड़ दिया था कि उसके आधार पर पहले सुनवाई अदालत ने अभियुक्त को बरी कर दिया और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक आते-आते आरोपी को कुछ न कुछ फायदा मिल ही गया।

दरअसल आर्थिक तरक्की और खुशहाली की तमाम तस्वीरों के बावजूद हत्या और स्त्री विरोधी अपराधों के बढ़ते जाने के कारण हमारा नागरिक समाज और न्यायपालिका अजीब दुविधा में फंसे हुए हैं।

नागरिक समाज एक तरफ मानवाधिकारों की रोशनी में फांसी की सजा को कम करने का अभियान चलाता है, तो दूसरी तरफ स्त्री और कमजोर वर्ग के प्रति बढ़ते अपराध को देखते हुए कड़ी से कड़ी सजा की मांग करता है। यही स्थिति न्यायपालिका की भी है। वह बेहद असाधारण स्थिति में ही फांसी देना चाहती है, लेकिन जब स्थितियां लगातार असाधारण बनती जाएं तो वह कितनों को असाधारण माने?
  
फांसी की सजा की दूसरी दिक्कत उसके लागू होने की भी है। बहुत सारे मामलों में फांसी क्षमादान याचिकाओं पर फैसला न हो पाने के कारण लटकी हुई हैं। उधर आजीवन कारावास के बारे में पीड़ित पक्ष का अनुभव यह भी बताता है कि वह तो अपराधी को जमानत पाने और मुक्त होकर डराने धमकाने का मौका दे देता है। इससे पहले जेसिका लाल हत्याकांड में अभियुक्त के पेरोल पर छूटने का विवाद हो ही चुका है।

प्रियदर्शिनी मट्टू का मामला स्त्री विरोधी अपराध का ही नहीं प्रभावशाली  लोगों का कानून के साथ छेड़छाड़ का भी मामला है। हत्या के अपराधी संतोष सिंह के पिता आईजी स्तर के अधिकारी थे और जांच के समय दिल्ली में ही नियुक्त थे। सुनवाई अदालत के जज थरेजा ने संतोष को बरी करते हुए जांच एजेंसियों को काफी कोसा था। उन्हें उसमें साफ तौर पर पक्षपात दिखा था।

शायद बंगलूर की प्रतिभा श्रीकांतमूर्ति की हत्या के मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ड्राइवर को इसीलिए दोषी साबित कर लिया क्योंकि वहां अपराधी कानून का रखवाला नहीं था। इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका पर विश्वास कायम रखना जितना जरूरी है, उतना ही एक अपराधमुक्त स्वस्थ समाज भी जरूरी है।

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